दो पुराने (आई-नेक्स्ट के दिनों के) लेखों को पढ़ने का सुख

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बहुत कम मौका मिलता है पीछे मुड़कर देखने का. लेकिन जब कभी किसी बहाने देखने का अवसर आता है तो कुछ ऐसी चीजें हाथ लग जाती हैं जिसे देखकर मन ही मन कह उठते हैं कि अरे, क्या इसे मैंने ही किया था! खासकर हम पत्रकारों के मामले में अपना पुराना लिखा-पढ़ा और आर्काइव्ड माल देखकर मन खिलखिल खिल जाता है, और खुद की पीठ ठोंक हम कह उठते हैं- वाह, क्या लिखा था. परसों ऐसे ही मेरे खुद को अपने दो पुराने लेख हाथ लग गए. तब आई-नेक्स्ट, कानपुर का संपादक था.

इस बच्चा अखबार की लांचिंग के कुछ माह हुए थे और तमाम तरह की व्यस्तताओं के बीच मैंने कैसे दो-तीन पीस लेख लिख मारे, मुझे खुद नहीं पता. लेकिन मुझे ये आलेख पढ़कर जरूर याद आ गया कि मैंने इन्हें तब लिखा था जब रुटीनी जीवन से बेहद आजिज व डिप्रेस्ड हो चुका था और किसी आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहता था. इसी मनोदशा में लिखा गया लेख है संगम तीरे न होने का दुख. उन दिनों मैं कानपुर में था और बगल में इलाहाबाद में महाकुंभ था. न जा सका था. दूसरा आलेख तब लिखा था जब नौकरी मांगने आने वालों की भीड़ में ऐसे युवक भी मिलते थे जो बेहद शरीफ, भोले और इन्नोसेंट हुआ करते. उनके इतने निष्पाप होने से मेरा कलेजा हिल जाता, उनके बारे में सोच-सोचकर कि ये हरामी दुनिया कैसे तिल तिल कर इनके दिलों को तोड़ेगी. इसका शीर्षक है इतने भले न बन जाना साथी. पुराने लिखे-पढ़े प्रिंटेड मालों में से ये दो मुझे सबसे ज्यादा पसंद इसलिए आए क्योंकि इन दोनों पढ़कर मुझे यकीन हुआ कि मेरे अंदर का आध्यात्मिक विकास बहुत पहले शुरू हो गया था जिसे पूरे प्रस्फुटित-प्रफुल्लित होने का मौका भड़ास ने दिया. जय हो... अपने मुंह मिया मिट्ठू. :)

पहला लेख संगम तीरे न होने का दुख 18 जनवरी 2007 को प्रकाशित हुआ और दूसरा इतने भले न बन जाना साथी एक फरवरी 2007 को छपा. आप भी पढ़िए. मैं खुद अपना पढ़कर अपनी पीठ थपथपा चुका हूं, आपको भी पसंद-नापसंद आए तो वाह या आह कह दीजिएगा. पढ़ते वक्त अंग्रेजी के शब्द भी दाल में कंकड़ की तरह मिलेंगे, उसे इगनोर करिएगा. आई-नेक्स्ट की शुरुआत में ये चूतियापे टाइप का प्रयोग हुआ था, जो शायद थोड़ा बहुत अब भी चल रहा है.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया


संगम तीरे न होने का दुख

यशवंत

अच्‍छा खासा जी-खा रहा हूं. फिर भी खुद को दुखी पा रहा हूं. दुख-सुख रोज की बात है पर अबकी कुछ नए तरह की शुरुआत है. ये ताजा दुख क्‍यूं है? आपने भी सुना होगा, जो मिल जाए कम है, जो न मिले उसका गम है. और यही इस दुनिया का सरल सा नियम है. फिलहाल जो मेरा गम है, उसकी वजह वो सुंदर संगम है.

