पत्रिका की 'अहिंसक आक्रामकता' और भास्‍कर का 'टॉक शो'

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राजेंद्र हाड़ा भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की जंग को अखबारों ने भी भुनाने में कसर नहीं छोड़ी। यह और बात है कि इससे वे उस बिल्ली समान नजर आ रहे हैं जो सौ-सौ चूहे खाकर हज करने निकलती है। दैनिक भास्कर, अजमेर ने एक कार्यक्रम किया जिसे नाम दिया 'रीडर्स टॉक शो' जिसमें रीडर्स की जगह ज्यादातर अखबारों के वेल विशर्स या छपास रोगी जुटाए गए। कई चेहरे वे थे जो शहर में भ्रष्टाचार के लिए पहचाने जाते हैं।

राजस्थान पत्रिका कहां पीछे रहने वाला था। गुलाब कोठारी ने 'अहिंसक आक्रामकता' शीर्षक से भ्रष्टाचार पर लंबा-चौड़ा प्रवचन दे डाला। पहले कोठारी जी की आक्रामकता पर निगाह डालते हैं, ''मीडिया का एक हिस्सा व्यापारिक हो गया है...., जब भी किसी पाये से जुडे़ व्यक्ति का व्यवहार लोकहित अथवा कानून के विरूद्ध देखेंगे, उसे दिया अपना आधार-सहारा खींच लेंगे। उसका सार्वजनिक बहिष्कार घोषित कर देंगे। ऐसे नेता, अफसर और मीडिया की पहचान करना मुश्किल काम नहीं है.....,जो मीडिया भ्रष्ट और अपराधी तत्वों के साथ जुड़कर धन कमाने में लग जाए, स्वयं माफिया की तरह व्यवहार करे। जनहित की परवाह ही नहीं करे। हम न ऐसे मीडिया को घर में घुसने देंगे न ऐसे राजनेता, अफसर को अपने कार्यक्रमों में बुलाएंगे, न उसके यहां जाएंगे.... भ्रष्ट मीडिया भी या तो सुधर जाएगा या निबट जाएगा.....।''

तालियां......, अरे तालियां क्यों नहीं बजा रहे भाई। कोठारी जी ने ऐसा जोशीला लेख लिखा है। देखिए कितना सुधारात्मक आह्वान किया है माफिया की तरह व्यवहार करने वाले मीडिया का बहिष्कार करेंगे। सम्मानीय कोठारी जी पेड न्यूज के बारे में क्या कहेंगे। अपन पहले भी शपथ लेकर कह चुके हैं, फिर अपनी बात दोहराते हैं, अजमेर नगर निगम के अगस्त 2010 को हुए चुनाव में राजस्थान पत्रिका अजमेर ने पैसे लेकर खबरें छापी और अपन ने खुद अपने हाथों से उसके प्रबंधन को पैसे दिए और प्रबंधन ने 'उपर के आदेश'  की मजबूरी बताते हुए पैसे लिए। राजस्थान पत्रिका में कोठारी जी से उपर पता नहीं कौन है? दूसरी बात कोठारी जी राजस्थान पत्रिका द्वारा सरकार से मिली जमीनों, रियायतों के साथ अपने यहां कार्यरत पत्रकारों को दिए जा रहे वेतन और उसके मुकाबले में अर्जित उनकी संपत्तियों का खुलासा करने की पहल क्यों नहीं करते?

यही बात दैनिक भास्कर पर लागू होती है, वह भी पेड न्यूज नीति के पैरोंकारों, हिमायतियों और उसे पूर्ण निष्ठा, कड़ाई और तत्परता से लागू करने वालों में पहले नंबर पर है। अजमेर के नामी पत्रकारों, अखबारों, पत्रकार संगठनों, अफसरों ने मिलकर पत्रकार कॉलोनी में पत्रकारों के नाम पर कैसे-कैसों को सरकारी जमीनें बांटी, एक इस मामले को ही पारदर्शिता अपनाते हुए सार्वजनिक कर दें, पत्रकारों की ईमानदारी, पारदर्शिता, निष्ठा, सत्यता सामने आ जाएगी।

