मुझे मालूम है, तुम मर नहीं सकते...

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आलोक तोमरये लेख या संस्मरण या स्मृतिका जो कह लें, कई लोगों के कहने के बाद और खुद के भी कई असफल प्रयासों के बाद लिख रहा हूं क्योंकि 21 मार्च से जितनी भी बार कलम उठाई है हर बार बस आंसू ही निकले हैं... शब्द एक नहीं फूट पाया। अवाक हूं कि आखिर आलोक तोमर कैसे मर सकते हैं? बार-बार खुद को विश्वास दिलाता हूं कि हां अब तात चले गए हैं और उतनी ही बार अवचेतन, चेतन को झिड़क देता है कि क्या बकवास करते हो, भला आलोक तोमर के प्राण लेने का साहस किसमें है.

लिखने बैठते ही पता नहीं कितने किस्से...वाकये...और घटनाएं फ्लैश बैक सरीखे आंखों के सामने चलने लगते हैं और फिर गद्य की जगह आंखों से पद्य बहने लगता है... कैसा शख्स था वो... खुद इतना बोलने वाला शख्स कैसे सबको निःशब्द कर के जा सकता है... कैसे हममें से सबसे ज़्यादा चैतन्य पत्रकार हमारे सामने ही फूलों में लिपटा चेतनाशून्य पड़ा था... और हम जो चेतन थे, जड़ से खड़े अपनी आंखों पर अविश्वास कर रहे थे कि नहीं ये आदमी अभी उठ खड़ा होगा और कहेगा कि रो मत...मरा नहीं हूं अभी... ज़िंदा हूं... उनके जानने वाले जानते होंगे कि ऐसे ही बात करते थे आलोक तोमर.

अद्भुत जीव थे तात (मैं उन्हें इसी नाम से बुलाता था) और अद्भुत था उनका जीवट... उनसे पहली मुलाकात और आखिरी मुलाकात तक सब कुछ एक जैसा ही था... सिवाय उनकी खामोशी के... पहली बार भी वो ऐसे ही मिले थे जैसे न जाने कब से जानते हों... मैं तो उनके लेख और किताबें पढ़ ही चुका था, पर लगा ही नहीं कि इस इंसान से पहली बार मिला हूं... चलते चलते पीठ पर धौल और बोले- "क्या पता साथ काम करना लिखा हो... वैसे बालक भाषा पर अधिकार है... पढ़ते लिखते रहो..." तात के शब्द शब्दार्थ बन गए, और साथ काम करने कुछ ही महीनों बाद पहुंच गया... नौकरी के लिए गया तो उन्हें नहीं बताया, लिखित परीक्षा देते वक्त पीछे से आकर एक टीप लगा के बोले, "बताया क्यों नहीं बालक...", मैंने कहा, "आप होते तो बताते..?" मुस्कुरा कर चले गए.

उसके बाद नौकरी ज्वाइन की तो आलोक जी का और मेरा केबिन एक ही था... एक केबिन में हम चार लोग... नमिता पाठक, अमृता राय, सबसे जूनियर मैं... और सबसे सीनियर आलोक तोमर... आलोक जी जब तक दफ्तर में रहते वो कमरा इतना जीवंत रहता मानो पूरा दफ्तर वहीं आ गया हो, लोग उस कमरे में आने के लिए लालायित रहते और कई बार तात को लोगों को डांटना पड़ता... वहां पहली बार मैंने अपने सामने उस शख्स को भाषा के शिल्प गढ़ते देखा, जिसको पढ़ते मैं बड़ा हुआ था... उनको बताया कि उनकी किताब पढ़ी है कालाहांडी पर तो बोले कि कोई ढंग का लेखक नहीं मिला जो मेरी किताब पढ़नी पड़ी... ऐसे सहज हास्य बोध वाले गुरू थे आलोक तोमर....शब्दों के महारथी के पास कॉपी चेक कराने के लिए होड़ मची रहती, आलोक तोमर से अपनी स्क्रिप्ट चेक करा लेने का मतलब था कि अब कोई ग़लती नहीं बची है... कई बार तो गलती होने पर कई बार झूठ ही कह दिया जाता कि आलोक जी ने कॉपी देख ली थी, और तात भी इसे अपने सर लेकर न जाने कितनों की नौकरी बचा चुके थे... लेकिन जो स्क्रिप्ट खराब होती, उसका एक ही प्राप्य था Ctrl+A के साथ संहार मतलब डिलीट.