संगम तीरे बसी दुनिया के सुर-लय-ताल के संग न जी पाने का मलाल है. इसके पहले भी पुण्‍य मौकों पर नहान के लिए लाखों लोगों की जुटान संगम तीरे हुआ करती थी. वहां की खबरें पता चलती थीं, तस्‍वीरें दिखा करती थीं, पर उनको लेकर मन में वो धमाल न था, जो आजकल है.

तब शायद छोटे-छोटे सुखों से मन भरा न था, बड़े-बड़े दुखों से दिल डरा न था. रुपया-पैसा, कैरियर-बिजनेस, खाना-पीना, मौज-मस्‍ती, सफलता-तरक्‍की, घर-मकान, बीबी-बच्‍चे, लड़ाई-झगड़ा, पढ़ना-सीखना, आत्‍ममिवश्‍वास-सम्‍मान, फक्‍कड़ी-घुमक्‍कड़ी, सेक्‍स-संगीत... जैसे ढेरों सुख-दुख, कभी आस तो कभी पास थे, कभी आम तो कभी खास थे. पर इनसे मन भरा न था.

ओशो याद आते हैं, भागो नहीं, भोगो फिर उबरो. बिना भोगे भाग निकले तो मन शांत न रहेगा. जितना भोगोगे उतना सीखोगे, जितना उबरोगे, उतना सहज रहोगे. कुंठित मन लेकर साधुता नहीं पाई जाती. इच्‍छाएं दबाकर सहजता नहीं पाई जाती. प्रलोभन का शिकार मन फकीरी में नहीं रम सकता, और बड़ा मुश्किल है उबर पाना, इच्‍छाओं के पार देख पाना.

कितना साफ कहते हैं कबीर, दुनिया के कारोबार के बारे में, मायामोह के बारे में जिसमें जो फंसा वो फिर अंत तक धंसा...

कबीर माया मोहनी, जैसे मीठी खांड।
सतगुर की कृपा भई, नहीं तो करती भांड़।।

(सतगुरु की कृपा से माया जैसी सम्‍मोहन गुड़ के मीठे स्‍वाद से मैं उबर सका अन्‍यथा इसके चक्‍कर में भांड़ की तरह कई रुप धरकर इस संसार में खुद को नष्‍ट करता रहता)

और

चलती चक्‍की देखकर दिया कबीरा रोए।
दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए।।

(बहुत मुश्किल है संसार के प्रलोभनों से बचकर निकल पाना, मायामोह की चक्‍की के पाटों से साफ-साफ बचकर कोई नहीं निकल पाता, दुखी हूं इससे, जार-जार रोता हूं)

छोटे सपने, छोटे सुख, छोटी सफलताएं, छोटी लालसांए, छोटे प्रलोभन... इनसे एक-एक कर गले मिलकर, इन्‍हें अपने आप विदा करने से जो सुख है, उसी के चलते बड़े सपनों, बड़ी लालसाओं, बड़े प्रलोभनों,  बड़ी सफलताओं को पाने, और उनकी ओर जाने का रास्‍ता बन पाता है. जब तक ये सब छोटे हैं, तब तक आदमी व्‍यक्तिवादी है, अपने लिए जिंदा है, अपने स्‍वार्थ के लिए चक्‍कर काटता रहता है, दिमाग लड़ाता रहता है. यह भी जरूरी है. तभी तो वह इनकी हकीकत समझ पाता है. बिना जीवन संघर्ष के इस दुनिया की सच्‍चाई सामने नहीं आती और सोच बड़ी नहीं बन पाती और, जब सोच बड़ी होगी तो इससे सबका भला होगा. अपने आस-पड़ोस समाज, प्रांत, देश और दुनिया के लिए सोचेंगे और जिएंगे. मन-मस्तिष्‍क का विस्‍तार-फैलाव होगा तभी हम पूरी मनुष्‍यता के काम आएंगे.

