फरजंद भाई की जय हो

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अमिताभमैंने भड़ास पर इंडिया टुडे के लब्धप्रतिष्ठ और अति-सम्मानित पत्रकार फरजंद अहमद से जुडी एक खबर देखी और उसी खबर के नीचे फरजंद साहब का एक कमेंट भी देखा जिसमें उन्होंने यशवंत द्वारा प्रस्तुत सामग्री पर अपना एतराज़ जताया है. इस पूरे प्रकरण के विषय में अनभिज्ञ होने के नाते मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा पर फरजंद भाई का जिक्र आ जाने के कारण उन के सम्बन्ध में अपने विचार अवश्य प्रकट करूँगा.

यह हम सभी जानते हैं कि फरजंद भाई इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. आज से नहीं, कई एक सालों से. जी हाँ, इंडिया टुडे के! और जब मैं दो बार इंडिया टुडे कह रहा हूँ और उस पर इतना जोर दे रहा हूँ तो इसका कोई खास मतलब है. आज की पीढ़ी के लोग शायद इंडिया टुडे का मतलब नहीं समझ सकते. आज यह साप्ताहिक पत्रिका मीडिया के भीड़ और ख़बरों के जंगल में मात्र एक बहुत बड़ी पत्रिका है पर एक समय था जब इंडिया टुडे अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ “आज का भारत” हुआ करता था.

मैं बात कर रहा हूँ अस्सी और नब्बे के दशक की जब इंडिया टुडे के कवर पेज से ले कर उसके आखिरी पन्ने तक का हर एक शब्द अपने आप में मायने रखता था. सरकार को हिलाने और गिराने की ताकत रखता था यह नाम. इसके आर्टिकल का प्रभाव इतना अधिक हुआ करता था कि बड़े-बड़े लोगों के नीचे से जमीन खिसक जाया करती थी. बहुत बड़ी-बड़ी हस्तियाँ भी इंडिया टुडे के कवर पेज पर अपना फोटो पा जाने को बुरी तरह बेचैन और बेताब रहा करती थीं.

फरजंद साहब उस “गोल्डन एरा (स्वर्ण काल)” के इंडिया टुडे के पत्रकार थे. मैंने उनका नाम सबसे पहले इंडिया टुडे और बीबीसी से जुड़े गोरखपुर के अत्यंत क्षमतावान पत्रकार कुमार हर्ष से सुना था जब मैं वहाँ एएसपी के रूप में तैनात था. वे जब फरजंद भाई के बारे में बात करते तो एकदम से तरल हो जाते और उनके प्रति एक अज्ञात श्रद्धा भाव से भर जाते. हर्ष की बातों से साफ़ दिख जाता था कि उनकी निगाहों में फरजंद अहमद एकदम अलग किस्म के इंसान हैं.

फिर फरजंद भाई से मुलाक़ात पहली बार कुमार हर्ष के छोटे भाई और उतने ही मेधा-संपन्न पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता उत्कर्ष के साथ हुई. जहां कुमार हर्ष फरजंद भाई का नाम अत्यंत शालीनता से लेते, वहीँ उत्कर्ष की बातों में हलकी सी उद्धता और उतना ही अपनापन होता. दरअसल हर्ष और उत्कर्ष दोनों भाईयों में जहां कई सारी समानताएं हैं वहीँ राम और लक्ष्मण की तरह उन्ही दोनों की तर्ज़ पर स्वभाव में कुछ नैसर्गिक अंतर भी है.

मैंने फरजंद भाई के बारे में, उनकी सहजता के विषय में, उनकी ईमानदारी, उनकी सरलता, उनकी कर्तव्य-निष्ठा के बारे में इतना कुछ सुन रखा था पर मन फिर भी यकीन करने को नहीं चाहता था. कारण भी बहुत साफ़ था. मैंने इस समय तक कई पत्रकार साथियों को ऐसा पाया था जो अपने-आप में कुछ अवांछित गरूर में रहते अथवा कुछ ऐसी फिजा बिखेरते रहते जिसे हिंदी भाषी प्रदेशों में लोग आम-तौर पर “भौकाल” कहते हैं. जैसे कहते हैं कि “दुल्हन वही जो पिया मन भावे”, उसी तरह से यह कि “पत्रकार वही जो भौकाल फरमाए.”

