इस जश्न की स्याही से मैं ख़ौफ़ज़दा हूँ यारों...

E-mail Print PDF

मुकेश कुमारअंदेशा तो था कि तीस मार्च की रात जब भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वकप के क्वार्टर फायनल का नतीजा आएगा तो पूरा मुल्क किस तरह से प्रतिक्रिया करेगा। एक ऐसा देश जिसकी बहुसंख्यक आबादी पिछले छह दशकों से बदले की आग में तप रही हो और अपनी नफ़रत का इज़हार करने के लिए बहाने खोजती रहती हो, वह मानेगी नहीं। हार हो या जीत, हर सूरत में उसकी प्रतिक्रिया उन्माद भरी होगी।

अगर हार मिली तो उसका गुस्सा उस कौम पर उतरेगा जो कहीं से इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है और जीत मिली तो इसे वह एक कौम की जीत के रूप में लेगी और श्रेष्ठता के भाव से भर जाएगी। अपनी जीत की खुशी जताने के लिए वह आतिशबाज़ियाँ शुरू कर देगी और कई दिनों तक अपने तमाम ग़म और परेशानियाँ भुलाकर सफलता के नशे में चूर हो जाएगी। हमारा ये तज़ुर्बा कई दशकों का रहा है इसलिए कोई भी स्थिति का इस तरह से पूर्वाकलन कर सकता था। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। मगर इस मर्तबा मेरा अनुभव कुछ अलग भी रहा या हो सकता है आपमें से भी बहुत लोग इस अनुभव से गुज़रे हों। अपने अपार्टमेंट के तेरहवें फ्लोर से जीत के बाद छोड़ी जा रही आतिशबाज़ियों का नज़ारा देखने के बाद आइसक्रीम खाने की ज़िद पूरा करने मैं नीचे उतर आया। मैंने पाया कि सड़कों पर कुछ शख्स हाथों में बियर की बोतलें थामे ज़ोर-ज़ोर से भारत माता की जय बोल रहे हैं। मातृभूमि की जय बोलना कोई अपराध नहीं है मगर ये जयकार जीत की पवित्र खुशी से ज़्यादा ऩफ़रत के उन्माद से सराबोर थी। उनके चेहरों पर हिंसा तैर रही थी। जब वे भारत माता की जय बोल रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो किसी को माँ की ग़ाली देने की कोशिश कर रहे हों।

मैं उनके उन्मादग्रस्त चेहरों को देखकर भयभीत हो गया। मुझे लगा कि अभी ये मेरी ओर झपटेंगे, मुझसे मेरा नाम पूछेंगे और अपने शक़ को दूर करने के लिए मेरा पैंट उतरवाकर देखेंगे कि मैं क्या हूँ-हिंदू या मुसलमान और फिर तय करेंगे कि मेरे साथ क्या सलूक करना है। मैं अंदर से काँप गया और बेटी को आइसक्रीम दिलाकर जल्दी से वापस लौट आया। अपने ही मोहल्ले में दंगाई मानसिकता वाले जत्थों को इस तरह सरेआम उन्माद का प्रदर्शन करते हुए देख मेरा माथा ठनक गया। मैं सोचने लगा कि आख़िर मैं किन लोगों से घिरा हुआ हूँ। सोचने का सिलसिला आगे बढ़ा तो मैंने पाया कि ये दंगाई  सड़कों पर नहीं हर जगह मौजूद हैं। वे कहीं विचारों से दंगाई हैं तो कहीं अपनी हरकतों से। जैसे ही ये तय हुआ था कि क्वार्टर फायनल में पाकिस्तान से मुक़ाबला होना है दफ़्तर और बाहर लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि भले ही फायनल में हार जाएं मगर पाकिस्तान से तो ज़रूर जीतना है।