ऐसा लगता है मुझे, संगम तीरे समझ तीरे समझ में आती होगी वह बड़प्‍पन जिसमें अपना होना दूसरों के सुखी होने में निहित है. अपने वजूद को पूरी मनुष्‍यता के दुखों को खत्‍म करने में लगाने की समझ आती होगी. खुद को यूं ही नष्‍ट न कर देने की लालसा पैदा होती होगी.

सच्‍ची कहूं हम सब भरे पेट वाले चकमक रंग-रंगीली दुनिया के लोग, जो एक-एक प्रोडक्‍ट का स्‍वाद वाह-वाह कहते उठा रहे हैं, जब संगम तीरे पहुंचेंगे तो उन लोगों से पहले नए सच को समझ सकेंगे, जो अभी बाजार के दायरे में ही नहीं आए हैं, और बाहर खड़े होकर बाजार को चुंधियाई निगाह से निहार रहे हैं, मौका मिलते ही उसमें घुसने के लिए धक्‍कमधुक्‍का किए हैं. तभी तो, बुद्ध बड़ी आसानी से अपने महल और अपनी सुंदर पत्‍नी-बच्‍चे को छोड़कर आवारापन-बंजारापन वाला जीवन जीने चुपके से निकल लिए और घूमते-टहलते-साधना करते-सोचते एक दिन एक झटके में खोज लिया- मनुष्‍य के दुखों का कारण और उससे उबरने की राह.

वो और लोग थे, उनका दौर कुछ और था. अब तो हर आदमी में है दस-बीस आदमी, हर दु:ख में हैं दस-बीस दु:ख. हर सुख में हैं बस चंद क्षणों का सुख... कब आया और कब हो गया फुर्र.

संगम इसीलिए याद आ रहा है, कि वहां जाकर शांत और सुखी से दिखने वाले अपन लोगों के जीवन में असली सुख और शांति इंज्‍वाय कर रहे साधु-संत लोगों को निहारने और उन्‍हें बूझने का मौका मिलता. रेत में पालथी मारकर ध्‍यान और योग करता.

खुली और शुद्ध हवा में जी भर अंदर तक खींचकर सांस लेता. प्रकृति के करीब जीता, उसका प्‍यार मिलता... सुख और मोक्ष की खोज में विभिन्‍न पंथों, अखाड़ों मठों और संप्रदायों के लोगों के साधना पथ को जानने का मौका मिलता.

वाकई, संगम तीरे मुनष्‍यता-साधुता और सहजता का विश्‍व कप हो रहा है. इसमें विभिन्‍न विचारधाराओं और देश विदेश की टीमें अपनी पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ भाग ले रही हैं. यहां न कोई हारता है और न जीतता है. यहां महान मनुष्‍यता को प्राण वायु मिलती है. तभी तो हम भारतीय सनातन काल से भौतिक और आध्‍यात्मिक दुनिया के सुखों-दुखों के बीच संतुलन साधते संपूर्ण जीवन जी पाते हैं. और, तभी खुश होकर कबीर गुनगुनाते हैं-

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।
पाछे-पाछे हरि फिरें, कहत कबीर-कबीर।।

इस बार मन में इच्‍छा जगी है तो उम्‍मीद है, अगले नहान में संगम तीरे जरूर तनेगा अपन का भी तंबू. इस बार दूर से ही प्रणाम.

लेखक i-next से जुड़े हैं.

18 जनवरी 2007 को प्रकाशित

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इतने भले न बन जाना साथी

यशवंत

वह डंडे की तरह सीधा-साधा, चाकलेट की तरह प्‍यारा है और गुब्‍बारे की तरह innocent - सुई गड़ाओ- हवा निकालो. न उलटा-सीधा काम करता है और न ऐसा करने वालों को पसंद करता है, ऐसे लोगों से दोस्‍ती रखना तो दूर की बात है. दिल का धनी है, रिश्‍तों को emmotionaly जीता है. घर-परिवार और मां-पिता की दुआएं हर रोज लेता है. उसे लोग मूर्ख बना जाते हैं और वो बन भी जाता है, लेकिन इसमें उसे कुछ भी खराब नहीं लगता. बस, मन ही मन इतना जरूर कहता है, हे ईश्‍वर उन्‍हें माफ कर दे, वे नहीं जानते कि वे क्‍या कर रहे हैं. उसके दिल में प्‍यार, ईमानदारी, नैतिकता लबालब भरी है. वो बदमाशी के बारे में सोच तक नहीं सकता, करना तो बहुत दूर की बात है... ऐसे नौजवान के बारे में आपकी क्‍या राय है?

