पत्रकारों का खून चूसकर तिजोरी भरते हैं नईदुनिया वाले

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श्‍यामआजकल बड़े मीडिया ग्रुप में संवाददाता, ब्यूरो को नाम मात्र का वेतन दिया जाता है। जिसमें गुजारा करना बेहद मुश्किल है। कई बार इस बारे में आवाज उठाई जाती है, लेकिन प्रबंधन द्वारा ऐसी आवाज को दफन कर दिया जाता है। दिल्ली में नईदुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता लाखों रुपए प्रतिमाह वेतन लेते हैं।

ठीक इसके विपरित दिनभर सड़कों पर नईदुनिया के लिए खबर लिखने वाले संवाददाता को नाम मात्र की राशि प्रतिमाह दी जाती है। जो उँट के मुँह में जीरे के समान है। ऐसी स्थिति में नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत चरितार्थ होती है। इस अखबार के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी के पोता-पोती की शादी होती है तो करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं।

जबकि अखबार में काम करने वाले रिपार्टर को तीन से चार अंकों का वेतन दिया जाता है। ऐसे में यह पदमश्री किस काम का है। जिनके अखबार में फोटोग्राफर, रिपोर्टर का शोषण होता है। दूसरी तरफ किसी न किसी संस्करण को निकालने के नाम पर विज्ञापन की मांग की जाती है। जब वेतन का मामला रखा जाता है तो इस संस्था में कार्यरत डेस्क प्रभारी हो या स्थानीय संपादक अपनी नौकरी बचाने के लिए आश्वासन देते हैं।

यह समाचार पत्र पिछले 68 वर्षों से इंदौर समेत कई शहरों से प्रकाशित हो रहा है। ग्रामीण संवाददाताओं की हालत काफी दयनीय है। उन्हें किराया, लेटरहेड, फैक्स, मेल आदि भेजने के नाम पर ठेंगा दिखाया जाता है।

श्‍याम जाटव

नीमच

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मो. 9407145299


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