काश! मैंने थोड़ी जल्‍दबाजी दिखाई होती

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होली के रंग और बधाईयों के माहौल में जब हमने अपना कम्प्यूटर खोला और फेसबुक पर आनलाइन हुए तो एक दुखदायी खबर वहां इंतजार कर रही थी। हमें जानकारी मिली की वरिष्ठ पत्रकार और पत्रकारिता की स्वंय में एक संस्था माने जाने वाले आलोक तोमर जी का निधन हो गया। इस खबर को सुनकर मन एकदम से भारी हो गया। होली की खुशियां एक दर्द में बदल गई।

आलोक तोमर जी का हमसे कोई सीधा परिचय भी नहीं था। साथ ही उनसे मुलाकात या फोन पर संपर्क का सौभाग्य हमें आज तक नही मिल पाया था, जो अब आगे कभी भी नहीं मिल पायेगा। आलोक तोमर जी के बारे सबसे पहले जानने को तब मिला जब सीनियर इंडिया पत्रिका में कार्टून विवाद हुआ था। उस समय तक हम अपने जीवन के भंवर में ही उलझे थे और पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं था। परन्तु उस लेख और विवाद के बाद तोमर जी को पढ़ना अच्छा लगा, फिर धीरे-धीरे पत्रकारिता से जुड़ाव होता गया तो आलोक तोमर जी एक आदर्श बनते चले गये।

इंटरनेट के प्रयोग के साथ कई लोगों के संपर्क में आने का मौका मिला और इसी के साथ आलोक तोमर जी के डेटलाइन इंडिया को पढ़ने और जानने का सुनहरा मौका मिला। इसी बीच तोमर जी के कैंसर से पीड़ित होने की खबर ने दुःख तो दिया। परन्तु उनकी लगातार मिल रहे लेखों ने उनके जीवट के शिखर को भी दर्शाया।

उनके संपर्क में आने के लिए हमने कई स्तर पर प्रयास किया, उनके फेसबुक प्रोफाइल पर रिक्वेस्ट भी भेजी थी। परन्तु उनकी दिन प्रतिदिन बिगड़ रही तबीयत के कारण उन्होंने फेसबुक पर ध्यान देना कम कर दिया था। इसीलिए वह रिक्वेस्ट सदैव के लिए पेंडिंग हो गई है। हमारी कुल 2 वर्ष की पत्रकारीय आयु में हमने एक बार उनके वेब पोर्टल डेटलाइन इंडिया के रिर्पोटिंग के विज्ञापन को देखकर दनके साथ काम करने के लालच से पोर्टल पर आवेदन भी किया था। पर शायद आलोक जी के खराब स्वास्थ और हमारे अप्रभावित करने वाले सीवी के कारण हमें कोई मौका देना किसी ने गंवारा नही समझा। इसी प्रयास के साथ उनके साथ काम करने की हमारी इच्छा की संभावना अब सदैव के लिए समाप्त हो गई।

तोमर जी के व्यक्तित्व का इतना प्रभाव इतनी दूर से हम पर पड़ता रहता था कि प्रतिदिन उनके द्वारा लिखे हुए को पढ़ने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने हर मुद्दे पर बेलाग लिखा, चाहे वह अजय संचेती का मामला रहा हो या बोफोर्स या कोई अन्य मुद्दा। उनकी कलम ने सारे भेद मिटाते हुए एक धार के साथ सत्य को मुक्त कराया। अपराध के सर्वोच्च शिखर माने जाने वाले दाऊद के बारे में भी लिखते हुए उन्होंने जरा सा भी नर्म रूख नहीं अपनाया। किसी भी विषय या किसी के भी बारे में उनकी कलम ने कोई संकोच नहीं दिखाया।

आज उनके चले जाने के बाद यह अफसोस लगातार बना है कि काश हमने उनसे मिलने में थोड़ी जल्दी दिखाई होती। अगर हमने यह संकोच ना किया होता कि कुछ छपने के बाद ही उनसे मिलें तो शायद आज हम भी यह कह सकते कि ऐसे व्यक्तित्व से मिल चुके हैं। आलोक जी हमेशा से प्रेरणस्रोत बने रहेंगें और हमारे जैसे लोग उनसे काफी कुछ सदैव सीखते रहेंगे।

लेखक हरिशंकर शाही बहराइच में पत्रकार हैं.


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