ज्‍यादातर का दिल कहेगा, बहुत अच्‍छा बंदा है. ऐसे हीरे आज के दौर में मिलते कहां हैं. इसे तो म्‍यूजियम में संजोना चाहिए. पर मेरी राय पूछेंगे, तो मैं अब ऐसा हरगिज नहीं मानता. मतलब, पहले ऐसा मानता था, इनको चाहता था, इनके लिए दिल से दुआएं करता था, इनसे इतर सोचने पर अपने चालाक मन को पापी-पापी कहकर गरियाता था.

आज की तारीख में बात करें, तो मैं बिल्‍कुल उलट सोचने लगा हूं. आंधी-तूफान style में देश में घुंसकर हर मानव मात्र के दिलों में छा जाने वालीं market मैया के सत्‍संग से मेरे maturity lavel में जो तथाकथित growth हुई है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि उपरोक्‍त गुणों को धारण करने वाला नौजवान वर्तमान काल में बिल्‍कुल नहीं चलेगा. उसे लोग नाना प्रकार के संबोधनों से नवाजेंगे. मसलन- बिलकुल गधा है, आंख का अंधा है, रोएगा, झेलेगा, पछताएगा, धक्‍के खा-खाकर किनारे हो जाएगा, तब समझ में आएगा, लात खा लेगा तब अक्‍ल आएगी, कहीं adjust नहीं कर पाएगा, बिल्‍कुल practical नहीं है, बेवकूफों की तरह बात करता है, जब देखो तब भाषण देता है. Course complete करने के बाद भी किताबों में लिखी सिद्धांतों की बातें बताता है. Modern नहीं है, उसकी thinking set है. इसे तो साधु हो जाना चाहिए क्‍योंकि दुनिया इसके लिए नहीं बनी है और वो दुनिया के लिए नहीं बना है. उसे थोड़ा दंद-फंद तो जानना ही चाहिए था. घरवालों को थोड़ी practical knowledge तो सिखानी ही चाहिए थी. काम निकालने की बात तो बतानी ही चाहिए थी. किताबी सिद्धांतों पर जीने से रोटी थोड़े ही मिलती है. Life में कभी-कभी झूठ को सच की तरह सुना जाता है और कभी-कभी मौका देखकर झूठ को सच की तरह बोला जाता है, कभी अच्‍छी खासी आंख होते हुए भी अंधे होने की बेहतरीन acting करनी पड़ती है तो कभी अंधों के आगे बैठकर उनकी बड़ी-बड़ी आंखों में झलकने वाले vision की तारीफ करनी पड़ती है. कभी बकरी की तरह मिमियाना पड़ता है, तो कभी शेर की तरह दहाड़ना पड़ता है. बस, बात है तो मौके और बे-मौके की. इतनी अकल तो होनी ही चाहिए. वरना किसी कंपनी में trainee की भी नौकरी नहीं मिलेगी. गलती से मिल भी गई तो उससे आगे नहीं बढ़ेगी. ज्‍यादा दाएं-बांए रोया-गाया तो तड़ाक से चली भी जाएगी.

