महामहिम! ये सरकार भ्रष्ट, निकम्मी और निर्लज्ज है

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दीपकअपनी विशिष्टताओं और विरोधाभाषों के साथ भारतीय लोकतंत्र की छतरी के नीचे अपने उत्तराखंड ने अलग राज्य के रूप एक दशक की उम्र पार कर ली है। आपकी सरकार जो कह रही है उस पर यकीन करें तो उत्तराखंड में विकास की बाढ़ आई हुई है, और निशंक सरकार राज्य को देश का मॉडल स्टेट बनाने पर तुली हुई है।

वह गरीबों की हितैषी है और बेमानी उसके सिरहाने फटक भी नहीं सकती। वह इतनी ईमानदार है कि अगर कोई उस पर पत्थर उछाले तो खरोच फेंकने वाले पर ही आते हैं। महामहिम आपने राज्य विधानसभा के बजट सत्र के उदघाटन भाषण में अपनी सरकार की चालू और भावी योजनाओं का जो गौरव गान किया है, वह बताता है कि निशंक सरकार का दामन हद दर्जे तक साफ सुथरा है, वह किसी पवित्र गाय की तरह है, जिसकी पूंछ पकड़ कर उत्तराखंड के निवासी जीव-जन्तु मोक्ष की कामना कर सकते हैं।

हालांकि हम जानते हैं कि विधानसभा में राज्यपाल या फिर संसद में राष्‍ट्रपति द्वारा पढ़ा जाने वाला अभिभाषण सरकार द्वारा ही तैयार किया जाता है। इसमें आपकी कोई भूमिका नहीं होती है। आप चाहें तो फिर भी बिगड़ैल सरकार के कान नहीं मरोड़ सकतीं हैं, यही हमारे लोकतंत्र का विरोधाभास है। वह संविधान के संरक्षकों के भी हाथ बांधे हुए है। वह सच को सच नहीं कहने देते। सरकारें जो कुछ लिखकर देती हैं, आपकी विवशता होती है कि उसे जैसा का तैसा पेश करना होता है। इस स्थिति में भ्रष्ट और घोटालेबाज सरकारों को भी पाक-साफ बताने की मजबूरी होती है।

बजट सत्र में महामहिम आपको सरकार द्वारा अभिभाषण का जो पर्चा थमाया गया, उसमें सच कम, वह झूठ और छलकपट का पुलिंदा ज्यादा लगता है। मसलन, आपके अभिभाषण के पैरा 37 में कहा गया है कि आपकी सरकार शासन और प्रशासन में स्वच्छ छवि देने में सफल रही है। महामहिम, अब भला यह बात किसके गले उतर सकती है। सरकार के दामन पर किसी एक घोटाले के दाग लगे होते तो मान भी लेते कि इसे ज्यादा तूल देना ठीक नहीं, लेकिन इस सबकी तो आप भी गवाह रही हैं कि यहां निशंक सरकार घपले-घोटालों में किस तरह आकंठ डूबी हुई है।

यह सरकार कब रहेगी और कब चली जाएगी, हर दूसरे माह अदालत में चलने वाली सुनवाइयों पर लोगों की नजर होती हैं, पता नहीं कब सरकार के मुखिया नप जाएं। ज्यादा दूर न भी जाएं तो निशंक सरकार के पौने दो साल के इस छोटे से अंतराल को ही देखें तो क्या कोई कम घोटाले हुए हैं। पहले छोटे-छोटे घोटाले होते थे, लेकिन अब तो एक ही झटके में करोड़ों-अरबों का खेल हो जा रहा है। हाईड्रो पॉवर, स्टर्डिया, गैस पॉवर प्लांट घोटाला, सैफ गेम्स और अब कोटद्वार जमीन जैसे घोटाले इस सरकार को भ्रष्ट, निकम्मी और निर्लज्ज कहने के लिए क्या नाकाफी है।

महामहिम यह तो रही घपले-घोटालों की बात। आपके अभिभाषण में निशंक सरकार ने जो कुछ कहा है उसमें बामुश्किल दस फीसद भी सच्चाई नहीं दिखती। उपलब्धियों के नाम पर या तो पूर्ववर्ती सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं को शामिल कर लिया गया है, या फिर झूठे तथ्य देकर आपको भी और इस राज्य की जनता को भी बरगलाने का प्रयास किया गया है।

