जब भी बेरोजगार होता आलोकजी के पास जाता

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वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर जी के पंचतत्व में विलीन होने के बाद तय कर चुका था कि मैं कुछ नही लिखूंगा। क्योंकि जिस जिंदादिल आलोकजी से मिला था, उन्हें काल ने असमय अपने पास बुला लिया। मगर उनके साथ बिताए क्षणों को बांटना भी जरूरी समझा ताकि अपना मन हल्का हो सके।

पत्रिकारिता का पर्याय बन चुके आलोकजी कभी अपने मूल्यों से समझौता नही किया और न ही कभी किसी से हार मानी। मगर संसार का शाश्‍वत सत्य मौत के सामने उनका एक न चला और वे चिर निद्रा में सो गए। जहां तक मुझे याद है, मैं आलोकजी से वर्ष 2002 में मिला। उस समय मैं पत्रकारिता का एक नवजात शिशु था। मिलने से पहले आलोकजी के बारे में यही पता था कि यही आलोक तोमर हैं, जब वे जनसत्ता के मुख्य संवाददाता हुआ करते थे और आदरणीय प्रभाष जोषी संपादक, उस समय जनसत्‍ता अखबार का सर्कुलेशन दिल्ली में 3 लाख पहुंच चुका था। उसके फौरन बाद ही छपा था कि अब इससे ज्यादा अखबार नहीं छाप सकते मिल बांटकर पढ़िए।

उसके बाद दिमाग में था कि वही तोमर जी हैं, जिन्होंने कौन बनेगा करोड़पति का स्क्रिप्‍ट लिखा। इसके साथ कई सारी बातें मन में थीं, और हलचल था कि कैसे इतने बड़े आदमी का सामना कर पाउंगा। मगर जैसे ही मैं सामने आया कुर्ता-पायजामा में आलोक जी हाथ में सिगरेट लिए बोले- रंजीत कैसे हो? मैं आवाक रह गया कि इतने बड़े आदमी कैसे मेरे जैसे व्‍यक्ति को अपने दिल में जगह दे दिया। फिर धीरे-धीरे मैं उनके करीब हो गया। उसके बाद फिर भाभीजी सुप्रियाजी से भी घुलमिल गया। घर के लोग मुझे अपने बच्चे की तरह प्यार देने लगे। मगर बदले में मैं इतना संकोची रहा कि पूरी तरह घुलमिल नही पाया।

एक दिन की वाक्या मुझे याद है, सुप्रियाजी मेरे बारे में आलोकजी का कुछ बताने लगी, अलोकजी को लगा कि कही सुप्रिया रंजीत का बुराई न कर दें, तपाक बोल बैठे रंजीत अच्छा लड़का हैं। सुप्रियाजी भी बोली मैं भी यही कहना चाहती हूं। मैं जब भी बेरोजगार होता आलोक जी के पास जाता और पैरवी सुप्रियाजी आलोक जी से करती। आलोक जी तपाक बोल देते रंजीत मेरा भी पंसदीदा है, तुम्हें बोलने की कोई जरूरत नहीं है। मैं तो उनका पंसदीदा बना रहा मगर सुप्रियाजी से बोलने का हक जरूर आलोक जी ने छीन लिया।

लेखक रंजीत कुमार झा पत्रकार हैं.


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