श्रद्धांजलि नहीं, 'श्रद्धाशब्द' आलोक जी आपके लिए!

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'भाई साहब! मेरे लिए श्रद्धांजलि में यही लिख दीजिएगा', आलोक तोमर से मेरी टेलीफोन पर अंतिम बातचीत के ये शब्द रविवार को तब मेरे जेहन में कौंध गए जब सीएनईबी न्यूज चैनल के प्रमुख अनुरंजन झा ने टेलीफोन पर आलोक के निधन की खबर दिल्ली से दी। इस बातचीत के समय आलोक तोमर की आवाज अत्यंत क्षीण थी, फिर भी वे बात कर रहे थे, मैंने कहा कि यह जीवटता आप में ही हो सकती है।

इस पर उन्होंने कहा कि 'भाई साहब आप मेरी श्रद्धांजलि में यही लिख दीजिएगा'। इस पर मैंने कहा कि अभी जीना है आपको, लेकिन शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था। मैं आलोकजी के इस कथन में आसन्न मृत्यु का पूर्वाभास स्पष्ट देख रहा था, पर मैं इसे अनंत काल तक के लिए टाल देना चाहता था। यह जानते हुए भी कि किसी भी देहधारी के लिए उसकी देह का अंत एक ध्रुव सत्य है, मैं विवश हूं आलोक तोमर के देहावसान की खबर मुझे गंभीर रूप से विचलित कर गई है। वे तो जीवटता के प्रतिमान थे।

वे दिल्ली के बत्रा अस्पताल में भर्ती थे। मैं निरन्तर स्थिति के सम्पर्क में था। उनके निधन की खबर से मेरा गहरे अवसाद में चले जाना स्वाभाविक था। सच तो यह है, कि मुझे इसकी आशंका निरन्तर बनी हुई थी और मैं उचाट था। 'श्रद्धांजलि' का शब्द आज महज औपचारिक बन कर रह गया है। मैं आलोक के लिए स्वयं को इस श्रेणी से अलग रखना चाहता हूं। लेकिन 'श्रद्धा-शब्द' से उन्हें वंचित नहीं करूंगा।

आलोक मुझसे बहुत छोटे थे और आरम्भ से ही मुझे बड़े भाई की तरह देखते थे। कई वर्षों से अंतहीन संवादों का सिलसिला रहा हमारे बीच। और मैं जानता हूं पत्रकारीय जीवन में विशिष्ट लोगों की भीड़ में भी कुछ चेहरे शाश्वत होते हैं, जो मानस पटल से कभी नहीं मिटते। मेरी दृष्टि में आलोक ऐसे अतिविशिष्ट पत्रकार रहे, जिन्होंने पत्रकारिता की एक अत्यंत विलक्षण परिपाटी बनायी और अपना अनुगमन करनेवालों की एक पीढ़ी तैयार की। मेरे लिए यह भी अविस्मरणीय है कि जिस दिन मैंने उन्हें कहा कि आप प्रतिदिन जैसा कुछ क्यों नहीं लिखते उन्होंने उसी दिन से 'प्रतिदिन' स्तम्भ लिखना शुरू कर दिया, जो अविराम चला।

आलोक का निधन मुझे जिस बिंदु पर सोचने के लिए एकाग्र करता है, वह है उनकी लिखते रहने की अदम्य जिजीविषा। इस अर्थ में वे सचमुच सहस्रबाहु थे। एक ही समय उनकी दृष्टि देश-दुनिया की उस हर खबर या उसकी प्रगति पर होती जिससे असंख्य लोगों का सरोकार होता। इसमें उनकी बैचैनी और छटपटाहट उस मुद्दे से जुड़े आंदोलनकारियों से कहीं अधिक तीव्र होती। वे उसके हर विवरण हर पार्श्‍व को एकत्र कर तत्काल आधिकारिक विश्‍लेषण करते और बेबाकी से उस पर लिख डालते। ऐसा वे अविश्रांत करते।

सच है कि पत्रकार की अपनी मानवीय सीमाएं होती हैं पर आलोक मुझे हमेशा उससे परे दीखते। वे घोर संकटों और विरोधाभासी स्थितियों में रहे पर पराजित कभी नहीं हुए। इसमें एक बात हमेशा स्पष्ट होती कि वे केवल संवाद संकलन में अग्रणी नहीं रहना चाहते थे, बल्कि वे उस समाचार में कहीं संलिप्त होकर न्याय के पक्ष में हमेशा खड़े रहते। हर आंदोलन में लाखों लोगों से संवाद की उनकी भागीदारी होती पर दुर्भाग्य से पत्रकार की इस अदम्य इच्छा को उसकी परिपूर्णता में नहीं समझा जाता।

आलोक की पत्रकारिता में 'आलोक' अर्थात प्रकाश की तरह ही समस्त वर्ण-छटाएं थीं और आलोक मूलत: यही थे। लोग जीते जी नेत्रदान कर जाते हैं आलोक ने जीते जी बहुतों में पत्रकारीय ज्योति दी है। मुझे विश्वास है भारतीय पत्रकारिता में उसका प्रकटन निरन्तर होता रहेगा और यह आलोक चिरंतन रहेगा।

लेखक एसएन विनोद वरिष्‍ठ पत्रकार तथा दैनिक 1857 के चीफ एडिटर हैं. उनका यह लेख दैनिक 1857 से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


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