अन्ना को कहीं पिपली का नत्था न बना दें ये लोग

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राजेश रंजनअन्ना और नत्था में अंतर तो बहुत हैं लेकिन बहुत समानता भी देखी जा सकती है या कहें कि खोजी जा सकती है। नत्था की जमीन गिरवी पर थी, बचाने के लिए उसने सोचा जान ही दे दी जाए। अन्ना का देश गिरवी पर है, बचाने के लिए जान देने के लिए तत्पर हैं। वहाँ पिपली था, यहाँ जंतर-मंतर है। तमाशा जारी है।

पता नहीं क्यों मुझे सारे आन्दोलन अब राष्ट्रीय स्तर के प्रहसन नजर आने लगे हैं। पिपली की तरह जंतर-मंतर पर सबकुछ सज चुका है। मीडिया, नेता, प्रशासन, पुलिस, पब्लिक सब जुट गए हैं। प्रहसन इसलिए यहाँ हमारे यहाँ हर महत्वपूर्ण चीज को प्रहसन में बदलने का इतिहास रहा है। यहाँ यह देश और इसके लोग किसी भी बड़े से बड़े 'आन्दोलन' को प्रहसन में बदलने की कला में माहिर हैं। अब देखिए चौटाला, उमा, मोदी आदि पता नहीं कौन-कौन से लोग इसे समर्थन दे रहे हैं। 'आन्दोलन' को एक व्यक्ति सापेक्ष शब्द समझकर देखिए। हर 'आन्दोलन' के हश्र को उन व्यक्तियों के दिलों से पूछकर देखिए जो इनका समर्थन करते थे।

पिपली के नत्था से अन्ना की तुलना करने वाला मेरा एक लंगोटिया मित्र चंद्र मोहन कल कह रहा था लोहिया के पास बैंक खाता नहीं था और लोहिया के लोग अब बैंक ही साथ में लेकर घूमते हैं। यहाँ के वामपंथी आन्दोलन को लीजिए। फिर राम जन्मभूमि आन्दोलन को लीजिए। वे तो अमेरिकी अधिकारियों को सफाई देते हैं कि राम तो उनके लिए महज सत्ता में आने का मुहरा हैं। गांधी के सत्याग्रह के भी तमाम आंदोलनों की राजनैतिक परिणति या हश्र देखिए। राष्ट्रभाषा के लिए लड़ाई का परिणाम देखिए। सबकुछ। बताएँ अगर एक भी आन्दोलन अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहा है।

इस बार कंधा है अन्ना हजारे का - एक बहत्तर साल के बूढ़े का। हालाँकि अन्ना ने भी अपने बाल यूँ ही सफेद नहीं किए हैं, फिर भी मुझे पता नहीं, क्यों लगता है कि बिला वजह हम भारी-भरकम आशा कर रहे हैं। यहाँ इस देश में हमारी आशा के चूल्हे पर अपनी रोटियाँ सेंकने वाले इतने धुरंधर बैठे हैं कि क्या कहने। यहाँ जंतर-मंतर से किसी तहरीर की उम्मीद व्यर्थ है और अगर कुछ ऐसा होने भी लगा तो बाजीगरों की एक स्थापित जमात बैठी हुई है जो उसे फिर से जंतर-मंतर बना देगी।

अन्ना की आँखों में वैसी निराशा तो नहीं है जैसी नत्था के आँखों में दिखती है...लेकिन आजादी के पहले निराशा तो गांधी की आँखों में भी नहीं दिखता होगा। उन्हें क्या पता था कि उनके ही सिपाही भारत की आजादी की उनकी आँखों से सामने ऐसी दुर्गति करेंगे कि वे दिल्ली में झंडा पहली बार फहरते भी नहीं देखना चाहेंगे। अन्ना को लोग छोटे गांधी कहते हैं। बड़े गांधी छोटे-मोटे मक्कारों की छोटी-मोटी फौज से नहीं लड़ सके थे, ये छोटे गांधी पता नहीं इन बड़े-बड़े मक्कारों की भारी-भरकम अक्षौहिनी सेना का क्या कर पाएँगे।

