अन्ना की सभा में राजनीति के पकवान

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अमिताभ ठाकुरमैं आज श्रद्धेय अन्ना हजारे के आमरण अनशन से जुड़ी ख़बरें पढ़ रहा था तो एक खबर मुझे ऐसी दिखी जिसने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच ही लिया. खबर अंग्रेजी “पायनीयर” की थी- “शार्प डिफरेंसेज इन मूवमेंट ओवर स्पोइल्स” (अर्थात आंदोलन के लाभ को लेकर तीव्र द्वंद्व). लेखक हैं सिद्धार्थ मिश्र.  इस लेख में उन्होंने दर्शाया है कि किस तरह से इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट के लीडरान में आपस में जन लोकपाल विधेयक के लिए बनने वाले पैनल को ले कर विवाद है.

लेख के अनुसार जहां अन्ना हजारे सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को इसका हेड बनाना चाहते हैं वहीं अरविन्द केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश इसमें सोशल एक्टिविस्ट को लाना चाहते हैं. लेख के अनुसार इस पूरे मामले में तीसरी धुरी की तरह काम कर रहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी का कल पूरी तरह से धरनास्थल और इस कार्यक्रम से अलग रहना भी अपने आप में एक कहानी कह रहा है. शाम तक अन्ना हजारे का नाम पैनल में नहीं होने पर किरण बेदी का नाम इसके अध्यक्ष के रूप में करने पर भी चर्चा होने लगी, ऐसा कहा जा रहा है.

शाम करीब साढ़े तीन बजे पंडाल में अचानक किरण बेदी का नाम एक कोने से लिए जाने का भी इस लेख में निहितार्थ निकाला गया है जबकि यह भी उद्धृत है कि वहाँ उपस्थित कई लोगों ने ऐसा बोलने वाले व्यक्ति को तुरंत ही चुप करा दिया और बैठा दिए, जो असहज था.

किरण बेदी की अनुपस्थिति और इस सम्बन्ध में वहाँ मौजूद लोगों द्वारा समुचित कारण नहीं बता पाने पर भी सिद्धार्थ संतुष्ट नहीं दिखते, क्योंकि उनका मानना है कि जो कारण बताए गए वह विश्वसनीय नहीं थे. सिद्धार्थ का कहना है कि उपस्थित दो धड़ों में अपनी-अपनी शक्ति के प्रदर्शन को लेकर साफ़ तौर पर प्रयास दिख रहे थे, जहां एक ओर चर्चित आरटीआई एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल थे तो दूसरी ओर स्वामी अग्निवेश.

साथ ही एक एसएसएस की भी काफी चर्चा थी जिसमें स्वामी अग्निवेश के इतिहास को प्रस्तुत करते हुए उन पर कई प्रकार से आक्षेप लगाए गए थे. जिस प्रकार से कल कई नेताओं को मौके से भगाया गया उस पर भी अन्ना हजारे की नाराजगी की बातें चर्चा में थीं जब शायद प्रातः काल अन्ना ने सबसे पहले उमा भारती से कार्यकर्ताओं की हरकतों के लिए माफ़ी माँगी.

ड्राफ्ट लोकपाल विधेयक पर भी मतभेद की बात इस लेख में है. मुझे यह लेख खास तौर पर इसीलिए ध्यानाकर्षक लगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मनुष्य की सहज वृत्तियों में एक वृत्ति राजनीति से जुडी हुई है. चाहे आदमी कितना भी मना करे, कितना भी उससे अलग बोले, जितना भी राजनीति को कोसे, पर कटु सत्य यही है कि राजनीति मनुष्य का मूल स्वभाव है. जहां भी मनुष्य रहेगा, वहाँ राजनीति के दांव-पेंच भी रहेंगे.

और तो छोडि़ये, राजनीति का यह मजेदार कीटाणु घर से ही शुरू होता है. सास-बहु का मसला इसका सर्वविदित उदाहरण है पर ऐसा नहीं कि अन्य रिश्तों में राजनीति के काट-छांट नहीं हुआ करते हों. राजनीति मानव का नैसर्गिक स्वाभाव होने के नाते क्या यह संभव है कि व्यक्ति सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहा हो और वह इस कीड़े से बच जाए.

और तो और, जब मैं आईआईएम लखनऊ में अध्ययन के उद्देश्य से गया था तो यहाँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा और जो अनुभव किया उससे यह बात और अधिक पुख्ता ही हुई. फिर यही बात वहाँ के प्रोफेसरों ने भी चर्चाओं ने स्पष्ट कर दी जब वे मुझे कहते- “अमिताभ जी, आप नहीं जानते यहाँ आईआईएम में जितनी राजनीति है उतनी तो पोलिटिकल पार्टियों में नहीं होगी.” अब एक शैक्षणिक संस्थान का राजनीति से क्या मतलब पर राजनीति है तो है. और होना इसीलिए है कि मनुष्य का स्वभाव ही मूलतया राजनैतिक है. ऐसा भी नहीं कि हर राजनैतिक दांव-पेंच किसी खास उद्देश्य से हो या उसके कोई स्पष्ट लाभ-हानि हों, कई बार तो बस शौकिया भी राजनीति चलती रहती है.

पहले मैं सुना करता था कि पत्रकारिता में भी बहुत राजनीति है पर अब जब से भड़ास तथा अन्य मीडिया पोर्टल सामने आ गए हैं तब से कम से कम पत्रकारिता की राजनीति तो काफी हद तक सामने आ गयी है. हाँ यह अलग बात है कि कोई-कोई खुल के राजनीति करते हैं और कई लोग परदे की ओट में राजनीति करना पसंद करते हैं. मैं किसी तरह इस बात को इसीलिए बुरा नहीं मानता कि यह तो मूलभूत इंसानी फितरत से जुड़ा मामला है. हाँ, यह जरूर है कि जो राजनीति खुल कर होती है वह ज़रा ज्यादा चित्ताकर्षक लगती है और कम खतरनाक भी.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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