अरविंद केजरीवाल की करनी पर प्रभाषजी ने सवाल खड़ा किया था

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यशवंतजी, आज मैं घर से निकला तो ठान रखा था कि आज तो उसे जरूर देखूंगा. पर वो कहीं नहीं दिखा. मैंने आवाज भी दी. पूछा भी के भाई क्या तुम वाकई में परास्त हो गए. मर गए क्या. सडकों पर लोगों की आवाजाही बदस्तूर जारी थी. पुलिसवालों की वर्दी पहले जैसे ही चमक रही थी. उनके चेहरे पे वही तेज़ था. कचहरी में पहले जैसी ही भागमभाग थी. कलक्ट्रेट तहसील में भी वही आलम था. गोया के कुछ हुआ ही ना हो. अजीब शहर है ये हमारा. वहां दिल्ली में सारा देश बदल गया और यहाँ...

खैर मेरा मन भ्रम था टूट गया. भ्रष्टाचार कहीं नहीं मिला. ना वो घायल ही दिख पड़ा ना ही मृत. जो ब्रह्म स्वरुप हो, अंतरमन में बसता हो वो इन क्षुद्र चक्षुओं से कैसे दीखता. मुझे लगता है कि कल से वो हमारे और गहरे अंतरमन में उतर गया है. वहीं पड़ा-पड़ा ठहाके लगा रहा होगा. असल में भ्रष्टाचार हाथ बदलते उन रुपयों में नहीं, उन हाथों में नहीं. उस मन में, मस्तिष्क में, दिल में होता है जो ये सब कराता है. यही है असली भ्रष्टाचार.. बौद्धिक भ्रष्टाचार.. जो कि ज्यादा खतरनाक है. इसके रहते आर्थिक भ्रष्टाचार के खात्मे की बात बेमानी है.

आपको बताऊँ, अभी 'कागद कारे' पढ़ रहा था. 2009 की बात है. अरविन्द केजरीवाल जी RTI पुरस्कार बांटने जा रहे थे. इसके लिए एक ज्यूरी बनाई थी, जिसमें 11 सदस्य थे. जहां तक मुझे याद पड़ता है मात्र 3 सदस्य मीडिया क्षेत्र से थे. केजरीवाल जी के दिल्ली आगमन और क्रियाकलापों का संक्षिप्त परिचय देने के बाद प्रभाष जी ने लिखा..."अरविन्द केजरीवाल के ये पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति है उसमें ऐसे अख़बार और उसके मालिक संपादक भी हैं, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया. ........समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाजा है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपयों का काला धन बनाया है."

आगे प्रभाष जी ने लिखा "अरविन्द केजरीवाल से मैंने यही पूछा कि भाई, जो क़ानून भ्रष्टाचार का भंडा फोड़ने के लिए बनाया गया है और जो लोगों के सही सूचना पाने के अधिकार को उनका मौलिक अधिकार बनता है, उसके आन्दोलन और पुरस्कारों से आप एक ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को कैसे जोड़ते हो, जिसने पूरे चुनाव भर जनता के सूचना के अधिकार का खुद उल्लंघन किया, भ्रष्टाचार में लिप्त रहा और अपनी इन करतूतों पर पर्दा डालने के लिए मतदाता जागरण अभियान चलाता रहा, जिसमें आप और हमारी अरुणा राय भी शामिल हो गयीं?"

प्रभाष जी तो ये कह के रह गए- "चलिए एक बार मान लें कि ये सवाल पत्रकारिता और व्यवसाय के हैं और इनके उत्तर अरविन्द केजरीवाल और अरुणा राय से नहीं मांगे जाने चाहिए." पर यश जी आज तो स्थिति दूसरी है. अरविन्द केजरीवाल गांधीवादियों के साथ हैं. गांधी जी के लिए साधन और साध्य दोनों की शुचिता सामान रूप से महत्वपूर्ण थी. अब तो उन्हें बताना ही चाहिए के किस कारण वे ऐसा करने को मजबूर हुए और आज जबकि उन्होंने जबरिया तरीके से हमारा विश्वास अपने नाज़ुक कंधों पे लाद लिया हैं, क्या गारंटी है कि आगे वो ऐसे मजबूर नहीं होंगे. हाय रे मजबूरी तेरा नाम ही.. महात्मा गाँधी है. वो मीडिया क्षेत्र से सम्बंधित तीन लोग थे- मधु त्रेहन, प्रणय रॉय और संजय गुप्त.

यश जी हमारी यही चारित्रिक दुर्बलता सारी विसंगतियों की जड़ है. हमारे शहर में भी अन्ना के समर्थन में ठीक-ठाक कार्यक्रम हुए. मैं भी मानव श्रृंखला से जुड़ा. अपनी-अपनी डफली लिए जो भी आ सकता था आया... परशुराम युवा मंच, भैरव सेवा संघ, अखिल भारतीय ब्राहमण महासभा, कायस्थ सभा, युवांश नामक संगठन के छुटभैया नेता आदि-आदि इत्यादि तथा बरेली की क्रीम अर्थात रीयल सिविल सोसाइटी के लोग, जो कि बात-बात पे मोमबत्ती जलाने लगते हैं. अन्ना ने जलवा क्या किया इन डफली वालों के लिए मुझे दो लाइनें याद आयीं- "शैतान एक रात में इंसान बन गए, जितने नमक हराम थे कप्तान बन गए."

सडकों पे रिक्शेवाले सवारी ढो रहे थे, ऑटो वाले भी, बस वाले भी, दुकानों पे मजदूर काम कर रहे थे... पूरा सर्वहारा वर्ग निश्चिन्त था. बुद्धिजीवियों, सॉरी-सॉरी सिविल सोसाइटी ने जिम्मेदारी ले ली है. अब तो भ्रष्टाचार मिटा ही मिटा. तो यश जी इसी ख़ुशी में जोश मलीहाबादी की एक नज़्म हो जाए... लम्बी है इसलिए पेज स्कैन कर के भेज रहा हूँ.

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कुशल प्रताप सिंह

बरेली


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Comments (3)Add Comment
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written by sp semwqal, April 14, 2011
apne bahut accha lekh likha hai .e kavita kiski hai?plpl back comment dene ke kripa keejie
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written by Indian citizen, April 10, 2011
bahut khoob, bahut achchha lekh hai..
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written by ्मदन कुमार तिवारी, April 10, 2011
बहुत सटीक लेख है । पाच बार एट ला ने इस देश की आजादी की लडाई का हाईजैक कर लिया था और उसका परिणाम है दो टुकडे में बट गया देश और हमे मिला एक भ्रष्ट हिन्दुस्तान । साधन की सार्थकता गांधिवादियों के लिये मायने नही रखती । गांधी ने कहा जरुर था की साध्य से ज्यादा साधन की पवित्रता होनी चाहिये लेकिन दक्षिण अफ़्रिका में बनिये की दुकान पर चंदा मागनेवाली जोरजबरदस्ती भी उन्होने की थी , उसे सही भी ठहराया था , हां ईमानदारी के साथ इसका जिक्र भी अपनी आत्मकथा में किया है ।

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