जेपी अवतार अन्ना हजारे! (दो)

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बिल्कुल, दीवार पर लिखा हर शब्द सहमति सूचक है। मैं अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गांधी या जयप्रकाश नारायण से व्यक्तित्व के स्तर पर नहीं कर रहा। मैं यह चिह्नित करने की कोशिश कर रहा हूं कि हजारे महात्मा गांधी की ‘अहिंसा’ और जयप्रकाश नारायण की ‘क्रांति’ के मंत्र के साथ एक भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए सर्वस्व त्याग को तैयार हैं- नि:स्वार्थ, निष्काम भाव से। शासन में भ्रष्टाचार का आलम ऐसा है कि योग्य-सुपात्र जहां अंधकूप में सिसकियां भरने को विवश हैं, वहीं अयोग्य-कुपात्र दोनों हाथों से देश को लूट अपना घर भर रहे हैं।

महात्मा गांधी ने एक अवसर पर ऐसी ही तो आशंका व्यक्त की थी कि एक समय ऐसा आएगा जब योग्यता पर अयोग्यता हावी हो शासन करेगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन काल में भ्रष्टाचार और कुशासन का दानव जब चिंघाड़ रहा था तब अयोग्य-कुपात्र के अधीनस्थ संवैधानिक संस्थाएं विलाप करने को मजबूर थीं। क्या राष्ट्रपति और क्या सर्वोच्च न्यायालय, सभी नतमस्तक! लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में स्वयं पर अभिमान करने वाला मीडिया सड़कों पर रेंगने को तत्पर था।

स्वार्थ, लालच और भय के मिश्रण के प्रति ऐसी लोलुपता कि शासकों ने स्वयं को निरंकुश मान लिया था। देश पर असंवैधानिक आपातकाल थोप, आम जनता को उसके मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया था। जयप्रकाश नारायण सहित स्व-जागृत बड़े नेता जेलों में ठूंस दिए गये। अखबारों पर बंदिश, लोगों की जुबानों पर ताले! लेकिन ‘जयप्रकाश आंदोलन’ का मंत्र हर भारतीय के मन-घर में प्रवेश कर चुका था। जनता के पक्ष में सिंहासन खाली करने को अंतत: इंदिरा गांधी मजबूर कर दी गईं।

खैर, बातें वर्तमान कालखंड की। अन्ना हजारे लोकपाल व्यवस्था को लोकभावना के साथ लागू करने की मांग कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या? केंद्र सरकार ने इसकी तत्परता तो दिखाई है किंतु विधेयक का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी वैसे लोगों को दी गई है जिनका आचरण स्वयं संदिग्ध है। केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने प्रारूप तैयार करने के लिए गठित मंत्रियों की समिति से इस्तीफा तो दिया, किंतु इससे उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप खत्म तो नहीं हो जाते।

सर्वोच्च न्यायालय में भ्रष्टाचार एवं अनियमितता संबंधी मामलों की सुनवाई के दौरान भारत सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों के आचरण से क्या यह संदेह प्रगाढ़ नहीं होता कि केंद्र की नीयत साफ नहीं है? वह अपने और उपकृत लोगों को बचाने में लगी है? ऐसा व्यवहार कोई भ्रष्ट सरकार ही कर सकती है। इस पार्श्‍व में अन्ना हजारे की मांग कि लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने वाली समिति में सरकारी पक्ष के साथ-साथ जनपक्ष अर्थात जनता के नुमाइंदे भी शामिल किए जाएं, बिल्कुल उचित है। हजारे ने इसके लिए कतिपय बेदाग विधिविशेषज्ञों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम सुझाए हैं। अगर लोकपाल के संबंध में केंद्र सरकार की नीयत साफ है तो फिर उसे हजारे का सुझाव मानने में हिचक क्यों?

प्रधानमंत्री तो खैर एक आज्ञाकारी सेवक हैं, मैं यहां सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी को चेतावनी देना चाहूंगा कि वे दीवार की लिखावट को अच्छी तरह पहचान लें। चापलूस, अवसरवादी सलाहकारों की बातों में न आएं। याद दिला दूं, कि जब जयप्रकाश आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हुई थी तब इंदिरा गांधी को ऐसे ही चाटुकारों ने गलत सलाह देकर भ्रम में रखा था। उन तत्वों ने जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी थीं कि जयप्रकाश और इंदिरा गांधी के बीच दूरियां बढ़ती जाएं, वे कभी आमने-सामने न हो जाएं। वे अवसरवादी नहीं चाहते थे कि इंदिरा-जयप्रकाश के बीच कोई संवाद स्थापित हो। क्या यहां परिणाम दोहराने की जरूरत है? वर्तमान संदर्भ में अन्ना हजारे को सोनिया गांधी कम आंकने की भूल न करें।

चूंकि देश की जनता भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त है, निजात चाहती है, वह बेहिचक अन्ना हजारे के पीछे खड़ी हो जाएगी। और तब जयप्रकाश आंदोलन की तरह भ्रष्टाचार और कुशासन की समाप्ति की मांग से आगे बढ़ कहीं अन्ना हजारे का आंदोलन भी ‘सरकार और सोनिया हटाओ’ आंदोलन का रूप न ले ले। अन्ना हजारे बिल्कुल जयप्रकाश नारायण की तर्ज पर आंदोलन को गैरराजनीतिक रूप दे रहे हैं। मुझे याद है वह दिन जब कर्पूरी ठाकुर जैसे बड़े ईमानदार समाजवादी नेता को भी जेपी की एक रैली में शिरकत करने की अनुमति नहीं दी गई थी। विनम्रतापूर्वक कर्पूरीजी को समझा दिया गया था कि जयप्रकाश ने आंदोलन को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा है। जनहित के पक्ष में ‘संपूर्ण क्रांति’ का तब नारा बुलंद किया था जेपी ने। अन्ना हजारे ने भी राजदल के नेताओं को अपने आंदोलन में शामिल करने से इनकार कर दिया। निश्चय ही, ऐसी हालत में उन्हें जेपी की तरह जन-जन का समर्थन प्राप्त होगा।

