बिहार में अब खबरें वही, जो सरकारी विज्ञापन दिलाए

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बिहार की मीडिया में खबरें वही बनती है, जिससे सरकार खुश रहे और सरकारी विज्ञापन मिलता रहे. ऐसा कोई भी मीडिया हाउस नहीं हैं, जो सरकार के खिलाफ मुंह खोलने की कोशिश करे. खबरें वही बनाई जाती हैं, जिससे सरकार का मन मोह लिया जाये. बेचारे पत्रकार भी ऐसी खबर लिखते हैं, जिससे विज्ञापन पर रोक न लगे. वैसे भी सरकार की कमियों पर खबरें अखबार में छापी नहीं जाती हैं, तो बेचारे पत्रकार क्‍या करें.

जब सुबह जनता ऐसी खबरों के बारे में पत्रकार से पूछती हैं तो पत्रकार के पास जवाब नहीं होता देने को. खबरे ये नहीं बनती कि करोड़ों के मालिक का नाम बीपीएल सूची में हैं, इंदिरा आवास का पैसा साहब डकार गये हैं, गांव में किरासन नहीं मिलता गरीबों को समय से, मनरेगा का पैसा नहीं मिलता काम करने वालो को. अब खबरें वही बनती हैं जिसमे मीडिया का अपना स्वार्थ हो.

लेखक मनीष कुमार बिहार में पत्रकार हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by santosh, March 28, 2011
manish ji ne bilkul sahi likha hai. ye hal sirf akhbaron ka nahin hai. bihar ka regional chhanel bhi iski chapet main hai.ad lana koi buri bat nhin hai,lekin ad ki aar main sarkar ke khilaf khabren nahin dikhana janta ke sath dhokha hai. bihar ke electronic media mai to sarkar ke khilaf dharna pardarshan dikhane main kathit sampadak se puchhna parta hai. bihar main nitish raj main aghosit censorship lagu hai.
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written by vijay madhesia, March 28, 2011
Nice coment Manis ji
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written by vijay madhesia, March 28, 2011
100%...... Sahi Manis ji
par ab kamau ho chuke akhabar me iska asar v to nahi parne wala.
ab to boss, Editor v total editorial hi add ki jugar me lag gaye hai. Aise me Tis mar khan bane reporter ka Teer to fussss... hoga hi
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written by एक पत्रकार, March 27, 2011
मनीष ये बात सौ आने सच है। आज जो भी पत्रकार बिहार के चैनलों में बैठे है वे सालों से बिहार से दूर रहे है और कभी ये पत्रकार अपने को बिहारी नहीं मानने थे। लेकिन समय के साथ ये गिरगिट बन गये और अब "बिहार मामलों के विशेषज्ञ" बन कर यहां के लोगों को उल्लू बनाते है। गांव के बारे में इनको कुछ पता नही होता। सरकारी योजनाओं के बारे में इनकी जानकारी शून्य होती है। लेकिन चापलूसी के लिए ये क्या न करें। मालिक की चापलूसी,पीआर के लिए बिहार के नेताओं की चापलूसी ये करते रहते है। अगर कोई यहां का पत्रकार इन लोगों को कुछ कह दे तो (जुनियर)तो अपना अनुभव बताने लगेगें। मैं इस बात का दावा कर सकता हुं की बिहार में दो चैनल है अगर यहां के चैनलों में बड़े लेवल के लोगों का टेस्ट ले लिया जाये तो एयरफोर्स का भी सामान्य ज्ञान नही बता पायेगें। रही बात बिहार की समस्याओं की तो इनको इससे कोई लेना देना ही नही है क्योंकि ये तो यहां लूटने आये है ये एक तरह से लूटेरे है।
ये तब क्यों नही आगे आये जब बिहार में अराजकता थी या फिर उन खबरों को अपने चैनलों में क्यों नही दिखातये। उस समय अगर कोई बिहार से उनको कोई लेना देना नही होता था।
इनसे सचेत रहने की जरुरत है ये बिहार को चुना लगाने के लिये आये है।
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written by एक पत्रकार, March 27, 2011
मनीष ये बात सौ आने सच है। आज जो भी पत्रकार बिहार के चैनलों में बैठे है वे सालों से बिहार से दूर रहे है और कभी ये पत्रकार अपने को बिहारी नहीं मानने थे। लेकिन समय के साथ ये गिरगिट बन गये और अब "बिहार मामलों के विशेषज्ञ" बन कर यहां के लोगों को उल्लू बनाते है। गांव के बारे में इनको कुछ पता नही होता। सरकारी योजनाओं के बारे में इनकी जानकारी शून्य होती है। लेकिन चापलूसी के लिए ये क्या न करें। मालिक की चापलूसी,पीआर के लिए बिहार के नेताओं की चापलूसी ये करते रहते है। अगर कोई यहां का पत्रकार इन लोगों को कुछ कह दे तो (जुनियर)तो अपना अनुभव बताने लगेगें। मैं इस बात का दावा कर सकता हुं की बिहार में दो चैनल है अगर यहां के चैनलों में बड़े लेवल के लोगों का टेस्ट ले लिया जाये तो एयरफोर्स का भी सामान्य ज्ञान नही बता पायेगें। रही बात बिहार की समस्याओं की तो इनको इससे कोई लेना देना ही नही है क्योंकि ये तो यहां लूटने आये है ये एक तरह से लूटेरे है।
ये तब क्यों नही आगे आये जब बिहार में अराजकता थी या फिर उन खबरों को अपने चैनलों में क्यों नही दिखातये। उस समय अगर कोई बिहार से उनको कोई लेना देना नही होता था।
इनसे सचेत रहने की जरुरत है ये बिहार को चुना लगाने के लिये आये है।

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