''कमेटी में होंगे अन्‍ना हजारे के पांच नुमाइंदे''

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डा. नूतन ठाकुरअन्ना हजारे के प्रयासों के बाद भारत सरकार द्वारा जन लोकपाल विधेयक के सम्बन्ध में जिस प्रकार से सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया वह निश्चित रूप से सराहनीय है. इस प्रस्तावित विधेयक की आवश्यकता और इसकी महत्ता के विषय में हम सभी भलीं-भाति परिचित हैं, अतः मैं उस पर नहीं जाते हुए सीधे एक ऐसे मुद्दे पर आती हूँ जो आज जल्दीबाजी में कर तो दिया गया है पर आगे चल कर इसके अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

कई बार कोई बात उस समय छोटी सी दिखती है और उस अवसर पर सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगता है. पर यही मामला बाद में नासूर बन सकने की शक्ति रखती है.  यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो ज़रा गौर से पढ़िए भारत सरकार के उस गज़ट नोटिफिकेशन को जिसमें यह घोषणा है कि जन लोकपाल बिल लाने के लिए एक साझा ड्राफ्टिंग कमिटी बनेगी. इस सरकारी गजट नोटिफिकेशन में लिखा है-

“साझा ड्राफ्टिंग कमिटी में भारत सरकार के नुमाइंदे के तौर पर पांच मंत्री इसके सदस्य होंगे और इसमें अन्ना हजारे (उनको लेते हुए) के पांच नुमाइंदे होंगे.” फिर यह भी लिखा गया- “अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे उन्हें लेते हुए निम्न होंगे'' ये वे शब्द हैं जो अपने अपने-आप में भयानक खतरा समेटे हुए हैं. इन शब्दों से सीधे-सीधे एक सरकार और एक व्यक्ति आमने-सामने खड़े से दिखते हैं और उनके बीच समानता का भाव प्रकट होता है.

मेरा यह दृढ मत है कि एक व्यक्ति चाहे वह कितना भी महान या बड़ा क्यों ना हो, एक सरकार नहीं हो सकता. इस तरह की शब्दावली के जरिये साफ़ तौर पर गलत सन्देश जाने का भी अंदेशा रहता है और भविष्य के लिए खतरनाक दृष्टांत भी बन जाया करते हैं. ठीक है कि अन्ना हजारे बहुत अच्छे आदमी हैं. यह भी सही है कि उनके साथ लगे हुए उनके “नुमाइंदे” भी उतने ही अच्छे हैं. पर यदि हमारे देश में इसी तरह से क़ानून बनाने के लिए सरकारी दस्तावेजों में निजी व्यक्तियों के नाम ले कर नुमाइंदे चुने जाने लगे तब निश्चित तौर पर आज नहीं तो कल अराजकता बढ़ेगी ही.

आज अन्ना हजारे के नुमाइंदे आये हैं, कल मेधा पाटेकर के नुमाइंदे होंगे, परसों अरुणा रॉय के नुमाइंदे, उसके अगले दिन अरुंधती रॉय के, फिर किसी अन्य मसले पर मल्लिका साराभाई के, फिर यदि मेरी सामजिक हैसियत और रसूख में बढोत्तरी हो गयी तो मेरे नुमाइंदे और इसी तरह बढते हुए ना जाने किन-किन ऐसे लोगों के भी जो पूर्णतया अवांछनीय हों. जितने लोगों के मैंने नाम लिए हैं वे सब तो आम जनता की निगाहों में सर्वमान्य तौर पर साफ़-सुथरे लोग हैं, अपराधी नहीं हैं, जनहित के कार्यों में जुड़े हुए हैं और बौद्धिक रूप से समर्थ हैं.

पर क्या ऐसा नहीं होगा कि कल को मलखान सिंह, सुल्ताना डाकू, दाउद अब्राहम या कोई अन्य व्यक्ति भी इसी तरह मांग करने लगे कि अब मेरे भी पांच या सात नुमाइंदे चुनो जो किसी नए मुद्दे पर क़ानून बनाने में मदद करेंगे. मैं पूरी तरह यह मानती हूँ कि “अन्ना हजारे के नुमाइंदे” शब्द की जगह “सिविल सोसायटी से चुने हुए लोग” या यहाँ तक कि “सरकार द्वारा अन्ना हजारे के साथ वार्ता/ सहमति से चयनित लोग” का प्रयोग होना ही चाहिए था. उसकी जगह “अन्ना हजारे के नुमाइंदे” शब्द कुछ ऐसा रूप प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे राजनीति और दूसरे क्षेत्रों की तरह सिविल सोसायटी तथा सामाजिक कार्यों के क्षेत्रों में भी उसी प्रकार के पक्षपात या भेदभावपूर्ण व्यवहार संभव है, जैसा समाज के दूसरे क्षेत्रों में हुआ करता है.

वैसे यह एक अच्छी पहल है कि अब शायद देश में पहली बार पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) की तर्ज़ पर क़ानून के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गयी है. मैं यह समझती हूँ कि यह प्रक्रिया आगे भी चलती रहेगी और इस तरह से जनता और सरकार के बीच में कानून-निर्माण का या पीपीपी हमेशा के लिए सुनिश्चित कर दिया जाएगा.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस, लखनऊ


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