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं. प्रभात खबर अखबार के संस्थापक संपादक रहे हैं. दर्जनों अखबारों-चैनलों में संपादक रहने के बाद इन दिनों खुद का हिंदी विचार दैनिक '1857' का प्रकाशन नागपुर से कर रहे हैं. यह लेख दैनिक 1857 में प्रकाशित हो चुका है वहीं से साभार लिया गया है.


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Comments (2)Add Comment
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written by Dinesh Chandra, April 08, 2011
भ्रष्टाचार का दीमक भारत को खोखला करे जा रहा है , ये शब्द अक्सर सुनने को मिल ही जाते हैं | और ऐसा कह सुन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपने हस्ताक्षर कर, हम जिम्मेदारियों के पूरा हो जाने के एहसास के साथ आराम से अपने घर पर सो जाते हैं | लेकिन सिर्फ बातों से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता ,बातों से परिवर्तन नहीं आया करते | उस के लिए तो संघर्ष करना पड़ता है , शहादत देनी पड़ती है | जितना बड़ा मुद्दा उतनी बड़ी लड़ाई |
फिर भ्रष्टाचार , भ्रष्टाचार तो हमारे सिस्टम का एक हिस्सा बन चुका है , लगता है इसके बिना देश का चल पाना नामुमकिन है | स्कूल में बच्चे के प्रवेश से लेकर, रिटायर मेंट की पेंशन तक का सफ़र हम भ्रष्टाचार की नाव में ही करते हैं और जाने अनजाने भ्रष्टाचार की सत्ता को अपना मूक समर्थन दे देते हैं| ये सोचे बिना की हमारी अग्रज पीड़ी ने हमें आज़ाद सांसे देने के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा दिया थाऔर हम अपनी आने वाली नस्लों को भ्रष्टाचार से युक्त जहरीली हवाएं देकर जायेंगे |
आज अन्ना हजारे जैसा सामाजिक कार्यकर्ता अपनी उम्र के आखरी पड़ाव में जन लोकपाल बिल को लागू किये जाने की मांग को लेकर राजघाट पर आमरण अनशन पर बैठा है | अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद कर दिया है , अब देखना है कि इसका अंजाम क्या होगा ? हजारो-लाखों लोगों ने अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दिया है शायद यही सही वक़्त है अपनी गलतियों को सुधारने का ,शायद यही वक़्त है जब हम दबाव बनाकर सरकार से जन लोकपाल बिल लागू करवाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने हाथ में हथियार ले सकतें हैं |
लेकिन कहीं ऐसा ना हो की आपकी एक चुप्पी भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहे अन्ना हजारे की हार का कारण ना बन जाए | इसीलिए हल्ला बोल......
--दिनेश चन्द्रा--
newsalertindia.com
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written by Dinesh Chandra, April 08, 2011
भ्रष्टाचार का दीमक भारत को खोखला करे जा रहा है , ये शब्द अक्सर सुनने को मिल ही जाते हैं | और ऐसा कह सुन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपने हस्ताक्षर कर, हम जिम्मेदारियों के पूरा हो जाने के एहसास के साथ आराम से अपने घर पर सो जाते हैं | लेकिन सिर्फ बातों से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता ,बातों से परिवर्तन नहीं आया करते | उस के लिए तो संघर्ष करना पड़ता है , शहादत देनी पड़ती है | जितना बड़ा मुद्दा उतनी बड़ी लड़ाई |
फिर भ्रष्टाचार , भ्रष्टाचार तो हमारे सिस्टम का एक हिस्सा बन चुका है , लगता है इसके बिना देश का चल पाना नामुमकिन है | स्कूल में बच्चे के प्रवेश से लेकर, रिटायर मेंट की पेंशन तक का सफ़र हम भ्रष्टाचार की नाव में ही करते हैं और जाने अनजाने भ्रष्टाचार की सत्ता को अपना मूक समर्थन दे देते हैं| ये सोचे बिना की हमारी अग्रज पीड़ी ने हमें आज़ाद सांसे देने के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा दिया थाऔर हम अपनी आने वाली नस्लों को भ्रष्टाचार से युक्त जहरीली हवाएं देकर जायेंगे |
आज अन्ना हजारे जैसा सामाजिक कार्यकर्ता अपनी उम्र के आखरी पड़ाव में जन लोकपाल बिल को लागू किये जाने की मांग को लेकर राजघाट पर आमरण अनशन पर बैठा है | अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद कर दिया है , अब देखना है कि इसका अंजाम क्या होगा ? हजारो-लाखों लोगों ने अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दिया है शायद यही सही वक़्त है अपनी गलतियों को सुधारने का ,शायद यही वक़्त है जब हम दबाव बनाकर सरकार से जन लोकपाल बिल लागू करवाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने हाथ में हथियार ले सकतें हैं |
लेकिन कहीं ऐसा ना हो की आपकी एक चुप्पी भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष कर रहे अन्ना हजारे की हार का कारण ना बन जाए | इसीलिए हल्ला बोल......
--दिनेश चन्द्रा--
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