यहाँ लड़ाई अब दो-एक लोगों से नहीं बची है। भ्रष्टाचार से लड़ाई का मतलब है लगभग हर आदमी से लड़ाई, पूरी कौम से लड़ाई। सर्वेक्षण करवाएँ तो पता चलेगा कि ईमानदार आदमी का प्रतिशत शून्य दशमलव शून्य शून्य एक भी नहीं है। और इसलिए तो शक है। भ्रष्टाचार के प्रति एकाएक ये आग कैसी। भूखा तो अन्ना को रहना है...भूखे पेट की उस आग पर थोड़ी-बहुत ही अपनी रोटी भी सिंक जाए शायद इतनी ही हमारी मंशा है। मैं बस दुआ करता हूँ कि अन्ना को इस आंदोलन के बाद मिले सदमें से निपटने की शक्ति दे।

लेखक राजेश रंजन अभी रेड हैट में हिंदी के कामकाज से जुड़े हुए हैं. वे जनसत्‍ता और लिटरेट वर्ल्‍ड में हिंदी पत्रकार के रूप में काम कर चुके हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग क्रमश: से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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Comments (6)Add Comment
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written by Jagdish Vyas, April 09, 2011
भाई लोगो,बड़ा दू:ख हो रहा हे आप लोगो के लेख और कमेन्ट पड़कर दरअसल दोस आप लोगो का भी नहीं हे | मुझको और शायद आप लोगो को भी देश के लिए कुछ करने के लिए जान दे देना, की न तो शिक्षा और नहीं हमारे माँ बाप ने हमारे अंदर वो इच्छा सकती पैदा की हे | हमारे इस सड़ांध मारते समाज ने हमें कुछ दिया हे तो वो सिर्फ जले पर नमक छिडकना दुसरे का घर जलते देख कर ऊपर से दुखी होना और अन्दर से "बोहत अच्छा हुआ साला बोहत हवा में उड़ता था" की इतनी परिपक्व भावना की हम चाहे भी तो इसे खुद से अलग नहीं कर सकते | कितनी ही बार सड़क से गुजरते हुए एक्सीडेंट में घायल हुए आदमी को देख कर हम अपनी व्यस्तता का जूठा ढोंग करते हुए अपनी दूम दबा कर वहा से खिसक जाते हे | दरअसल हम केंकड़े हें जो किसी को उपर जाता नहीं देखना चाहते हें कुछ अच्छा होते देख पेट में मरोड़ उठने लगती हें, खुद तो कुछ नहीं करना चाहते हे और व्यवस्था को गाली देकर अपनी मर्दानगी का इजहार कर लेते हे हम चाहते तो हे की कोई मसीहा आये और हमें इन कस्टो से मुक्ति दिलवाए " लेकिन मुफ्त में"बदले में वो हमसे कुछ भी न मांगे जेसे सुभास चन्द्र बोस और गाँधी जी ने इसी देश के लोगो से मांग लिया था |असल में हम सभी बेईमान हे बस हमे मोका नहीं मिलता इसलिए जिन लोगो के पास मोके हे उन लोगो को देख कर कुड़ते रहते और खुद के ईमानदार होने का ढोल पिटते रहते हे | ये तो अच्छा देश की आजादी के समय हम जेसे लोग नहीं थे वर्ना भगत सिंह, आजादऔर उनके जेसे शहीदों को भी इतना क्रिटी साइज करते की वो भी सोचते की वो जो भी कर रहे हे इस देश की महान जनता की नजर में "ड्रामा" हे | दोस्तों अँधेरे को दूर भागने के लिए माचिस की एक तीली ही काफी होती हे मेने गाँधी को नहीं देखा जे पी और लोहिया को भी नहीं लेकिन मुझे फक्र हे मेने अन्ना हजारे को देखा और पिछले पांच दिनों में कई बार ये सोचा की अब तक मेने देश के लिए क्या किया,जवाब मिला .................... तो आप लोग भी सोचिये और हां जितना में जानता हु किरण बेदी आई पी एस अधिकारी रही हे | और इस देश का भ्रष्ट आई पी एस करोडो रूपये कमाता हे,केजरीवाल ने इन्कमटेक्स कमिश्नर के पद से रिजाइन किया हे इनदोनो के पास आज कितनी सम्पत्ति हे |मुझे पता नहीं पर इन लोगो की नियत पर शक करने वालो से गुजारिश करता हु की आप जरुर इनलोगों की बेईमानी का पता लगाये और छापे फिर में भी आप लोगो की जमात में शामिल हो जाऊंगा और हर अच्छे काम की खामिया ढूंढ़, खुद को बुध्धिजीवी समझने लगूंगा | एक मछुआरा था उसने तालाब में दिन भर जाल दल कर रखा शाम को जाल में फंसी मछलियों को एक टोकरी में डालता और ढंक देता,दूसरी टोकरी में केंकड़े डालता पर ढंकता नहीं था | एक भला आदमी उसकी ये हरकत देख रहा था, भले आदमी ने मछुआरे से पूछा भाई तुम इन केकड़ो को खुला क्यों छोड़ रहे हो...........