खबरों का झूठा संसार

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दिन-ब-दिन न्यूज चैनलों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है. ये बात और है कि इस भीड़ में शामिल होने वाले नए चैनलों की सांसे ज्यादा लंबे समय तक चल नहीं पाती, और इससे पहले की लोग नए नवेले चैनल से वाकिफ हो ये दम तोड़ देते हैं... जिस रफ्तार से इनकी तादाद बढ़ रही है उतनी ही तेजी से वो अर्श से फर्श पर भी आ रहे हैं... ताश के पत्तों की तरह इनका अस्तित्व चंद महीनों में ही ढह जाता है.

दरअसल, वर्तमान में न्यूज चैनल चलाना किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह ही हो गया है, ताज्जुब की बात तो ये है कि आजकल वो लोग भी चैनल खोल लेते हैं जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं होता... तभी तो ऐसे चैनल पर खबरों के नाम पर दिखाए जाते है फूहड़ मनोरंजन कार्यक्रम... अब अगर किसी एक चैनल ने कोई नया ट्रेंड शुरू किया तो सभी उसी का अनुसरण करने लगते हैं चाहे वो नए हों या पुराने... नए खुलने वाले चैनल तो खासतौर से नकल पर ही अपनी खबरों की दुकान चलाते हैं... आपको जानकर हैरानी होगी कि कई चैनल में काम करने वाले लोग तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी चीजों से भी अवगत नहीं होते... फिर भी उंचे ओहदे पर बैठे होते हैं.

ऐसा लगता है मानों खबरों की अंधी दौड़ में सब भागे जा रहे है इस बात की परवाह किए बगैर कि क्या उनकी दिशा सही है, क्या उनमें रेस लगाने की क्षमता है? बिना अपनी क्षमता का आकलन किए अगर कोई काम किया जाता है तो उसमें हार की संभावना ज्यादा रहती है.

जोश और जूनून में लोग चैनल तो खोल लेते हैं लेकिन न तो वो पत्रकारिता के साथ और ना ही पत्रकारों के साथ न्याय कर पाते हैं... पत्रकारिता के साथ न्याय नहीं कर पाते क्योंकि इनके मालिकों का मकसद किसी भी तरह से विचारपूर्ण पत्रकारिता का होता ही नहीं है, वो तो चैनल खोलते हैं ताकि इससे अपनी तिजोरी भर सके लेकिन अफसोस कि इनकी खबरों की दुकान की फीकी पकवान ग्राहकों यानी न तो दर्शकों और ना ही विज्ञापन कंपनियों को ही लुभा पाते हैं.

इस तरह की दिशाहीन और खोखली बुनियाद पर खुलने वाले चैनलों से अगर किसी का नुकसान हो रहा है तो वो हैं ऐसे चैनल में काम करने वाले कर्मचारी... पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने को व्याकुल युवा चैनल में नौकरी मिलने पर खुश तो बहुत होते हैं लेकिन जब चंद महीनों बाद ही चैनल की नींव डावाडोल होने लगती है तो फिर उन्हें अपने भविष्य की चिंता सताने लगती है... और वो कोसने लगते हैं कि किस मनहूस घड़ी में पत्रकारिता को पेशा चुनने की गलती कर बैठे.

कुछ चुनिंदा पुराने समाचार चैनलों को छोड़ दें तो आए दिन खुलने वाले नए चैनलों की न तो कोई टीआरपी होती है और ना ही ये किसी नियम का ही पालन करते हैं... ये जब चाहे तब कर्मचारियों को नौकरी से हटा देते हैं और कर्मचारी बस मूक दर्शक बना देखता रहता है यानी चैनल मनमानी करता रहता है और जनता को न्याय दिलाने की बात करने वाला पत्रकार खुद को ही न्याय दिला पाने में असमर्थ रहता है... पिछले कुछ साल में मीडिया जगत में जिस तरह का परिवर्तन आया है उससे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि इन चैनलों की चकाचौंध चार दिन की चांदनी से ज्यादा कुछ नहीं है... इनकी हस्ती बस दो पल की होती है…“ना कोई आचार है ना कोई विचार है ये तो बस खबरों का झूठा संसार है...”

लेखिका कंचन सिंह पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं.


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