...उनके दुख-तकलीफ में हमारी हिस्‍सेदारी क्‍यों नहीं!

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उनके मेहनत से पैदा हुए मुनाफे में हमारा हिस्सा होता है तो उनके तकलीफ और दुःख में हमारी हिस्सेदारी क्यों नहीं! जिस तरह से कार्बन पेपर खुद पर लिखी गई इबारतों को कापी करते हुए चलता है। ठीक उसी तरह अधिकांश चीजों को लेकर हमारी सोच और धारणाएं बंधी-बंधायी चौहद्दी के अन्दर घूमती और सिर पटकती रहती है।

खासकर क्रांतिकारियों के बारे में समाज के एक बड़े धड़े की सोच कुछ यूं है कि क्रान्ति का मतलब सिर्फ मारधाड़ और खूनखराबा है और क्रान्तिकारियों के बारे में क्या कहने अधिकांश लोगों की नजर में क्रान्तिकारी पत्थर दिल होते हैं। और बात-बात पर बम-पिस्तौल लेकर जिस-तिस को मारते फिरते हैं। जबकि इंसानी संवेदनाओं की कुल जमा-पूंजी का एक और नाम क्रान्ति हुआ करती है। अपने समय की घोर अमानवीयता, तड़पती संवेदनाओं के बीच इंसान मानवीय दुःख और हताशा को सुख और आशा में बदलने के लिए जब खुद को तैयार करता है तो वहीं से क्रान्ति और क्रान्तिकारियों का जन्म होता है।

23 मार्च को हम भगत सिंह का शहादत दिवस मनाते है। हम सारे लोग भगतसिंह को क्रान्तिकारी के रूप में याद करते हैं। उनके बारे में किसी से पूछने पर जवाब मिलता है कि वो गरम दल के थे और उन्होंने एसेम्बली में बम फेंका था। यही एक प्रचलित धारणा भगतसिंह के बारे में बनी हुई है। सच कहिए तो यही एक बड़ी दिक्कत हमारे साथ है कि शहीदों को या तो हम उनके शहादत दिवस पर याद करते हैं या फिर उनके जन्मदिन पर, जबकि शहीद किसी खास दिन की थाती नहीं होते बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में याद करने की चीज होते हैं। ताकि हमारे अन्दर जुल्म और शोषण के खिलाफ लड़ने के साथ ही आशा और उम्मीद की रोशनी बची रहे।

भगत सिंह की कुछ ऐसी छवि सत्ताधीशों ने पेश की है, जैसे धरती पर बढ़ रहे पाप और अन्याय के विरोध में आकाश्‍ा से किसी अवतार का अवतरण हुआ था। जो गोली और बम की भाषा में बात करता था। लेकिन भगत सिंह न तो एक दिन की उपज है और न ही आसमान से प्रकट हुआ कोई अवतार। धरती पर मौजूद लोगों की वेदना, दूसरों के दुःख-दर्द, परेशानियों को खुद में देखने, उन्हें समझने और उनका इलाज करने का नाम भगतसिंह था। एक ऐसा व्यक्तित्व जो मानवीय संवेदनाओं से लबालब भरा हुआ था। कुछ छोटी-छोटी घटनाओं को टुकड़े में जोड़कर इसे समझा जा सकता है।

एक टुकड़ा सन 1927 का है, जब भगत सिंह के पिता ने उन्हें डेयरी फार्म संभालने और उसका हिसाब-किताब देखने की जिम्मेदारी उनको दी। डेयरी फार्म में कई भैंसे थीं, जिनमें से एक को भगतसिंह मासी कहा करते थे। एक दिन भगत सिंह की मां ने कहा भगत ये भैंस भला तेरी मासी कैसे हो गई। भगत सिंह का जवाब था- ‘बेबे, बचपन में मैं तेरा दूध पीता था और अब ये मासी मुझे अपना दूध पिलाती है, इस नाते ये मेरी मासी लगी। एक रोज जब वो भैंस कहीं गुम हो गई तो मां ने फिर कहा- भगत तेरी मासी तो तुझे छोड़ कर चली गई। भगत सिंह का जवाब था - मां देखना मासी तो लौट आएगी लेकिन इस बार अगर मैं गया तो शायद फिर कभी न लौटूं।

