ट्रेफलगार स्क्वैयर और आलोक जी

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फरवरी के दूसरे सप्ताह में आलोक जी का कुशल क्षेम जानने के लिए मैं ग्वालियर से दिल्ली गया था। उनकी बैठक में लंदन के ट्रेफलगार स्क्वैयर का चित्र टंगा था। ट्रैफलगार के यु़द्ध में इंग्लैंड की नौसेना के कमांडर नेलसन ने नेपोलियन के जहाजी बेड़े को नेस्तानाबूद कर दिया था। नेलसन इस भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। अंग्रेज जाति ने उन्हें वीर शिरोमणि का दर्जा दिया।

चलते समय मैंने अपनी उत्सुकता प्रकट करते हुए पूछा कि ‘ट्रेफालगार स्कैयर से आपको विशेष अनुराग है?’ आलोक जी ने बताया ‘नेलसन की अप्रतिम वीरता का मैं प्रशंसक हूं। कुछ समय पहले इंग्लैंड गया था तब यह चित्र भेंट में मिला था।’

अब जब आलोक जी हमारे बीच नहीं हैं तब हमें उनका समूचा जीवन ट्रेफलगार के युद्ध की तरह ही नजर आता है। टर्नर के बनाए उस युद्ध के चित्रों को अगर आप देखेंगे तो उसमें आलोक तोमर के जीवन की छवि नज़र आएगी। मेरे लिए यह एक आश्चर्य की बात रही कि सन 1986 में छपी उनकी पुस्तक ‘प्रति-समाचार’ की भूमिका राजेन्द्र माथुर सरीखे देश के शीर्षस्थ सम्पादक ने लिखी। तब आलोक जी पच्चीस-छब्बीस साल के ही रहे होंगे।

आलोक जी

गत चौदह वर्षों से मेरा उनसे संवाद था, जो साल दर साल गहरी आत्मीयता में बदलता गया। साल भर पहले ग्वालियर स्थित लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हमारे खेल पत्रकारिता के विद्यार्थी उनसे रूबरू हुए थे। उन्होंने हँसते हुए कहा था ‘आप गलत आदमी को पकड़ लाए। मैंने तो अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में नींद के झोंके में ऐसे खिलाड़ी से शतक बनवा दिया था जो इस दुनिया से वर्षों पहले चला गया था।’

आलोक जी के जीवन का सबसे बड़ा प्रेरणादायी तत्व यह है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता से लगभग डेढ़ दशक तक बाहर रहकर भी वे निरंतर अपने लेखन के कारण चर्चा में रहे। आज देश में संपादक बहुत हैं पर उनकी लेखनी की स्याही सूख गई है। इसके विपरीत आलोक जी प्रतिदिन कुआं खोदकर पानी पाने के अंदाज में लिखते थे। उनके लेखन को देखकर महाप्राण निराला के बारे में कही गयी पंक्ति याद आती हैं - ‘वह हिन्दी का कवि था, जो खून सुखाकर लिखता था।’

लेखक जयंत सिंह तोमर ग्‍वालियर के एलएनयूपीई खेल प्रबंधन एवं खेल पत्रकारिता में लेक्‍चरर हैं.


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