शायद मोबाइल पर उनकी आवाज आ जाए कैसे हो यार!

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आलोक तोमर के बारे में 2006 की शुरुआत से पहले मैंने सिर्फ खबरों के जरिए ही जाना था। सोचता था कि कैसे आदमी होंगे। कहां से खबरे खोज लाते होंगे। कैसे इतने सारे बड़े लोगों से एक साथ मोर्चा खोल लेते हैं। पर 2006 में इंडियन एक्सप्रेस में आने के बाद जनसत्ता के अंबरीश कुमार से उनके बारे में काफी कुछ सुना। एक्सप्रेस के अंग्रेजी दां माहौल में अंबरीश जी सबसे ज्यादा या तो मुझसे बात करते थे या फिर बाद में ज्वाइन करने वाले वीरेंद्रनाथ भट्ट जी से।

अंबरीश जी से पास किस्सों का पिटारा रहता है और आलोक जी इसमें सबसे ज्यादा शुमार रहते थे। बाद में एक बार अंबरीश जी के साथ रामगढ़, जिला नैनीताल जाना हुआ तो पता चला कि ये जगह आलोक तोमर को काफी पसंद है और वो वहीं बसने की सोच रहे हैं। आलोक जी से पहली बार फोन पर बात काफी बाद में 2008 में हुयी, जब एक रात अंबरीश जी का रामगढ़ से फोन आया और वो बोले यशवंत तो आपके पुराने साथी हैं। मेरे हां कहने पर बोले लीजिए आलोक तोमर से बात करें। मैं सकते में। दूसरी ओर से जोरदार आवाज में एसे बात शुरू होती है कि लगा हम एक दूसरे को बरसों से जानते हैं। दो मिनट की बातचीत में इस कदर घुल मिल गए कि लगा नहीं कि इतने सीनियर और नामचीन से बात हो रही है। किसी खबर को जो भड़ास पर लगनी थी उसे लेकर मजाक किया बोले यार यशवंत से बोलो कैसा ठाकुर है। डर गया। मैंने कहा नहीं ये नहीं होगा। तो फिर मजाक में बोले यार मैं तो चंबल वाला हूं तुम लोग पूरब वाले जल्दी डरते हो।

बस इसके बाद अक्सर दो तीन महीनों में फोन पर बात होती। कई बार तो किसी साइट पर कुछ छपता तो बोलते जरा पढ़ो और बंद करो इसकी बोलती कमेंट लिख कर। लोकसभा चुनाव के दौरान 2009 में जरूर उनने वादा किया कि लखनऊ आता हूं पर नहीं आ सके। मेरा दुर्भाग्य कि मुलाकात हो न सकी। 2009 में रामगढ़ गए तो लगभग सभी मिलने वालों ने बड़े गर्व के साथ एक प्लाट दिखाया और बताया कि ये आलोक तोमर जी का है। एक बार अंबरीश जी के साथ जरूर प्लान बना कि जब आलोक जी हों तो बैठक रामगढ़ में जमे, पर उस दिन के करीब आने से पहले वो बीमारी की चपेट में आ चुके थे। पहली बार जब कीमो करा के लौटे तो मैंने स्वास्थ की जानकारी के लिए फोन किया। दिल में लग रहा था पता नहीं बीमारी के बाद कमजोरी होगी, बात हो पायेगी या नहीं। पर नहीं उसी कड़क आवाज में छूटते ही बोले अरे नहीं यार। इतनी जल्दी मैं जाने वाला नहीं। अभी तो कई की खाट खड़ी करके जाउंगा। सचमुच बीमारी से पहली बार उठने बाद उन्होंने गजब का साहस दिखाया। अखबारों, साइटों और पत्रिकाओं में लिख लिख कर झड़ी लगा दी उन्होंने। भड़ास पर एक ही दिन में दो-दो पोस्ट नजर आते उनके। हम लोग भी खुश थे कि दादा से कैंसर भी हारा।

बस उसके बाद मार्च 15 का मनहूस दिन था जब मैने भट्ट जी को फोन किया। फोन पर आते ही वो बोले आलोक तोमर की हालात खराब है ज्यादा। बोले बात कर लो। फिर खुद बोले अंबरीश जी से हाल ले लो वो बहुत डिस्टर्ब हैं। अंबरीश जी ने बताया कि हां बात सच है। पहली बार अंबरीश जी, जो शायद भगवान को नहीं मानते, प्रार्थना कर रहे थे। मन खराब हुआ। मैं गांव होली के लिए निकला 19 को और 20 की दोपहर आए एसएमएस ने आलोक जी के न रहने की खबर दी।

सच तो ये है कि खबर सुनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि चाह कर कई दिनों तक कुछ लिख पाने की हिम्मत नहीं हुयी। भड़ास को दिन भर रिफ्रेश करता और पढ़ता। सचमुच देश भर में मेरे जैसे कितने हैं जो आलोक जी को इतना चाहते थे। कइयों ने लिखा कि कैसे पहली बार में बेतकल्लुफी से बात शुरू करते थे आलोक जी। भोपाल के एक साथी ने पहली बातचीत में ही अपनी दिक्कत बतायी और कैसे उन्होंने उसे राह सुझायी। जाने कितने हैं जिनसे उनकी सिर्फ फोन पर ही रब्त-जब्त थी। अमिताभ ठाकुर भी उनमें से एक हैं। मोबाइल से उनका नंबर शायद मेरी तरह बहुत लोग कभी डिलीट नहीं करेंगे। पता नहीं सब झूठ हो और एक दिन फोन पर आवाज गूंजे कैसे हो यार. तेरा एक्लाख देता है पता तेरी बुलंदी का, तेरा ये झुक के मिलना कह रहा है, आसमां तू है."

लेखक सिद्धार्थ कलहंस बिजनेस स्‍टैंडर्ड के प्रिंसिपल करेस्‍पांडेंट हैं.


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