भगत सिंह, राजदेव और सुखबीर की याद में दीया जरूर जलाएं!

E-mail Print PDF

आप भी चौंक गये होंगे ये पढ़कर "भगत सिंह, राजदेव और सुखबीर की याद में कल अपनी छत पर एक दीया जरूर जलाएं" और सोच रहे होंगे कि कहीं मैं अपने आपको बड़ा लेखक तो नहीं समझने लगा हूं और फिर आपके दिमाग में सवाल आया होगा कि शहीद भगत सिंह तो ठीक है, लेकिन राजदेव और सुखबीर कब शहीद हो गये पता ही नहीं चला. दरअसल राजदेव और सुखबीर को मेरे एक दोस्त ने शहीद कर दिया है.

आपकी तरह मैं भी चौंक गया था, जब ये मैंने पढ़ा था. और ना जाने कितनों ने पढ़ा होगा क्योंकि आजकल एसएमएस थोक में सेंड होते हैं, एक साथ कइयों को चले जाते हैं. दरअसल कल मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया कि "कल भगत सिंह, राजदेव और सुखबीर का शहीदी दिवस है और मेरी आपसे प्रार्थना है कि कल आप भगत सिंह, राजदेव और सुखबीर की याद में अपनी छत पर एक दीया जरूर जलाये"

मैसेज को पढ़कर हंसी कम आई और अफ़सोस ज्यादा हुआ. मैं सोच में पड़ गया कि किस तरह से लोग शहीदों के नाम तक भूलते जा रहे हैं, उनकी शाहदत तो फिर क्या याद रहेगी. "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मर मिटने वालों का यही आखरी निशां होगा." जैसे वाक्‍य भी लोग भूल जाएंगे.

आज फिर वही 23 मार्च है. वैसे तो 23 मार्च का ये दिन और ये तारीख हर साल आते हैं और इतिहास में लिखी हुई है, पर दुर्भाग्य ये है कि हमारे देशवासियों ने इतिहास पढ़ना छोड़ दिया है, इसलिए सब एक साथ मिलकर धीरे-धीरे इस तारीख और दिन को भूलते जा रहे हैं. इस तारीख और दिन के साथ ही भूलते जा रहे उनकी शहादत को जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया था, जो देश के लिए शहीद हो गये हैं, जो अपनी जान के बदले में हमें आज़ादी दिला गये थे.

23 मार्च 1931 को अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फ़ांसी पर लटका दिया था. अंग्रेज सरकार इन तीनों युवा क्रान्तिकारियों के जज्बे और जुनून से घबरा गयी थी और दूसरी तरफ देसवासियों का गुस्सा भी फूटने लगा था, इसलिए आनन-फानन में अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के फ़ांसी के निर्धारित दिन से एक दिन पहले ही उन्हें फ़ासी पर लटका दिया था.

हम हर साल मोबाइल से मैसेज भेजकर, ऑरकुट से, फेसबुक से शहीदों को याद करते हैं या यूं कहे फारमेलिटी निभाते हैं. देश प्रेमी होने का ढोल पीटते हैं, फिर अगले ही पल भूल भी जाते हैं. कुछ एक नेता लोग जाकर शहीद भगत सिंह की प्रतिमा पर फूल-मालाएं चढ़ा देते हैं. सुबह को अख़बार में उनका फोटो आ जाता है और फिर वो भी भूल जाते हैं.

शहीद भगत सिंह की प्रतिमा को साल में एक बार ही सही पर फूल-मालाए तो नसीब हो जाती है, लेकिन राजगुरु और सुखदेव को वो भी नसीब नहीं होते, क्योंकि मैंने राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमा कहीं देखी ही नहीं है. देशवासियों को अपनी परेशानियों से फुर्सत मिलेगी तभी तो शहीदों को याद करेंगे. आम आदमी महंगाई से त्रस्त है. हमारे नेता लोग भ्रष्‍टाचार में मस्त हैं. विपक्ष उनपर हमला बोलने में व्यस्त है. जाट-गुर्जर आरक्षण की मांग को लेकर रेल की पटरियों पर पैबस्‍त हैं और मेरे जैसे युवा इस सवाल में खोये हुए हैं कि इंडिया वर्ल्ड कप जीतेगा या नही!

बहरहाल उस एसएमएस को ठीक करके लिख रहा हूं- " आज 23 मार्च है शहीदी दिवस है, 23-मार्च-1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फ़ांसी पर लटका दिया गया था. मेरी आपसे प्रार्थना है कि तीनों शहीदों की याद में कल अपनी छत पर एक दीया जरूर जलाये."

"शहीदों की चिताओं पर नहीं लगते मेले, वतन पर मर मिटने वालों का यही निशां बाकी है."

लेखक श्‍याम त्‍यागी पत्रकारिता के छात्र हैं.


AddThis