| दोस्तों आगे की कहानी तो हम सभी जानते हे तो बी पोजिटिव और हां न्यूज़ चेनलो का मजाक उडाने वालो एन डी टी वी वालो से जाकर पूछो इस देश की जानता से जुड़े सरोकारों की खबरे दिखा कर उनको क्या हासिल हो रहा हें |जिसे नम्बर वन होना चाहिए वो आज किस हाल में हें तो पिपली लाइव के नत्था और अन्ना में अंतर खोजने से पहले अपने अन्दर झांक कर जरुर देखे |
जय हिंद
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written by SUSHIL KUMAR , April 09, 2011
BHALE HI AAJ ANNA NE APNA ANSHAN TOD LIZA HO...AUR POORE DESH ME LOKTANTRA KI JAZGHOSH HO RAHA HO LEKIN SAHI MAZNE ME MUJHE AAPKI PANKTI ACHHI LAGI JISME AAPNE KAHA HAI KI IS DESH ME MAKARON KI GFAUZ HAI AISE ME MUJHE ABHI BHI YAKIN NAHI HO RAHA HAI KI ,,ANNA KE SAPNE KO JAMINI MANJOORI MILEGI.... SUSHIL KUMAR
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written by A Ram, April 09, 2011
Imagine par 1 chandragupta namese serial dikhaya ja raha hai, usme chandragupta jab apne malik se ladane ki bat karta hai to sathi gulam ko kabhi ahsas nahi hota ki yeh malik se jeet bhi sakta hai, aap logon ka koi dosh nahi hai, bheed se alag sochane wale alag tarah se sochte hai. Ve jo sochte hai aisa kar dete hai chahe nirash hatash log kitna bhi chillate rahe ki kuchh nahi hoga. Aapsabhi se agrah hai apni kamjori aur ashanka ko mass tak na pahuchaye to behtar hoga. Aapki in nirashatatmak bato ka anna par to koii asar nahi padega kintu ve log jo ramkhudaiya me hai unko nuksan ho sakta hai. Jeevan me nirash hone se kuchh hasil nahi hoga jahan hai vahis se asha ki kiran jagaye . Bhagvan apki madad kare.
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written by lutfi, April 08, 2011
rajesh ranjan very good
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written by मदन कुमार तिवारी, April 08, 2011
अन्ना वस्तुत: नत्था हीं हैं। रामदेव के इशारे और ८-१० तथाकथित सिविल सोसायटी वालों के नाम पर यह सारा ड्रामा कर रहे हैं , वैसे नाम अच्छा कमा लिया । अन्ना के पिछे कौन-कौन है सबको पता है और उनका स्वार्थ क्या है यह भी पता है , एक स्वार्थी तो अभी-अभी पल्ला छुडा के भागा है, समझ गया की लोग उसकी मंशा से वाकिफ़ हो चुके हैं। हेगडे , संतोष हेगडे नाम का वह जज जो लोकपाल बनने का सपना पिरोये था । अब बारी है , किरन बेदी, केजरीवाल, अग्निवेश, भुषण पिता-पुत्र की ।
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written by चंदन कुमार मिश्र, April 08, 2011
भाई तहरीर चौक एक तमाशा था न कि कोई क्रान्ति। इस पर ज्यादा पढ़ना हो तो tewaronline.com पर अंदाजे-बयां खंड में पढ़ लीजिए। मैं ऊब चुका हूं यह सुन-सुन कर तहरीर चौक-तहरीर चौक-तहरीर चौक।

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