अब ऐसे में यदि भाटपाररानी, देवरिया तथा भटहट, गोरखपुर के पत्रकार साथियों का इतना स्व-प्रचारित रूतबा था तो इंडिया टुडे के उत्तर प्रदेश के मुखिया का कितना जलजला होगा, आप इसका अंदाजा स्वयं ही लगा सकते हैं. मैंने अपनी गणितीय बुद्धि का प्रयोग करते हुए सोचा कि फरजंद साहब के भले आदमी कहे जाने के कारण यदि उस नाजो-अंदाज़ का चौथा हिस्सा भी लगाया जाए तब भी काफी हुआ.

मैं यही सोच कर उत्कर्ष के साथ फरजंद भाई के हजरतगंज के पास स्थित फ़्लैट में गया. पर वहाँ जो आदमी मुझे मिला वह तो शायद हर्ष और उत्कर्ष, इन दोनों भाईयों द्वारा बताए गए वर्णन से भी अधिक सरल, सहज, भला, मानवीय और सामान्य किस्म का था. मैं यहाँ सामान्य को सामान्य रूप में नहीं ले रहा हूँ क्योंकि मेरे जीवन का अनुभव मुझे यही बताता है कि सामान्य होना कितना असामान्य और दुष्कर कार्य है. मैं जब फरजंद भाई से मिला था उस समय इंडिया टुडे का वह स्वर्णिम काल अपने पूरे परवान पर था.

जिस व्यक्ति के एक इशारे पर, एक फोन पर बड़े-बड़े राजनेता और नौकरशाह उनके कहे किसी भी काम को कर के अपने आप को कृतार्थ समझते, वही व्यक्ति अपने बहुत ही मामूली कामों के लिए अपने छोटे भाई उत्कर्ष को एक तरह से अनुरोध कर रहे थे और उत्कर्ष भी एक घरेलू व्यक्ति की तरह आधा हाँ, आधा ना करते जा रहे थे. मैं यह साफ़ अनुभव कर सकता था कि फरजंद भाई उत्कर्ष से अपने ये छोटे-छोटे काम इसीलिए कह रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा करके के कारण उन्हें आगे चल कर उत्कर्ष का एहसानमंद हो कर उनका कोई गलत-सही फेवर नहीं करना होगा. उत्कर्ष घर के थे, उन पर हक था और वे उत्कर्ष को भली-भाँती जानते थे.

उन्हें मालूम था कि इस प्रक्रिया मे उन्हें अपने जमीर और अपने ईमान के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा. वे जानते थे कि उनके लिए अपने जमीर और अपनी खुद्दारी से बढ़ कर कुछ भी नहीं है और वे इन चीज़ों को दुनिया की बड़ी से बड़ी नेमत के लिए खोना नहीं चाहते थे.

फरजंद भाई के व्यक्तित्व का यही वह पहलू रहा है जिसका मैं बहुत ही बड़ा फैन रहा हूँ और जिसकी संभवतः हर व्यक्ति अंदर से प्रशंसा करता है. अपने कलम-रुपी हथियार को किसी भी कीमत पर नहीं बेचने का उनका दृढ निर्णय और अपने काम में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करने के लिए अपनी समस्त जरूरतों और फैलाव को इतना कम कर लेने का फैसला, अपने आप में ऐसे गुण हैं जो फरजंद अहमद को समकालीन पत्रकारिता ही नहीं, आज के वृहद सामाजिक परिदृश्य में भी एकदम से अलग ला कर खड़ा कर देता है.

मैं नहीं जानता कि फरजंद भाई इंडिया टुडे में रहेंगे या नहीं, यह भी नहीं जानता कि वे आगे पत्रकारिता करेंगे या नहीं पर यह जरूर जानता हूँ कि इंडिया टुडे उनके अंदर से कभी नहीं जा सकता और अरुण पुरी की ओरिजिनल टीम का यह शानदार खिलाडी जहां भी रहेगा पत्रकारिता और जीवन-पद्धत्ति का एक शानदार मिसाल बन कर ही रहेगा.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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Comments (2)Add Comment
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written by Abhay Kumar, April 14, 2011
Abhay Kumar Bihar

Farchand Ahmed appreciated the India Today management in spite of shabby treatment meted out to him by Group.This shows his character. Such kind of character is rare in present professional world.


Abhay Kumar

09031792498

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written by Indian citizen, April 14, 2011
बहुत खूब..

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