अन्ना हजारे का अनशन एक ड्रामा है!

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लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के हैं. वहां एक धाकड़ वकील के रूप में जाने जाते हैं. भड़ास से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. बेबाकबयानी के लिए चर्चित हैं. भड़ास में प्रकाशित होने वाले आलेखों पर खुलकर टिप्पणी देते रहते हैं. उन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन की जो लहर चल रही है, उसमें उल्टी दिशा में तैरने की कोशिश की है. इस बाबत उन्होंने एक संक्षिप्त पत्र भी मुझे लिखा है, पत्र पढ़ने के बाद उनका लेख पढ़ें. पत्र यूं है-

''यशवंत जी, मेरा यह लेख अन्ना हजारे के अनशन के खिलाफ़ है लेकिन पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है तथा मैंने पूर्वाग्रह से उपर उठकर कार्य किया है। मैं जानता हूं आप अन्ना हजारे के द्वारा किये जा रहे अनशन के न सिर्फ़ समर्थन में हैं बल्कि स्वयं भी शामिल हैं। मेरे और आपके विचार इस मुद्दे पर विपरीत हैं। अगर मेरा लेख कहीं आपकी भावना को ठेस न पहुंचाता हो तो प्रसारित करेंगे। प्रयास तो यह कीजियेगा कि अगर आपको न भी पसंद हो तब भी प्रसारित करें। फ़िर भी जैसा उचित लगे, करिएगा। आपका, मदन कुमार तिवारी, गया''


मदन कुमार तिवारीदेश के सभी टीवी चैनल, अखबार और वेब पोर्टल अन्ना हजारे के आमरण अनशन को कुछ इस तरह प्रसारित कर रहे हैं जैसे लोकपाल बिल पास होते ही देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जायेगा। कोई समस्या ही नहीं होगी। अधिकांश टीवी चैनल और अखबारों के लोगों ने शायद यह पढा भी नहीं होगा कि लोकपाल बिल क्या है। सभी सोशल नेटवर्किंग साईट पर अन्ना हजारे के समर्थन में लोग अपने–अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।

हम हिंदुस्तानी बहुत भावुक और संवेदनशील होते हैं। तुरंत भावना के बहाव में बह जाते हैं। मैं सबसे पहले उस लोकपाल बिल की बात करता हूं, उसके कुछ पहलुओं को यहा दे रहा हूं ताकि आप उसे समझ सकें। सर्वप्रथम वर्ष १९६६ में प्रशासनिक सुधार आयोग ने दो स्तरीय तंत्र की व्यवस्था का सुझाव दिया था। केन्द्र के स्तर पर लोकपाल और राज्य के स्तर पर लोकायुक्त। लोकपाल एक त्रिसदस्यीय संस्था होगी। उस संस्था के अध्यक्ष होंगे उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्याधीश तथा सदस्य होंगे उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश। इन सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की अनुशंसा पर करेंगे जिसके सदस्य होंगे उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, होम मिनिस्टर, लोकसभा या राज्यसभा, दोनो सदनों में से उस सदन के नेता जिसके सदस्य प्रधानमंत्री न हों, दोनो सदनों के विपक्ष के नेता। लोकपाल कोई भी लाभ का पद सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं ग्रहण करेंगे। लोकपाल के खिलाफ़ कोई भी शिकायत होने की स्थिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा दो वरीय न्यायाधीश जांच करेंगे। मैं समझता हूं लोकपाल से संबंधित तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है। अब मैं आता हूं अन्ना हजारे जिस लोकपाल बिल को जन लोकपाल जैसा लुभावना नाम देकर ड्रामा कर रहे हैं उस बिल के बारे में। यह जन लोकपाल बिल को तैयार किया है शांति भूषण, प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी तथा सेवानिवृत्त जज संतोष हेगड़े ने।

चूंकि यह बिल २७ पेज का है इसलिये मैं यहां इसके मुख्य तथ्यों का ही जिक्र कर रहा हूं। अन्ना हजारे की लोकपाल नामक संस्था दस सदस्यीय होगी। सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा। लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री, मंत्री, लोकसभा सदस्य, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के जज और सभी सरकारी सेवक होंगे। यह संस्था भ्रष्टाचार, गलत तरीके से हुये तबादले, न्यायलयों में केसों के निष्पादन में हो रही देर, अधिकारियों तथा कर्मचारियों की प्रोन्नति में हो रही देर, सरकारी सेवकों द्वारा पद के दुरुपयोग सहित भ्रष्टाचार से संबंधित सभी मामलों की जांच करने में सक्षम होगी। अन्ना हजारे ब्रांड का यह जनलोकपाल संस्था के सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी। चयन समिति के सदस्यों में उच्चतम न्यायालय के दो जज, उच्च न्यायालय के दो जज, भरतीय मूल के सभी नोबल पुरस्कार विजेता, अंतिम तीन मैगसेसे पुरस्कार विजेता, भारत के महालेखाकार, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सेवानिवृत्त होनेवाले लोकपाल। चयन समिति देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें जनता का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा। इस जन लोकपाल के प्रावधान ही एक-दूसरे के विरोधाभाषी हैं तथा यह अन्तर्विरोधों से ग्रसित है।