एक और वाकया इसी फार्म हाउस का है। फार्म हाउस पर काम करने वाले किसानों ने भगतसिंह के पिता से कुछ कर्ज वगैरह लिया था। उन्होंने भगतसिंह से कहा भगत मैं किसी काम से जा रहा हूं, तू जरा हिसाब-किताब देख लेना। भगतसिंह उन दिनों टालस्टाय की किताब को पढ़ रहे थे। किसानों की जिंदगी के बेबसी को बयां करने वाले इस किताब से भगतसिंह किसानों की जिन्दगी को समझ रहे थे। फार्म हाउस पर काम करने वाले किसानों के कर्जे की बही पर नजर दौड़ाते हुए उन्होनें किसानों से कर्ज लेने की वजह पूछी तो उन्हें पता चला कि उनकी परेशानी काम करने के दौरान ही उन पर आयी थी। तो उन्होंने कर्ज के बही के उन पन्नों को ही काट दिया जिस पर कर्जदारों का नाम चढ़ा था। शाम को लौट कर आए पिता ने जब पूछा भगत तूने ये क्या किया! तो भगतसिंह ने अपने पिता को समझाते हुए कहा कि जब उनके मेहनत से पैदा हुए मुनाफे में हमारा हिस्सा होता है तो उनकी तकलीफ और दुःखों में भी हमारी हिस्सेदारी होनी चाहिए।

यह नजरिया था उस भगतसिंह का, जिसे आम आदमी की तकलीफ और उसके दर्द की समझ इतनी गहराई तक थी कि आगे चलकर आम जनता के दुखों का अन्त करने के लिए उन्होंने इन्कलाब-जिन्दाबाद का नारा दिया। एक और वाकया जेल के दिनों से जुड़ा हुआ है। ये वो दिन थे जब भगत सिंह जेल में बंद थे और उनपर चल रहे मुकदमें सुनवाई का दौर चल रहा था। जेल में भगतसिंह जिस सेल में कैद थे, उस सेल की सफाई झगड़ू नाम का सफाईवाला करता था। भगत सिंह उसे बेबे यानी मां कहकर बुलाते थे। एक दिन उन्‍होंने उससे कहा कि - बेबे न जाने कब मुझे हमेशा के लिए जाना पड़े मेरी ख्वाहिश तेरे हाथ की बनी रोटी खाने की है। भगत सिंह का इतना कहना था कि झगड़ू के आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा- मैं ठहरा एक मामूली सफाई वाला, बहुत छोटा आदमी फिर तू मुझे बेबे क्यूं कहता है।

भगत सिंह ने उसे गले लगाते हुए कहा- बेबे न कहूं तो क्या कहूं! बचपन में मेरे कमरे की सफाई बेबे किया करती थी और अब तू करता है। इस नाते तो तू मेरे लिए बेबे ही हुआ। अब तूझे मैं बेबे क्यों न कहूं! इस तरह के अनगिनत पल हैं उस भगतसिंह के जिन्दगी के, जो महज 23 साल की उम्र में साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ते हुए फांसी चढ़ गया। लेकीन उसकी छोटी सी उम्र की यह यात्रा संवेदनाओं और रिश्‍तों को घर के चौखट से बाहर निकालकर उसे अपने समय के सबसे मौजूं सवालों से जोड़कर उन सवालों के हल करने की यात्रा थी।

इन्कलाब- जिन्दाबाद उस यात्रा का अन्तिम पड़ाव था, जहां समाज से लेकर राजनीति को बदलना था। आदमी के पक्ष में आदमी के लिए। उनका इन्कालाब-जिन्दाबाद बम-गोली से बदलाव की नहीं आम आदमी के संवेदनाओं को समझने उसके दुःखों को बदलने की यात्रा है, और भगत सिंह के विचार इस यात्रा में हमारे मागर्दशक भी हैं और मित्र भी. काश हम इसे समझ सकें, क्योंकि भगत सिंह मरते नहीं वो तो लोक जाया हैं!

लेखक भास्‍कर गुहा नियोगी पत्रकार हैं और बनारस में युनाइटेड भारत के साथ जुड़े हुए हैं.


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