सोनिया मांग मान लेंगी और अन्ना का आंदोलन खत्म करा देंगी!

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: देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अन्ना के साथ खड़े हो जाएं : एक सज्जन कह रहे थे, देखना, सोनिया गांधी बहुत ऊंची राजनीतिज्ञ हैं। वह अन्ना हजारे की मांग मान लेंगी और उनका आंदोलन खत्म करा देंगी। मेरे मन में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगर मांगें मानकर आंदोलन खत्म कराना है, तो इसमें ऊंचा होना कहां हुआ? ऊंचे तो अन्ना हजारे ही साबित हुए, जिन्होंने कुंभकर्णों को अहसास करा दिया है कि भारत की जनता को निर्जीव मानने की भूल करोगे, तो पछताओगे।

देश धीरे-धीरे खड़ा हो रहा है। जंतर-मंतर मिस्र का तहरीर चौक बनता जा रहा है। अन्ना हजारे उसी गांधी के अनुयाई हैं, जिसने फिरंगियों की दुकान बंद करा दी थी, तब जब अन्ना अड़ ही गए हैं, तो ये हुक्मरान, ये देशी अंग्रेज उनके सामने कितने दिन ठहरेंगे? जरूरत अन्ना को समर्थन देने और निरंतर देते रहने की है। 63 साल से जो व्यवस्था हम झेल रहे हैं, वह लोकतंत्र नहीं, चुनावी लोकतंत्र है। हमने मान लिया है कि समय पर चुनाव होते जाने को ही लोकतंत्र कहते हैं, इसीलिए हमारे राजनीतिज्ञों का दिमाग खराब हो गया है। अन्ना हजारे उसको दुरुस्त कर रहे हैं। कोई चीज खराब हो जाए, तो उसे सुधारना ही पड़ता है। अत: हम उनके साथ हैं। देशभर में छोटे-छोटे धरना-प्रदर्शनों की श्रृंखला शुरू हो चुकी है और भोपाल के शाहजहानी पार्क में मैंने बुधवार को देखा कि उसमें वे युवक और युवतियां भी शामिल थीं, जिनके एक कान में ईअर फोन होता है और जो जहां देखो तहां, उसी से गाने सुनने में मस्त रहते हैं या फिर थोड़ा-बहुत समय अपनी पढ़ाई और कैरियर पर सोच-विचार के लिए भी निकाल लेते हैं।

यह पीढ़ी यदि देश की समस्याओं को लेकर चिंतित हो गई है, तो अब चिंतित होने की बारी सरकार की है और सरकार की ही क्यों, हमारी संपूर्ण राजनीतिक जमात को अब चिंतित हो ही जाना चाहिए। यह सही है कि हमारी राजनीतिक जमात अंग्रेजों से भी ज्यादा शातिर है। हो सकता है कि वह कोई ऐसा मुद्दा उछाल दे, जिससे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एकजुट हो रहा समाज विभाजित हो जाए। ऐसे मुद्दों की अपने देश में कोई कमी नहीं है। कोई आरक्षण समर्थक या आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू कराया जा सकता है। किसी को जय-जय श्रीराम का नारा उछालने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, तो किसी को भाषा-क्षेत्र के समर्थन में आंदोलन छेडऩे के लिए। इसी तरह फूट डाल-डालकर तो इस देश पर शासन किया जा रहा है। हमें लगता है कि ये हरकतें जो करता है, उनका राजनीतिक फायदा भी सिर्फ उसी को मिलता है, जबकि ऐसा है नहीं। हरकत एक करता है, पर फायदा पूरे राजनीतिक प्रतिष्ठान को मिलता है। इसके उदाहरण ढेरों है, पर उन पर चर्चा करने का यह उचित समय नहीं है। अभी तो चर्चा इसी पर होनी चाहिए कि राजनीतिक जमात ऐसी कोई चालाकी करेगी, तो हम अपने लक्ष्य से भटकेंगे नहीं। एक बार जन-लोकपाल विधेयक पारित हो जाए, फिर एक-एक करके अन्य लोकतांत्रिक सुधार भी हो जाएं, बाकी मसले तो बाद में हल होते रहेंगे। पहली शर्त यही है कि भ्रष्टाचारियों और सत्ताखोरों से देश को बचाया जाए और देश बच गया, लोकतंत्र यदि सही अर्थों में स्थापित हो गया, तो ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान न हो सके।