मसलन अभिभाषण के पैरा 28 में कहा गया है कि सरकार गत वर्ष छह हजार आठ सौ करोड़ रूपये की वार्षिक योजना भारत सरकार से अनुमोदित कराने में सफल रही है। यह बात तो सौ फीसदी सच है, लेकिन ठीक सौ फीसदी सरकार का इससे भी बड़ा झूठ है। वह यह कि सरकार ने यह नहीं बताया कि वित्तीय वर्ष खत्म होने को है, लेकिन निशंक सरकार वार्षिक योजना का पचास फीसदी भी खर्च नहीं कर पाई। मार्च की रेलमपेल में अरबों रूपये ठिकाने लगाए जा रहे हैं। इस पर भी एक बड़ी धनराशि लैप्स होने की कगार पर है।

अभिभाषण में ऐसे ही कई योजनाओं का बखान किया गया है जिनमें सच कम झूठ ज्यादा कहा गया है। सरकार कहती है कि पत्रकारों के कल्याण के लिए वह बहुत कुछ कर रही है। आर्थिक सहायता से लेकर लघु और मझौले पत्र-पत्रिकाओं को अच्छा खासा विज्ञापन दे रही है। भला जिस सरकार का मुखिया पत्रकार भी हो तो इससे कौन इनकार कर सकता है। उनका मीडिया प्रेम जगजाहिर है और मीडिया में उनके प्रेमियों की कमी नहीं है।

सरकार ने यह नहीं बताया कि उसके मुखिया को चाटुकारिता कराने का बेहद शौक है। इसके लिए वे हद दर्जे का कर्मकाण्डी जतन करते रहते हैं। जो अखबार उनकी चाटुकारिता नहीं करते उन्हें वे सबक सिखाने के लिए धमकियां, प्रलोभन जैसे हथकंडे अपनाने में भी गुरेज नहीं करते। जब उन्हें लगता है कि कोई उनके काबू में नहीं आ रहा है तो वे विज्ञापन रूपी औजार का प्रयोग करते हैं। यहां तक कि अपने विरोधी पत्रकारों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए वे कुछ दल्ले किस्म के पत्रकारों को पाल पोस रहे हैं।

बात पंचायतीराज की करें तो सरकार यह तो कह रही है कि वह ग्रामीण विकास के लिए बहुत कुछ कर रही है, लेकिन यह नहीं बताती कि अब तक वह अपना पंचायतीराज एक्ट तक नहीं बना पाई। सबसे हैरान करने वाला झूठ आपकी सरकार यह कह रही है कि वह राज्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बनी लोकायुक्त संस्था को कर्नाटक और मध्य प्रदेश की तर्ज पर ताकतवर बनाने जा रही है। क्या यह किसी से छुपा है कि जब से निशंक सरकार अस्तित्व में आई है तब से लोकायुक्त नाम की संस्था मृतप्राय सी हो गई है। लोकायुक्त नाम की इस संस्था की पफैसले से किसी भ्रष्ट अपफसर को दंड मिला हो, यह किसी ने नहीं सुना।

सरकार आपसे कहला रही है कि वह गरीबों के कल्याण के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है, लेकिन ये कोशिशें आखिर दिखती क्यों नहीं। जो हमें भी और शायद आपको भी दिख रहा होगा, वह यह कि यह सरकार, इसके मुखिया और नौकरशाहों की एक बड़ी जमात इस राज्य के साथ लुटेरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। भ्रष्टाचार अपने पूरे उफान पर है और दलालों के लिए उत्तराखंड आज की तारीख में किसी स्वर्गलोक से कम नहीं। जब किसी सरकार का मुखिया ही नम्बर एक का भ्रष्ट और पतित हो तो उससे उम्मीद भी क्या की जा सकती है।

हम गलत कह रहे हैं तो हमें माफ कीजिएगा। अगर हमारी बात आपको जंचे तो यह बहस तो शुरू होनी ही चाहिए कि आखिर क्यों किसी भ्रष्ट और निकम्मी सरकार की शान में किसी राज्यपाल या राष्‍ट्रपति को कसीदे पढ़ने चाहिए। क्या हमारे संविधान के इस विरोधाभासी पहलू पर गौर नहीं किया जाना चाहिए?

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


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