सर्वप्रथम यह कि जनलोकपाल के जांच के दायरे में उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के जज भी शामिल हैं और वही चयन समिति के भी सदस्य हैं। यानी ये चार सदस्य जो न्यायापालिका से आयेंगे, सबसे पहले तो इस पूर्वाग्रह के साथ चयन करेंगे कि लोकपाल के सदस्य कोई वैसा व्यक्ति न बने जो बाद में इनके या अन्य मित्र जजों के लिये खतरा साबित हो। उच्चतम न्यायालय के एक रिटायर्ड न्यायाधीश महोदय ने मात्र ८-१० दिन पहले एक गोष्ठी में कहा है कि अगर कोई न्यायाधीश यह कहता है कि वह पुर्वाग्रह से ग्रसित नहीं है तो यह बकवास है। इस जन लोकपाल बिल को ड्राफ़्ट करने वालों में प्रशांत भूषण भी शामिल हैं जिनके पिता श्री शांति भूषण अवमानना के एक मुकदमे में उच्चतम न्यायालय को एक लिफ़ाफ़ा सौंप चुके है जिसमें उन्होंने यह जिक्र किया है कि पिछले १०-११ मुख्य न्यायाधीशों में अधिकांश भ्रष्ट थे। लेकिन वह भूषण जी भी हिम्मत नहीं जुटा सके उन भ्रष्ट न्यायाधीशों का नाम सार्वजनिक करने की। लॉ कमीशन भी अपनी रिपोर्ट में अंकल जजों का जिक्र कर चुका है यानी भूल जायें न्यायिक निष्पक्षता को, वह सिर्फ़ नजर आती है बहुत ही संवेदनशील और चर्चित मामलो में।

अब आता हूं इसके व्यवहारिक पहलू पर। नियुक्ति के लिये बनी समिति के सदस्यों को देखकर यह स्पष्ट है कि अधिकांश पद वैसे हैं जिनके उपर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। किसी वाद से जुड़े रहने और पक्षपात का भी आरोप लगा है। चयन समिति के अन्य सदस्यों में शामिल हैं भारतीय मूल के नोबल पुरस्कार विजेता। नोबल पुरस्कार चुनिंदा क्षेत्र में विशिष्ट खोज के लिये दिया जाता है। इन क्षेत्रों में साइंस, साहित्य, शांति जैसे विषय शामिल हैं। नोबल पुरस्कार के पैमाने में ईमानदारी या सार्वजनिक जीवन में स्वच्छ्ता शामिल नहीं है यानी एक महाभ्रष्ट साइंटिस्ट भी अगर साइंस के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करेगा तो उसे नोबल पुरस्कार मिलेगा। अब यह अन्ना हजारे ही बतायेंगे कि नोबल पुरस्कार विजेता को चयन समिति का सदस्य बनाने का अर्थ क्या है। ठीक यही बात मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त करने वालों पर लागू होती है।

अब चर्चा करता हूं महालेखाकार की। यह विभाग ही पूरी तरह भ्रष्टाचार से भरा हुआ है। अभी तक कोई महालेखाकार अपने विभाग में भ्रष्टाचार नहीं खत्म कर पाया। वह चयन करेगा लोकपाल का। वाह अन्ना हजारे और संतोष हेगडे जी। चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने में पूर्णत: अक्षम साबित हो चुका है। ईवीएम मशीन के वोटों को खरीदा जाता है। वोट करवाने जो पोलिंग पार्टी जाती है उसे पैसे दे दिये जाते हैं और वह बोगस वोट मारने की छूट दे देते हैं। सैकड़ों उदाहरण भरे पडे हैं। ईवीएम में छेडछाड करके पूरी की पूरी विधानसभा गठित की जा चुकी है। हिम्मत नहीं है चुनाव आयोग की जो ईवीएम पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिकों के प्रश्नों का जबाब दे सके। यहां भी मामला महालेखाकार जैसा ही है। यह बिल सिर्फ़ नाम का जन लोकपाल बिल है। इस बिल के निर्माण से लेकर चयन समिति के सदस्यों की योग्यता तक कहीं भी किसी स्तर पर जनता की भागेदारी नहीं है।

लोकसभा, राज्यसभा जैसी संस्थाओं के बजाय विदेशी पुरस्कार प्राप्त लोग अन्ना हजारे को ज्यादा ईमानदार नजर आ रहे हैं, वाह मेरे गांधीवादी। जिस गांधी को नोबल पुरस्कार के योग्य नहीं माना नोबल पुरस्कार समिति ने, उस समिति का प्रमाण पत्र चयन समिति का सदस्य बनने की योग्यता होगी। वाह अन्ना हजारे जी। गजब का है आपका गांधीवाद। अन्ना हजारे जी, गांधी की समाधि पर माल्यार्पण करने के बाद जिस अनशन को आपने शुरू किया है और जिस गांधी का नाम भंजा रहे हैं उसी गांधी को अपमानित करने वाली संस्था के प्रमाण पत्र को चयन समिति का सदस्य बनने की योग्यता मानने को क्या कहा जाय? अब आता हूं उस तथ्य पर जो इस सारे ड्रामे के पीछे है। पहले शुरू करता हूं प्रशांत भूषण से। उच्चतम न्यायालय में अवमानना के एक वाद में उच्चतम न्यायालय के भ्रष्ट जजों की जो सूची शांति भूषण ने सौंपी थी उसे जनता के सामने उजागर करने की हिम्मत नहीं हुई और यह श्रीमान चले हैं जन लोकपाल बिल के माध्यम से जनता को उल्लू बनाने।

