अन्‍ना हजारे ने किया भरोसा का सौदा

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राजीव शर्मा“जिस समिति में टूजी घोटाले को घोटला न मानने वाले कपिल सिब्बल और मोइली शामिल हों उस समिति की विश्वसनीयता को ऊपर वाला ही बचा सकता है। अन्ना हजारे ने गले में मरे हुए नहीं, जिंदा सांप डाल लिए हैं। समिति में पांच मंत्रियों के नाम पर सहमति से जाहिर होता है कि अन्ना भी जनसरोकार से ज्यादा समझौतावादी राजनीति में विश्वास करते हैं।

अन्ना राइट टू रिकॉल के लिए आंदोलन चलाने की बात करते हैं, लेकिन 1969 में बने अधिनियम के अनुच्छेद 49(0) की जानकारी लोगों के नहीं देते। क्या इससे अन्नागिरी पर कोई असर पड़ेगा...। समय बताएगा कि अन्ना ने भी समझौतावादी राजनीति के जरिए लाखों-लाख लोगों के साथ धोखा किया है...भरोसे का व्यवसाय किया है।”

...जेपी आंदोलन के बाद शायद ये पहला मौका है, जब इतने व्यापक जन समर्थन के साथ अन्ना हजारे आंदोलनरत है। जनचेतना के नजरिए से ऐसे कई आंदोलन और अन्ना हजारे जैसे नेतृत्व कर्ताओं की जरूरत है। मगर सवाल ये है कि क्या जन लोक पाल लाकर भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा? सुझाव यह है कि अन्ना हजारे के आंदोलन से जागी जनता को भारतीय संविधान की उन बारीकियों से बावस्ता किया जाए जो सफेद पोश भ्रष्टाचारियों-अपराधियों को संसद और विधान सभा में जाने से रोक पाने में सक्षम हैं।  अभी तक जो हो रहा है वो भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के लिए हो रहा है, भ्रष्टातार रोकने के लिए नहीं।

अन्ना हजारे के समर्थक कह सकते हैं कि सजा के डर से नेता अफसर बेईमानी और भ्रष्टाचार की दलदल में जाने से डरेंगे...और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। ये तर्क से भी भ्रष्टाचार खत्म नहीं होता। अन्ना हजारे और उनके समर्थक जरा दिल-और दिमाग दोनों से सोचें। संविधान के पन्नों को पलटें और देखें कि क्या भ्रष्टाचारियों को संसद और विधान भवनों में घुसने से रोकने का हक हमें मिला है या नहीं। अग्निवेश, रामदेव, किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल क्या आपने संविधान पढ़ा है! अगर पढ़ा है तो फिर लोक पाल बिल के नाम जुटाई भीड़ को वो चाबी क्यों नहीं थमा देते जो भ्रष्टाचारियों की किस्मत पर हमेशा के लिए ताला जड़ सकती है। क्या आप को इस भीड़ पर भरोसा नहीं है, या ये भीड़ आप पर भी भरोसा नहीं करती।

माफ कीजिएगा, कहीं आप और ये मजमा सिर्फ टेलीविजन की फुटेज खाने के लिए तो नहीं जुटाया गया है। टेलीविजन पर आमरण अनशन के फुटेज और सरकार की बेचैनी से जनता जनार्दन खूब प्रेरणा ले रहे हैं। कानून बहुत से बने हैं..एक लोक पाल बिल और बन जाएगा, लेकिन क्या गारंटी इस लोक पाल बिल के भी सही ढ़ग से पालन किया जाएगा। इस आंदोलन में जुटे सभी कारसाज-बेकार, किसान-मजदूर, मास्टर-डाक्टर, वकील-सकील, आदमी-औरत, बच्चे-बूढ़े, जवान-अधेड़, आप सभी से भी निवेदन है कि अन्ना हजारे की धोती की खूंट पकड़ कर मत चलते रहना। उस कुंजी को भी पकड़ लेना जो किसी भी लोक पाल कानून से ज्यादा ताकतवर है। ध्यान रखिए, गांधी जी राह दिखाते थे। अपने पीछे भीड़ जुटाने के खिलाफ थे गांधी जी।

अन्ना हजारे के इस आंदोलन में जी-जान से जान भरने वालों, जरा सच्ची-सच्ची बताना आप और आपके दोस्त, घर वालों में से कितने लोग वोट डालने जाते हैं... जाते भी हैं तो किस नीयत से वोट डालते हैं। वोट नहीं डालते तो किस नीयत से नहीं डालते...। क्या आपको सिर्फ वोट डालने और न डालने का ही अधिकार है..। क्या आप जानते हैं कि आपको निकम्मे नेताओं की किस्मत पर हमेशा-हमेशा के लिए ताला डालने का भी संवैधानिक अधिकार है। जी ! हां, संवैधानिक अधिकार। हिंदुस्तान के हर वोटर को ये संवैधानिक अधिकार दिया 1969 में बने अधिनियम का अनुच्छेद 49(0) ने। वोटिंग के समय बूथ पर जाओ और पीठासीन अधिकारी से फॉर्म 49(0) मांगिए और भ्रष्टाचारी की किस्मत पर मुहर नहीं ताला जड़ दीजिए ...किसी धोती की खूंट पकड़ कर पीछे मत चलो...अपने दिमाग की बत्ती जलाओ...!!!

लेखक राजीव शर्मा एस-1 न्यूज चैनल में डायरेक्टर न्यूज के पद पर कार्यरत हैं.


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