एक दिन मैं लिख रहा था, तात अचानक मेरे पीछे आकर खड़े हो गए, अचानक थोड़ी देर बाद कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस किया तो मुड़ कर देखा... हैरान भी था और असमंजस में भी न जाने क्या गलती हो गई कॉपी में पर तभी तात बोले,"बालक बहुत अच्छा लिखते हो... मैं इस उम्र में ऐसा नहीं लिखता था... आगे जाओगे... मुझसे भी आगे..." मैं हैरान था... इतना बड़ा ह्रदय... इतना बड़ा आशीर्वाद... और इतना बड़ा आदमी...अगले दिन उनको सर कहा तो बोले सर मत कहा करो, मैंने कहा कि और कुछ मुझे नहीं सुहाएगा, तो बोले कुछ भी सोचो और कहो...मेरे मुंह से अनायास निकला कि तात कहूं आपको... बोले कि ठीक है चलेगा, और उसी दिन से आलोक तोमर मेरे तात हो गए.

आलोक तोमर अपनी तरह के एक और इकलौते प्राणी का नाम था... भय और परवाह जैसी चीज़ न तो उनके व्यवहार में थी, न आंखों में और न ही मन में... सम्पादकीय की बैठक में आलोक तोमर वो अकेले शख्स हुआ करते थे, जिनकी लगभग रोज़ राहुल जी से ख़बरों के ट्रीटमेंट को लेकर बहस होती थी... ज़ाहिर है राहुल जी भी शायद इसीलिए उन्हें लाड करते थे कि वो अपनी बात ज़रूर रखते थे और हां में हां मिलाने वालों में से नहीं थे... आलोक जी जब उग्र होते तो राहुल जी प्यार से आलोक संयम से.... आलोक तुम बहुत अधीर हो... ऐसा कहते और आलोक जी कई बार रूठ जाते तो उनको मनाने में हम सबको लगना पड़ता... उनके बचपने के भी कई किस्से हैं पर वो फ़ुर्सत से.

चैनल का ध्वजवाहक कार्यक्रम महाख़बर लिखने का ज़िम्मा आलोक तोमर और उनकी टीम पर होता, जिसमें आलोक जी के सेनापति होते श्रीपति जी और हम लोग होते सैनिक... राहुल देव जैसे सौम्य और संयत प्रस्तोता के लिए शब्द लिखते आलोक तोमर जिनके तेवर बिल्कुल उलट, पर यकीन मानिए, टीवी समाचारों के सबसे अद्भुत और जानदार कार्यक्रमों में से एक हुआ करते थे वो एपिसोड्स... पर उसके लिए आलोक जी न जाने किस-किस से झगड़ते... किस किस से नाराज़ होते... किसे-किसे उनकी डांट सुननी पड़ी और फिर किस-किस को उन्हें जाकर मनाना पड़ता... दफ्तर के सबसे बड़े ओहदेदार से लेकर गेट पर तैनात गार्ड तक, सबसे आलोक जी का एक ही सा रिश्ता... स्नेह का... सबको तात खूब लाड करते, और सब तात को खूब लाड करते.

एक-एक आदमी के जीवन की निजी परेशानियां उनको पता थी क्योंकि सबका दुख दर्द-बांटते थे तात... सब उनको अपने परिवार का बड़ा मानते थे सो कैसी भी समस्या हो, निदान तो आलोक सर के पास ही होगा... और वाकई उनके पास निदान होता था... वो जानते थे कि किसी भी समस्या को आधा केवल उसका भय खत्म कर के ही कर दिया जाता है... सो उनका पहला वाक्य होता था,"अरे तो घबराने की क्या बात है बालक...अपन हैं न देख लेंगे..." और जब आलोक तोमर कह देते कि वो आपके साथ हैं तो बताइए भला आप किससे डरेंगे.