ये उनकी नज़र में राष्ट्रभक्ति थी, जबकि सचाई यही है कि ये धार्मिक घृणा से फल-फूल रहा अंध राष्ट्रवाद था। मोबाइल पर संदेश आने शुरू हो गए जिनका सार यही था कि पाकिस्तानियों से बदला लेना है, उन्हें सबक सिखाना है ( एक घटिया संदेश भारत-श्रीलंका मैच के पहले भी आया जिसमें कहा गया था कि रावण की औलादों को सबक सिखाना है)। हैरत तब हुई जब कुछ लोगों को बाल ठाकरे के इस बयान का समर्थन करते पाया कि प्रधानमंत्री को कसाब और अफ़ज़ल गुरू को भी मैच देखने के लिए आमंत्रित कर लेना चाहिए था। मैं सोचने लगा कि ये लोग पाकिस्तान के कट्टरपंथियों और तालिबानों से किस तरह अलग हैं। उनकी तरह इन्होंने अपनी धार्मिक पहचान ज़ाहिर नहीं की है और इनके हाथों में गोला-बारूद नहीं है बस। बाकी सोच के स्तर पर तो दोनों एक ही ज़मीन पर खड़े हैं और हम सब इन लोगों से वैसे ही घिरे हुए हैं जैसे पाकिस्तान का छोटा सा प्रगतिशील तबका वहाँ के जिहादियों से।

हमें कबूल करना चाहिए कि इस हालत के लिए हमारा मीडिया बहुत हद तक ज़िम्मेदार है। पूरे एक पखवाड़े तक उसने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सांप्रदायिक उन्माद और अंधराष्ट्रवाद  को जमकर खाद-पानी दिया। भारत-पाकिस्तान  के मैच को उन्होंने युद्ध  में तब्दील कर दिया और लोगों  के अंदर पाकिस्तान विरोधी भावना को खूब उभारा। उसकी भाषा युद्धोन्माद की भाषा थी, हर लाइन युद्ध गर्जना से भरी होती थी और ऐसा माहौल  बना दिया गया था कि इस मैच  को जीतना देश की प्रतिष्ठा बचाने जैसा है। अगर भारतीय टीम हार गई तो नाक कट जाएगी। हम युद्ध हार जाएंगे और एक विधर्मी मुल्क जिसे  पाकिस्तान कहते हैं जीत जाएगा (आज धोनी को धुरंधरों की पूजा हो रही है मगर यदि वे पाकिस्तान से हार जाते तो उनकी क्या गत बनती सोचा जा सकता है)। ऐसे में ये स्वाभाविक ही था कि सांप्रदायिक लोगों को बल मिलता और जो लोग खेल, सांप्रदायिकता और सियासत की बारीक समझ नहीं रखते हैं, वे भी भावनाओं में बह जाते। विश्वकप का ये कवरेज बताता है कि मीडिया के अंदर भी किस तरह के तत्व मौजूद हैं और मौका मिलते ही वे किस तरह सक्रिय हो जाते हैं और क्या कुछ कर सकते हैं।

कुछ अरसे से मैं मानने लगा था कि अब भारत और पाकिस्तान के बीच  नफ़रत पहले जैसी नहीं रही। खिलाड़ी मैदान में पहले जैसे तेवर नहीं दिखाते, बल्कि  कई बार मित्रता का इज़हार भी कर देते हैं। पाकिस्तान  जिस तरह से एक नाकाम मुल्क  के तौर पर दुनिया के सामने है और अपनी ही लगाई आग में खुद झुलस रहा है उससे हिंदुस्तानियों को एक अलग तरह के सुकून मिला है। खुशी का ये एहसास परपीड़ा से पैदा होने वाला भी है और इस भावना से भी कि जिसने हमें परेशान कर रखा था वह खुद उसकी सज़ा पा रहा है। शायद हाल के वर्षों में पाकिस्तान के एक तबके को भी ये महसूस हो रहा है कि भारत आगे बढ़ता जा रहा है और वह उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की साख ख़त्म हो चुकी है, अमेरिका अब पहले जैसा उसकी पीठ पर हाथ धरकर खड़ा नहीं है और इस सबसे उसकी लीड़रशिप को एक सबक ज़रूर मिला है। हालाँकि वहाँ की राजनीति में भारत विरोध के ज़रिए खेल खेलने की प्रवृत्ति अभी भी फल-फूल रही है। लेकिन इस सबके बावजूद हम कह सकते हैं कि हालात पहले से बेहतर हुए हैं। मगर मुझे लगता है कि मुझे अपने नज़रिए में सुधार करना चाहिए। जैसा सतह पर दिखाई देता है वैसा है नहीं। ऊपरी तौर पर तनाव और घृणा कम हुई दिखती है, मगर अंदर विषबेल ज़िदा है और मौका मिलते ही फिर हरी-भरी हो जाएगी। अच्छा लगता यदि इस बार का विश्वकप  संबंध में सुधार को थोड़ा  और हवा देता। मीडिया इसमें सकारात्मक भूमिका अदा करता और जनमानस को उस घृणा से उबारने में मदद करता जो दोनों देशों की राजनीति बढ़ाने में लगी हुई है। मगर वह साधन बन गया प्रतिशोध बढ़ाने का, हवाओं में ज़हर घोलने का। एक मीडियाकर्मी होने के नाते मैं अपराधबोध से ग्रस्त हूँ..... क्या आप भी हैं….?

लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. हाल-फिलहाल नए लांच होने वाले चैनल न्यूज एक्सप्रेस के हेड हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


AddThis
Comments (10)Add Comment
...
written by kanishak , April 07, 2011
मुकेश जी. आप सही कह रहे है वास्तव में दारु पीकर देशप्रेम दिखाने का एक चलन सा शुरु हो गया है..यकीन ना हो तो भारत पाकिस्तान वाले मैच के दिन दारु की बिक्री के आंकडो पर नजर डालें.. एक दिन में सिर्फ दिल्ली वाले 27 करोड रुपए की शराब पी गए जो कि अबतक का रिकार्ड है .. मैच की खुशी में ज्यादातर मॉल और फाइव स्टार होटलों के डिस्को भरे हुए थे .. और यहां शराब पीकर जय हो और वंदे मातरम पर देश का भविष्य कहे जाने वाले पीढी ठुमके लगा रही थी... देश भक्ति का ये जुनून ... वाह भई वाह ..
कनिष्क
...
written by फर्जी बुद्धिजीवि, April 07, 2011
शाबास,मुकेश जी......क्या विचारधारा है...शायद आप शाहिद आफरीदी की बात को प्रमाणित कर रहे हैं....आप नोबल शांति पुरस्कार के वाजिब हकदार हैं...वैसे हमारे यहां ये चलन है कि देश को,धर्म को गाली दिए बिना आदमी बुद्धिजीवि कहलाता ही नहीं....जैसे अरुंधति राय...अरे महाराज आप चैनल चलाने जा रहे हैं अभी से अपने विचार इस से प्रकट करिएगा तो आगे....भगवान जाने....वैसे जिन उपदेशों की बात आप कर रहे हैं उसे लिखने से अच्छा कि आप उसे अपने चैनल पर लागू करें....
...
written by AlycePace, April 07, 2011
If you are willing to buy a car, you would have to get the loan. Furthermore, my father all the time uses a student loan, which occurs to be really firm.
...
written by [email protected] A.>0, April 06, 2011
हा हा हा.... कितने मैच हुये, कितनी वार्तायें हुईं, कितनी नौटंकियां हुईं. पाकिस्तान ने क्या अच्छा कर दिया भारत के साथ. प्रिय सम्माननीय जरा बतायें. अगर पाकिस्तान आतंकवादी भेजना बन्द कर दे, धर्मनिरपेक्ष हो जाये तो हर जगह क्रिकेट मैच करवाया जाये और भारत की टीम से कहा जाये कि वह हर मैच हारे जानबूझ कर हारे... अफरीदी के बयान आपने पढ़े नहीं शायद...
...
written by Rajiv Kumar, April 06, 2011
मुकेशजी,
आलेख बहुत अच्छा लगा।ऐसे माहौल बना दिया जाता है जैसे दो शत्रु देश युद्ध लड़ रहे हैं।खेल,खेल नहीं रह जाता।
...
written by arvind singh, April 06, 2011
mukesh ji ka yah lekha wastav me samaz se pare hai. is lekha se unaki mansikata ka pata chalata hai, jab koi kisi wastu isthiti ki byakkhya kisi purwagrah se grasit ho kar karata hai tab aise hi bhav samane aate hai.mukesh ji ne jis tarah se ek kom vises ki pareshaani ka wardan kiya hai usame jara si bhi sachai nahi hai, kyunki aaj jitani aajaadi unhe bharat me hai utani sayad pakistaan me bhi nahi hai. lekin kya kiya jaa sakata hai jab isi tarah ke tathakathit budhijivi kahe jaane wale parni jab is tarah ki bhawana byakta karenge to jaroor jan manas bhramit hoga. wastav me is tarah se likha kar is tarah ke prani aisa man kar chalate hai ki unhe wastav me bada hi nispakchha vicharak maan liya jayega aur sayad dhaarma nirpekchhata ki wakalat karane ke liye unhe koi sanstha wagairah puraskrit bhi kar de. jabaki sachai yah hai ki match ko lekar unmaad to tha,lekin kahi is tarah ki koi baat nahi thi jo khaufa paida kar sake, ham bhi mumbai jaise mahanagar me rahate hai, jis shahar ne dango ki vibhisika jheli hai,lekin yaha bhi is tarah ka koi mahaul ya sambhawana nahi