पाकिस्‍तान में आई बाढ़, अमेरिका जिम्‍मेदार!

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पाकिस्तानी बाढ़ में अमेरिका का हाथ. जी हाँ, कुछ किसी तरह के ख्याल होते हैं पाकिस्तान की बहुसंख्यक आबादी के. मैं अभी जिस बीस दिनों के अमेरिकी ट्रिप पर यहाँ यूएसए आई हूँ उसमे मेरे साथ अफगानिस्तान के एक और पाकिस्तान के तीन लोग भी साथ आये हैं. अफगानिस्तान के मोहम्मद अनीस हेरात के एक सरकारी कार्यालय के डाइरेक्टर हैं जबकि पाकिस्तान के फैसल अहमद, मोहम्मद असगर और मोहम्मद आरिफ रहीम तीनों ही प्रोविंसियल सिविल सर्विस के अधिकारी हैं.

ये लोग वर्तमान में पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में कार्यरत हैं. उन में एक तो पाकिस्तान स्थित पंजाब में हैं जबकि दो पाकिस्तान- अफगानिस्तान बॉर्डर पर हैं. इन दोनों देशों के प्रतिनिधियों में मैंने एक सामान बात देखी- अमेरिका के प्रति कहीं ना कहीं एक गहरी नाराजगी के भाव. वे चारों ही सरकारी अधिकारी हैं और जिस तरह हमारे देश में सरकारी अधिकारियों के बोलने पर बंदिशे होती हैं उसी तरह शायद हर देश में होती होगी. तभी ये चारों लोग बहुत सोच समझ कर ही बोलते हैं. पर इसके बावजूद भी उन लोगों की बातों से यह साफ़ जाहिर हो जाता है कि आज के समय आम पाकिस्तानी और आम अफगान के मन में अमेरिका को ले कर गहरी नाराजगी है. शायद इसका प्रमुख कारण अमेरिकी हस्तक्षेप और उनका इन दोनों देशों के शासन-प्रशासन और आम जन-जीवन पर सम्पूर्ण वर्चस्व है. इन बातों के कारण पाकिस्तानी और अफगानी लोगों में जबरदस्त नाराजगी है. उन लोगों का साफ़ मानना है कि उनके देश में स्थिरता का जो भी अभाव है, उसका नंबर एक जिम्मेदार अमेरिका है.

अमेरिका

यह सही है कि ये लोग इन पेचीदे और संवेदनशील प्रकरणों पर चर्चा नहीं करते हैं पर अंदर की फीलिंग तो किसी ना किसी रूप में बाहर आ ही जाई है. आज इन देशों में बहुतायत में लोग यह मानते हैं कि स्थिति अच्छी नहीं है तथा अमेरिकी हस्तक्षेप से आम जनजीवन भी व्यापक रूप से प्रभावित होता है. वे इन देशों की तमाम गड़बडि़यों का मूल कारण अमेरिका को मानते हैं. बलूचिस्तान की सीमा से लगे पख्तूनवाना और ग्वादर के ये अधिकारी मानते हैं कि आज आम लोगों की सोच यह है कि जो भी रहा है अमेरिका करा रहा है. स्थिति इतनी हास्यास्पद (तथा विकराल) हो गयी है कि अभी हाल में ही पाकिस्तान के सीमाई इलाकों में जो जबरदस्त बाढ़ आई थी, उसके सम्बन्ध में पाकिस्तानी यह मानते हैं कि अमेरिका ने कोई ग्लेशियर जान-बूझ कर डिस्टर्ब किया जिससे यह बाढ़ आई.

इसी तरह कुछ दिनों पहले पाकिस्तान बोर्डर पर करीब डेढ़ सौ परिवार वालों का अब तक अज्ञात कुछ कारणों से मर्डर हो गया था, पर पाकिस्तानी आश्वस्त हैं कि ये सारी हत्याएं अमेरिकी सैनिकों के द्वारा की गयीं. बल्कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इन भावनाओं के अत्यंत बलवती होने के उदाहरण तब मिल जाते हैं जब हमारे भ्रमण के दौरान कई बार इन देशों के प्रतिनिधि अमेरिकी एक्सपर्ट्स से पूछ बैठते हैं कि आप हम लोगों को तो यहाँ कुछ और बता रहे हैं और जो उनके देशों में अमेरिका और अमेरिकी सैनिकों द्वारा हो रहा है वह तो कुछ और ही है. चूँकि अमेरिका में हम जितनी भी जगह गए हैं वहाँ हर जगह लोग एथिक्स तथा मोरेलिटी पर बहुत अधिक बातें करते हैं. इसी पर इन दोनों देशों के प्रतिनिधि पूछ ही लेते हैं कि जब आपके लोग बाहर जाते हैं तो एथिक्स क्यों नहीं काम करता है?

अमेरिका

अक्सर जो उत्तर मिलते हैं वे कुछ गोल-मोल से ही होते हैं. मसलन इन प्रश्नों के उतने सही उत्तर हम नहीं दे पायेंगे क्योंकि हम मौके पर नहीं हैं अथवा हमें पूरी जानकारी नहीं है. कभी कहते हैं कि युद्ध में स्थिति अलग हो जाती है. कोई कहता है कि ऐसा सार्वभौमिक नहीं है बल्कि व्यक्ति का भी अंतर होता है. इसके अलावा भारत पाक सम्बन्ध पर भी हम लोगों की खास जिज्ञासाओं को मद्देनज़र कर मैंने उन लोगों से पूछा कि आम पाकिस्तानी भारत के बारे में क्या सोचता है. बड़ा साफ़ उत्तर मिला कि वहाँ पाकिस्तान में यह मानना रहता है कि पाकिस्तान में जो भी हो रहा है वह या तो अमेरिका करा रहा है या भारत करा रहा है. यानी कि जो बात हम सरहद के इस तरफ सोचते हैं शायद वही बात अपने ढंग से सरहद के दूसरे पार के लोग भी सोचते हैं. इनमे से कौन सच्चा है और कौन झूठा, इसका फैसला मैं अपनी सीमित जानकारी के आधार पर कैसे कर सकती हूँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस एवं कन्वेनर, नेशनल आरटीआई फोरम


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