ऊषा लाल दरवाज़े के साथ खड़ी आलोक जी की निष्प्राण देह को देख लगातार रोती जा रही थी... उसे याद आ रहा था कि किस तरह हर बार आलोक जी ने उसकी कार्यालयी औपचारिकताओं से ऊपर उठ कर मदद की थी... रोया तो वीटी एडीटर अनिल भी होगा जिसके बच्चे का दाखिला आलोक जी की चिट्ठी से केंद्रीय विद्यालय में हुआ... रुम्मान जब ये ख़बर कन्फर्म करने के लिए मुझसे बात कर रहा था तो पहली बार उसकी आवाज़ की शोखी गायब थी... असाइनमेंट से संतोष का गला ये पूछते भर्राया जा रहा था कि मयंक भाई फ्लैश चलवा दें... सरफ़राज़ जब श्रद्धांजलि का पैकेज लिखने के लिए फोन पर बात कर रहा था, उसका भी तो चश्मा भीगा हुआ था... भास्कर का भी बुरा हाल था.... रोशन फोन पर भौचक्का था... नमिता जी बस इतना बोल पाईं,"क्या... आलोक जी चले गए..." उमंग जी भी बौखलाए से थे... श्रीपति सर शांत थे... अरविंद भाई स्तब्ध... कैमरामैन वीर सिंह बेहद भावुक होकर शूट कर रहा था... कुलदीप तो पहुंच भी नहीं पाया... देव एंकरिंग कर रहा था और अपने गुरुवर को दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से हेडलाइन बनते देख रहा था.

देव किससे शास्त्रार्थ करोगे अब... सबसे दुर्भाग्यशाली मैं... जो एक दिन पहले रात को ही उन्हें छोड़ कर अस्पताल से लखनऊ गया था सिर्फ़ एक दिन के लिए और लखनऊ पहुंचते ही फोन आ गया... विजय शुक्ला बस इतना ही बोल पाए, "आलोक जी नहीं रहे..." मेरे आस पास लोग रंग खेल रहे थे... गीत बज रहे थे... और तात हमारे मानस पर एक स्थायी रंग छोड़ कर जा चुके थे... कोई डेढ़ साल पहले प्रभाष जी के देहावसान के समय मैं दफ्तर से फोन पर था और दूसरी ओर से तात प्रभाष जी पर पैकेज लिखवा रहे थे... समय की इस बार उल्टी मार थी... सरफ़राज़ उसी दफ्तर से फोन पर था और इधर से मैं आलोक जी पर पैकेज लिखवा रहा था... तात ये क्या कर दिया आपने... ऐसा दुर्भाग्य मेरा... ये भी मेरे हिस्से में ही आना था.

मेरा उनसे हर दूसरे रोज़ झगड़ा होता... कभी सामने तो कभी फोन पर... मैं हर बार कहता कि तात कितना लड़ते हैं आप... तात कहते कि चम्बल का हूं गोली से नहीं ज़ुबान से मारता हूं... मैं कहता कि आप गलत हैं तो वो कहते कि बड़ा कौन है... और फिर मैं कहता कि बड़ों की तरह आप रहते कहां हैं... आप तो बच्चे बने रहते हैं... पर तात बहुत बड़े थे... शब्दों का ऐसा बाज़ीगर कभी नहीं देखा, इतना ज्ञान... एक एक तारीख रटी रहती थी उनको... टाइप नहीं करते थे, पर सारे एंकर लिंक हम सब उन्‍हीं से लिखवाते... टाइप हम करते और वो डिक्टेट करते... पैकेज पढ़ा हो उन्होंने या न पढ़ा हो, बस एक लाइन में एंगल पूछते और फिर एक सेकेंड से भी कम वक्त में सोच कर कहते लिखो... और ऐसे आश्चर्यजनक एंकर लिंक मैंने तो कभी नहीं देखे... कार्यक्रमों के नाम भी आलोक जी ही सुझाते... और उनके कहे को काटना तो वैसे भी किसी के बस का नहीं था.