दूसरा नंबर है किरन बेदी, केजरीवाल और संदीप पांडेय का। तीनों मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त हैं। यानी चयन समिति का सदस्य बनने की योग्यता पूरी कर रहे हैं। जज हेगडे भी लोकपाल बनने की योग्यता पूरी कर रहे हैं।  जन लोकपाल का उद्देश्य और क्षेत्राधिकार देखकर यह स्पष्ट है कि यह न्यायपालिका , इनवेस्टीगेटिंग एजेंसी तथा प्रशासनिक प्राधिकार का भी कार्य करेगी तथा इसके साथ-साथ न्यायपालिका के जजों के भी खिलाफ़ होनेवाली शिकायतों की जांच करेगी। केन्द्र द्वारा स्थापित सभी संस्थाए भी इसके दायरे में होंगी। अभी हमारे देश में कैट यानी सेन्ट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिबनल, कर्मचारियों के मामले देखती है जिसमे केन्द्रीय सरकार की संस्थाओं में नियुक्ति भी शामिल है। रिटायर्ड जज वहां चेयरपर्सन होते हैं। केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त भ्रष्टाचार के मामले देखते हैं, उसके बाद त्रिस्तरीय न्यायपालिका है। अन्ना हजारे के तथाकथित लोकपाल की नियुक्ति के बाद इन सबकी जरूरत नहीं होगी। वस्तुत: यह एक समानांतर व्यवस्था है जिसमें जनता की कोई सहभागिता नहीं होगी। कानून से जुडे रहने के कारण मेरा मानना रहा है कि मुल्क को किसी भी नये कानून या प्राधिकरण की जरूरत नहीं है। जरूरत है सिर्फ़ वर्तमान कानूनों को लागू करने और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की।

यह जन लोकपाल भ्रष्टाचार को रोकने का नहीं बल्कि भ्रष्टाचारियों को सजा देने का कार्य करेगा। अभी भी सजा देने की व्यवस्था है। मुकदमों के निष्पादन की समय सीमा भी है लेकिन सब कुछ रहते हुये भ्रष्टाचार नहीं मिट पा रहा है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ उन्माद के स्तर तक आक्रोश है। उबल रही है जनता गुस्से में। आपातकाल के समय भी यही स्थिति थी। जनता का यह गुस्सा बदलाव लायेगा, अगर इसका रुख दूसरी तरफ़ नहीं मोड़ा गया। अभी इसे उबलते रहने देना है लेकिन अन्ना हजारे का यह आंदोलन खत्म कर देगा जनता के गुबार को। यह सीमित कर देगा जन लोकपाल के गठन तक। मर जायेगा जन आंदोलन। अभी जरूरत थी इस आक्रोश को जिंदा रखने की। टूजी घोटाला, आदर्श घोटाला, कामन वेल्थ घोटाला तथा काला धन के मुद्दे पर एक सार्थक कार्रवाई न्यायालय स्तर पर हो रही है।

जरूरत है सिर्फ़ निगरानी की ताकि भटकाव न आये जांच में। अब इस स्तर पर जन लोकपाल के नाम पर जनता के गुस्से को, मात्र एक प्राधिकरण या एक संस्था के निर्माण तक सीमित कर देने का अर्थ होगा अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार को मजबूती प्रदान करना। यह आंदोलन कुछ चुके हुये लोगों द्वारा शुरू किया गया है। ये सारे लोगों को बहुत दिनों से कोई रोजगार नहीं मिल रहा था। अन्ना हजारे का आंदोलन उससे जुड़े लोगों के स्वार्थ की पूर्ति करने के अलावा कुछ नहीं करेगा। यह जन लोकपाल न्यायपालिका, कार्यपालिका, जांच एजेंसी और प्रजातांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर के रख देगा। इसके प्रावधानों के अनुसार यह जांच एजेंसी से लेकर सजा देने तक का सब काम करेगा। यानी पुलिस से लेकर जज सबकुछ लोकपाल होगा। अभी तक जो खबरें आ रही हैं उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि विभिन्न जिले तथा राज्यों में इस आंदोलन के समर्थन मे जो संस्थायें तथा लोग खड़े हो रहे है वह खुद भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अगर इस आंदोलन का कोई संगठनात्म ढांचा तैयार होगा तो ये सारे लोग उसका हिस्सा होंगे जैसे जयप्रकाश जी के संपूर्ण क्रांति वाले आंदोलन के साथ हुआ था। देश एक बहुत बड़ी मुसिबत में फ़ंसने जा रहा है।


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