''भ्रष्टाचार मिटाना है तो शुरुआत बाहर से नहीं भीतर से करनी होगी'' का संदेश देने वाला भास्कर खुद अपने से इसकी शुरुआत क्यों नहीं करता? अंतरराष्ट्रीय टेबल टेनिस कोच रणजीत मलिक भी भास्कर के इस टॉक शो में थे। टॉक शो में बैठे चेहरों को देख वे यहां भी अपनी स्पष्टवादिता पर काबू नहीं रख पाए और टोक बैठे कि यहां मौजूद लोग भ्रष्टाचार पर बोलने से पहले अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें कि खुद कितने ईमानदार हैं।

वकील सूर्य प्रकाश गांधी टॉक शो के अगले दिन कोर्ट में मिलते ही बोले, रजिया फंस गई गुंडों में। बोले, ''काहे का टॉक शो, सभी चोर-भ्रष्टाचारी इकट्ठे हो गए थे। हम दो चार जो सही थे की हालत रजिया जैसी हो गई।''  अपन भी नहीं चूके टोक दिया, इतने ही ईमानदार हो तो वहां यह बात कहते और इसी बात पर आयोजन छोड़ कर चले आते। अहसास तो कराना चाहिए था कि शो के नाम पर भ्रष्टाचारियों को इकट्ठा किया जा रहा है या ईमानदारों को?

टॉक शो में कुछ ऐसे लोग भी थे जिनकी पैदाइश निम्न मध्यम परिवार में हुई, आड़ के लिए कोई व्यवसाय अपना रखा है परंतु भ्रष्टाचार की बेल सदा हरी की तर्ज पर चलते हुए आज करोड़ों में खेल रहे हैं। चार महीने के लिए अजमेर में एक स्वायत्तशासी निकाय प्रमुख बनने का मौका क्या मिला कि चार पीढ़ियों का इंतजाम कर लिया। और टॉक शो में ईमानदारी के पुतले बन बैठे। अजमेर में इस मुहिम की संयोजक हैं प्रमिला सिंह। एक स्कूल की संचालक हैं। उनसे पूछा गया, आपको संयोजक किसने और कैसे बनाया। बताया किरण बेदी का फोन आया था। पूछ रही थी, भ्रष्टाचार का कोई आरोप तो नहीं है। कह दिया काम करवाने के लिए कई जगह पैसे दिए हैं। आगे भी कराना होगा तो नहीं दूंगी, ऐसा नहीं कह सकती। पता नहीं किरण बेदी ने अन्ना को यह बातें बताई या नहीं,  आपकी जानकारी के लिए बता दें कि उनका स्कूल अजमेर के एक अन्य स्कूल के साथ सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं में हुई अनियमितता के लिए खासा चर्चित रह चुका है। टॉक शो में शामिल ज्यादातर का ऐसा पोस्टमार्टम किया जा सकता है।

भास्कर और पत्रिका को इससे कुछ हासिल हुआ या नहीं पता नहीं परंतु इतना जरूर है कि उन्होंने इसके नाम पर अखबारों में जितना स्पेस खराब किया उसकी जगह अगर किसी भ्रष्टाचार को उजागर करती खबर छापते तो जरूर पाठकों को कुछ हासिल हो जाता।

राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक पत्रकारिता करने के बाद अब पूर्णकालिक वकील के रूप में अजमेर में कार्यरत हैं. 1980 में बीए अध्ययन के दौरान ही पत्रकारिता से जुड़े. दैनिक लोकमत, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर आदि अखबारों में विभिन्न पदों पर कार्य किया. साप्ताहिक हिंदुस्तान, आकाशवाणी, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रदूत आदि में भी रचनाएं, खबरें, लेख प्रकाशित-प्रसारित. 1986 से वकालत भी शुरू कर दी और 2008 तक वकालत - प़त्रकारिता दोनों काम करते रहे. अब सिर्फ वकालत और यदा-कदा लेखन. पिछले सोलह साल से एलएलबी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा भी रहे हैं.


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