लिखते पर तात कभी नहीं सोचते कि इसके छपने के बाद क्या होगा... एक बार ओम पुरी के उनके लेख को टाइप करते-करते मैंने बीच में कहा, "तात क्यों लिख रहे हैं आप ऐसा? ओम पुरी आपके पुराने मित्र है... आपकी दोस्ती टूट जाएगी..." तात का उत्तर था,"सच लिखने से दोस्ती टूटती है तो भाड़ में जाए ऐसी दोस्ती..." यही ठसक... यही दबंगई और यही ज़िद्दी धुन हमेशा रही तात के अंदर... कितनो ने ही गालियां दी, आरोप लगाए पर जो उनको जानते उन्हें मालूम है कि आलोक तोमर वाकई आदमी होने लायक आदमी था... एक ऐसे दौर में जब बड़े पत्रकार केवल टीपी रीडिंग भर के पत्रकार रह गए हों... गोष्ठियों और सेमिनारों तक में दलाली की पत्रकारिता को सम्पादक जायज़ ठहराने लगे हों... एक ऐसे समय में जब बुढ़ापे में वरिष्ठ पत्रकारों में सबसे बड़ा दलाल कौन है की होड़ मच गई हो... जब कोई भी ऐरा गैरा सम्पादक बन जाता हो... जब शब्द और अर्थ मजबूरी के कारागृह में कैद हों और सच्ची पत्रकारिता पूंजीपतियों की तिजोरियों में... स्विस बैंक के लॉकरों में बंद हो... आलोक तोमर अकेले ही लड़े जा रहे थे.

प्रणय रॉय वाले उनके दोनों लेख सबको याद होंगे... मैं अपने साथियों में जल्दी-जल्दी नौकरी छोड़ने और ज़िद्दी होने के लिए बदनाम हूं... और आपको बताऊं कि मैं कोई महान पत्रकार नहीं पर अड़े रहने और ज़ुबान खोलने की प्रेरणा मुझे तात से ही मिलती रही... मेरे जैसे युवा पीढ़ी के तमाम अक्खड़ों के लिए आलोक तोमर लीडर थे... तात कहां मझधार में छोड़ गए हमको... आपकी बहुत ज़रूरत थी... क्योंकि हम में से कोई भी आलोक तोमर बनने की हैसियत नहीं रखता है... कुछ साल और रुक जाते तात... आप ने देखा कि कैसे आपके शव तक से ये लोग आंखें नहीं मिला पा रहे थे... तात आप के जाने से लगता है कि सर से छत हट गई है और अब संघर्षों की कड़ी धूप में काम करना होगा... आरोपों की बारिश भी झेलनी होगी... और दुष्चक्रों की हवाएं भी चलेंगी.

तात आपको पता है कि आपकी अंतिम यात्रा में वो लोग भी आए थे, जिन्होंने आप के खिलाफ़ जनसत्ता में षड्यंत्र किए...लेकिन तादाद उनकी ज़्यादा थी जो आपको बेहद प्यार करते थे... कई ऐसे भी थे जो आपसे कभी मिले भी नहीं थे... और हां उन्हीं लोगों की भीड़ ने मुझे दोबारा यकीं दिलाया कि आपकी लड़ाई खत्म तो नहीं होने वाली है आसानी से... और हां एक बात और कि आलोक तोमर कैसे मर सकता है... आप ने रास्ता बना दिया है बाकियों का नहीं पता पर मैं वादा करता हूं कि आजीवन उस पर चलने की कोशिश करूंगा... डगमगाऊं तो अवचेतन में आकर एक बार डांट के कहना बालक संभल जाएगा... ज़ाहिर है मैं आलोक तोमर नहीं... तात 5 फरवरी 2011 को आपने फेसबुक पर निदा फ़ाज़ली की एक नज़्म डाली थी, बस उसी में मेरा आपका रिश्ता छुपा है... स्मृतियां बसी हैं....

तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,

मुझे मालूम था, तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था।

मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी।

कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं।

बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम।

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,

कभी फुरसत मिले तो फातहा पढ़ने चले आना।

लेखक मयंक सक्‍सेना आलोक तोमर के शिष्‍य है.


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