जीवन अब उतना सरल-सहज नहीं रहा. बदलते दौर में हर चीज ने अपने को नया और नुकीला बना लिया है. पुराने दौर की सादगी को केंचुल की शक्‍ल देकर उससे बाहर निकलने का दौर चल पड़ा है. Original होना, original जीना और original सोचना संभव नहीं रहा. सब कुछ copy किया हुआ, नकली, dramatic, कृत्रिम, थोपा हुआ और आरोपित किया हुआ सा लगता है. सबने चाल, चरित्र और चेहरा बदला है. सफलता अब हर किसी का मूल मंत्र है- आम हो या खास. होना भी चाहिए. इसमें कोई गलत बात नहीं. यहां तक तो ठीक है, लेकिन सफल होने के लिए कोई भी तरीका चलेगा, हर कीमत पर इसे पाना ही पाना है. इसके लिए बदमाश और चतुर सुजान बनना ही पड़ेगा. सफल होने के लिए हम अपनी हड्डियां तोड़ देंगे, अपनी आत्‍मा बेच देंगे, दूसरे की आत्‍मा खरीद लेंगे.. यहीं आकर एक चीज जन्‍म लेती है जो पूरे समाज के कैरेक्‍टर में अभूतपूर्व (positive या negative, इसे खुद तय करें) बदलाव को जन्‍म देती है. इसी के कारण अपने India का मूल स्‍वभाव खत्‍म होता सा दिखता है, खासकर शहरों में तो बहुत ज्‍यादा. ऐसा नहीं कि गांव वाले पवित्र गाय हैं. उन्‍हें भी पता है कि पुलिस में बेटे की भर्ती करानी है तो लाख-दो लाख की भेंट उचित जगह चढ़ानी ही होगी. परसों गांधी जी का बलिदान दिवस मनाते वक्‍त हम जल्‍दी-जल्‍दी उनकी जिन कुछ बातों को याद कर रहे थे, उनमें एक था साध्‍य और साधन वाला सिद्धांत. साध्‍य के लिए उचित और पवित्र साधन बहुत जरूरी है. पर Market मैया ने इस बड़े नियम को इतने आराम से पूरा का पूरा निगल लिया कि किसी के पास डकार की आवाज तक नहीं पहुंची.

Branded के दौर में smile करने के भी नियम बने हुए हैं. कब, कहां और कितना smile करना है, इसे तय कर लो बंधु, वरना बहुत पछताओगे. सफलता के लिए मची झोंटा-नोचव्‍वल के इस दौर में अव्‍वल रहना है तो यूं ही बेवजह किसी बात को सोच-सोचकर दिल खोलकर हंसने की आदत से बाज आओ वरना दहाड़ें  मारकर रोना पड़ेगा. अपने प्रिय कवि वीरेन डंगवाल की वो कविता है न, इतने भोले न बन जाना साथी, जैसे सर्कस का हाथी. तो, थोड़ी चालाकी और चतुर-सुजानी जरूरी है वरना जी नहीं पाओगे. उठते-जागते जमाने वालों को गरियाओगे. बस एक गुजारिश है - इतने बदमाश न बन जाना साथी कि तुम अपने मानव जात के दुश्‍मन बन जाना. आखिरकार मनुष्‍यता ही वो मंजिल है, जहां सभी धर्मों, सभी विचारधाराओं और सभी वादों से निकले निष्‍कर्ष पर पहुंचते है. कम से कम इसे तो बचाकर रखेंगे ही, हम सब.

लेखक i-next से जुड़े हैं.

एक फरवरी 2007 को प्रकाशित


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Comments (3)Add Comment
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written by shravan shukla, April 08, 2011
naayaab... i have no words...
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written by indu, April 05, 2011
acha lekh hai kaas logo ki soch aap jaisi ho to aise log sosan se bach jaaye
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written by siddharth kalhans, April 05, 2011
क्या गुरू का लिख दिए। मजा आ गया। पर आईनेक्सट में ये भी छपता था। सोच नही सकता। मैं तो उसे कभी गंभीरता से पढ़ न पाया। इतने भले न बन जाना साथी बहुत सुंदर। डंगवाल जी की पूरी कविता लगा दें तो मजा आएगा। कुछ और पुराने निकालो भाई। डालो उनको पोस्ट पर

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