एक खतरा और है। जेपी के आंदोलन के बाद इस देश में जनांदोलनों का होना रुक क्यों गया? क्या देश की समस्याएं सुलझ गई हैं? नहीं, जनांदोलनों को बहुत ही चालाकी से रोका गया है। अस्सी के दशक में देश में इतने स्वयंसेवी संगठन, जिन्हें बोलचाल की भाषा में एनजीओ कहा जाता है, अवतरित हुए कि पूछो मत। ये संगठन पैसा लेते हैं, सरकारों से या फिर विदेशों से और दावा करते हैं, जनता की लड़ाई लडऩे का। याद रखो कि जनता की कोई भी लड़ाई हमेशा सरकार के खिलाफ ही होती है और जिनके ऐशोआराम की व्यवस्था सरकार के पैसे से हो रही हो, वे उसके खिलाफ कोई ईमानदार जन-आंदोलन कैसे छेड़ सकते हैं? करदाताओं का पैसा इन पर लुटाने के औचित्य पर भी बहस होनी चाहिए, पर कहा न कि अभी समय इसका भी नहीं है। कुछ एनजीओ सूचना का अधिकार, शिक्षा या स्वास्थ्य की दिशा में कुछ सार्थक कार्य जरूर कर रहे हैं, पर जो जनता की समस्याओं का निपटारा करने के ठेकेदार बन बैठे हैं, वे तो समस्या की जड़ ही हैं। पहले तो इन्होंने यह किया कि जहां भी जनांदोलन की सुगबुगाहट हुई, उसमें बहुत धीमें से जा घुसे। फिर, उस पूरे आंदोलन को अपने हिसाब से मोड़ दिया। 1980 से 2010 तक का आंदोलनों का इतिहास देखा जा सकता है कि इन लोगों ने किसी भी जनांदोलन को निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंचने दिया। अब तो स्थिति और भी विपरीत हो गई है। आंदोलन छेडऩे का पाखंड या तो राजनीतिक दल करते हैं या फिर ये एनजीओ।
ध्यान रखना चाहिए कि हमारे अन्ना हजारे ने जो आंदोलन छेड़ा है, उसमें कोई एनजीओ घुसपैठ न कर जाए।

एनजीओ के कुछ लोग अन्ना के साथ खड़े दिख रहे हैं, तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है, पर उनके इरादे नेक हैं या वे जिससे यानी सरकार से पैसा लेते हैं, कहीं उसके दलाल तो नहीं, इस पर नजर रखनी होगी। यदि इनके इरादे नेक हैं, तो इन्हें बने रहने दो और यदि नहीं भी हैं, तो भी बने रहने दो, पर हां, ये लोग आंदोलन को नुकसान पहुंचाने में सफल न हो जाएं। यह तो है कि अन्ना हजारे, जो गांधीजी की तरह वाणी से नहीं, अपने कर्म से उपदेश देते हैं, उन्हें झांसे में लेना आसान नहीं है, पर अन्ना के समर्थकों का भी यह फर्ज है कि स्थिति पर पैनी नजर रखी जाए। बाकी तो सब ठीक हो रहा है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहिए और इसके लिए जरूरी यह है कि अन्ना हजारे का सहयोग किया जाए, उन्हें समर्थन दिया जाए। ये लोकतंत्र के तथाकथित रहनुमा 1968 से लेकर अब तक लोकपाल का गठन नहीं कर पाए। इनकी बेईमानी का इससे बढ़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? सरकार या सरकार के छद्म समर्थकों का यह तर्क मुर्दा है कि आम नागरिक कानून बनाने में कोई दखल कैसे दे सकते हैं? प्रति प्रश्न यह है कि जो नागरिक सरकार चुनते हैं, वे सरकार को अपनी मर्जी के मुताबिक कानून बनाने के लिए बाध्य क्यों नहीं कर सकते? डॉ. राममनोहर लोहिया के शब्दों में कहें, तो भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में किसी भी देश की असली मालिक जनता ही होती है। अत: मालिक जब जाग ही गए हैं, तो नौकर भी जरा होश में आ जाएं। इनके दिमाग में, जो सामंतवाद का कीटाणु घुसा है, उसको निकालने पर इनकी भी समझ में आ जाएगा कि अन्ना का अनशन कितना सही और कितना जरूरी है।

लेखक राजेन्द्र चतुर्वेदी राज एक्सप्रेस, भोपाल से जुड़े हुए हैं.


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