dikhi. haa log thoda jyaada khushi jaroor mana rahe the kyunki match pakistan se jeeta gaya tha aur usi khusi me sabhi log sadako par bhi utar aaye the lekin kahi kisi ko koi gaali nahi de raha tha aur nahi kisi ki bhawana aisi thi/ ab thakathit budhijivi mahoday ne bharat maata ke jayghosh me bhi gaali jaisi koi baat dekha lee to koi kya kar sakata hai. jabaki mumbai jaise mahanagar me sabase jyaada patakhe muslim bahul ilako me chalaye gaye.isa nahi hai ki bharat me rahane wale sabhi musalam desh premi nahi hai lekin yah bhi kadavi sachai hai ki jyaadatar rahate to hai bharat me lekin sochate hai hamesha pakistaan ke hi baare me aur yahi baat kuchha isa tarah ke budhijeevi bilkul nahi samaz pate aur samaj ko sachai se hamesha door le jaane ya unhe bhramit karane ka prayash karate rahate hai.bharat desha wastav me bahut hi viraat hridaya wala desh hai, isi desh ke nagrik desh ke tathakathit gaddaro par bhi daya karane ka jajba rakhate hai. is liye is desha ke wasiyo ke baare me aise vichaar katai sobha nahi dete.pakistan se match jeetane ke baad desh me kahi koi aafat nahi aai aur nahi kahi koi gagabadi hui to koi kaise is tarah ka mithya prallap karake apani vidwata sabit karane ka kutsit prayash kar sakata hai.
...
written by anurag singh, April 06, 2011
jaisaa bhai saheb ne pane aalekh mein likha hai...shayd aisa kooch nahi tha....bharat mata kee jai jab jaban par hoti hai to....maa kee gaali ka khayal kisi gandi manshikta ke vyakti ke dil mein he aa sakti hai....mukesh jee mansikta or lekhni ko sahi disha mein lagayen to kooch achha hoga...aise aalekh sirf unmaad faila sakte hai....aap he socho aap ke iss lekh se samaj ko kya fayda hoga...aap to waise unmadion kee jamat ko nispach roop se sahayta he kar rahe hain.
...
written by asif khan, April 06, 2011
नमस्ते सर,आपका लेख पढ़कर बड़ा सुकून मिला।लेकिन सवाल ये नहीं है कि आम भारतीय पाकिस्तानी को लेकर क्या सोचता है।बड़ा सवाल ये है कि अगर पाकिस्तान ये मैच जीत जाता तो उनकी सड़को पर क्या यही नजारा नही होता।रही बात मीडिया के रोल की तो मीडिया को सारा दोष देना ठीक नही क्योंकि टीवी वही दिखाता है जो आपको रुचिकर लगता है।हमारे और आपके पास विकल्परुपी रिमोट कंट्रोल हाथ में है।हम क्यों नही चैनल बदल देते,लेकिन हम देखते है।आपने ठीक लिखा सतही तौर पर सबकुछ ठीकठाक लगता है लेकिन जैसे ही इस विषबेल को खाद पानी मिलता है...ये हरी भरी हो जाती है।माफी चाहूंगा सर छोटा मुंह बड़ी बात..केवल कागज काले करने और भारी भरकम लफ्जों के इस्तेमाल से हालात नही सुधरेंगे.....हमें दोनो मुल्कों की सकारात्मकता पर बात करनी होगी...पुराने अच्छे रहे संबधो पर बात करनी होगी....हर वो बड़ा शख्स जो आज भारत में रहता है लेकिन जिसका जन्म और जड़े पाकिस्तान में है।उन पर बात करनी होगा।सर कुछ अलग करना होगा।धन्यवाद
...
written by ish madhu talwar, April 06, 2011
achchha aalekh,,,vicharottejak...
...
written by Ravi Shankar Maurya, April 06, 2011
काफी बेबाक बातें है,आभार इन शब्दों मे

पांव से कुचली हुई सिगरेट बन कर रह गए
जिन्दगी के सब अहम अधिकार अपने देश में
सिर्फ कहने भर का शासनतंत्र है,यारों यहां
ये व्यवस्था बडी बिमार है अपने देश में
जिस तरह चलता है सियारों का हुजूम जंगल में
उस तरह चल रही है सरकार अपनें देश में

Write comment

busy