बेसहारा होने की राह पर चल पड़ा है सहारा समूह!

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यशवंत सिंहभर पेट विज्ञापन दे देकर मीडिया हाउसों का मुंह बंद करने में अब तक सफल रहे सहारा समूह के खिलाफ न जाने क्यों एचटी ग्रुप के अखबार सच्चाई का प्रकाशन करने में लग गए हैं. यह सुखद आश्चर्य की बात है. हो सकता है हिंदुस्तान को सहारा समूह से नए विज्ञापन दर पर बारगेन करना हो या फिर शोभना भरतिया व सुब्रत राय में किसी बात को लेकर तलवारें खिंच गई हों.

और, जनता के पैसे से दुनिया भर की एय्याशियों को प्रायोजित करने वाले सुब्रत राय सहारा खुद के समूह में सैकड़ों-हजारों छेद होने के कारण दूसरों से क्या पंगा लेंगे, सो शोभना भरतिया ने इशारा कर दिया हो तो हिंदुस्तान वाले एकतरफा सहारा से मोहब्बत करने लगे हों. कारण चाहें जो हो लेकिन यह सुखद है कि सहारा समूह की सच्चाई सामने आने लगी है. बीर बहादुर सिंह समेत कई नेताओं के संरक्षण और निवेश की सैकड़ों सही-गलत कहानियों के बल पर लगातार टिके रहने वाले सहारा समूह और इसके सर्वेसर्वा सुब्रत राय सहारा के लिए आगे आने वाले दिन काफी मुश्किल भरे हैं.

पटाने और पंगा लेने की रणनीति पर चलने वाले सहारा ग्रुप की पोल खुलती जा रही है. यह समूह जिस चिटफंड के धंधे से आने वाले पैस के बल पर शहंशाह बना हुआ है, उसकी मियाद भी अगले माह जून में खत्म होने वाली है. रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 15 जून 2011 तक के लिए चिटफंड का धंधा करने की अनुमति दे रखी है. वजह, सहारा की चिटफंड कंपनी का मानक न पूरे करना और तमाम तरह के गड़बड़झाले के लिप्त होना. सहारा के बड़े पदों पर आसीन पत्रकार, मैनेजर, मालिक सब एड़ी चोटी का जोर लगा बैठे हैं कि आरबीआई चिटफंड के धंधे की अवधि को विस्तार दे दे.

सूत्रों पर भरोसा करें तो इसके लिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तक से सहारा श्री सुब्रत राय सहारा की बैठक कराई जा चुकी है. भारतीय क्रिकेट टीम का प्रायोजित कर अरबों खरबों रुपये फूंकने वाले सहारा समूह के लिए शीर्षतम नेताओं को पटा लेना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कई एक संस्थाएं सहारा समूह से बुरी तरह नाराज हो चुकी हैं. इनकम टैक्स वाले अधिकारी तो कसम खाए बैठे हैं कि सहारा वाले जहां मिलें, वहां रगड़ो. वजह यह कि एक इनकम टैक्स अधिकारी को सहारा वालों ने बहुत जलील किया था और उसी कारण उस बैच के सभी अफसरों ने कसम खा रखी है कि इसका बदल लिया जाएगा. इसी तरह आरबीआई को चैलेंज करने वाले सहारा समूह की अकल ठिकाने लगाने के लिए आरबीआई के अधिकारियों ने भी कमर कस रखी है.

न्यायपालिका का भी एक हिस्सा सहारा से खफा है. सहारा वाले की एक खास आदत है. वो ये कि पहले तो वे सामने वालों को मैनेज करने की कोशिश करते हैं. और जब वो मैनेज होने से इनकार करता है तो उस पर उसके उपर के बासेज से दबाव डलवाते हैं, फिर भी नहीं वो मानता है तो फिर सामने वाली की हिस्ट्रीशीट पता करके उसे प्रचारित और विज्ञापित करने लगते हैं और एक बड़े कुप्रचार अभियान के बल पर उसे दंडित कराने और हटवाने में सफल रहते हैं. पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ राष्ट्रीय सहारा अखबार और सहारा समय चैनलों पर चला कंपेन ताजा उदाहरण है. इस जज अजय पांडेय ने सहारा वालों की जबरदस्त वाट लगाई थी. कई वारंट और आदेश जारी कर दिए थे. सो, अजय पांडेय के खिलाफ सहारा समूह ने अभियान सा चला दिया.

सोचिए, सहारा समूह कितना देशभक्त समूह है. क्रिकेटरों, फिल्म स्टारों, नेताओं, होटलों की खरीद इत्यादि पर नोटों की बरसात करने वाला यह समूह देश की संस्थाओं की किस तरह बैंड बजा रहा है, यह अपने आप देशद्रोह है. लेकिन एक तरफ चरम राष्ट्रभक्ति का दिखावा करने वाले और दूसरी ओर अपना काम न निकलने पर राष्ट्र के आंख-नाक-कान की तरह काम करने वाली संस्थाओं के ईमानदार लोगों को बेइज्जत व पनिश कराने वाले सहारा समूह का जो 'कारपोरेट खेल' खेलने का तरीका है, वो लोगों-जनता को कनफ्यूज किए हुए हैं. बाजार वालों की कृपा से क्रिकेट जब राष्ट्रभक्ति का चरम प्रतीक बन गया हो, आस्था का प्रतीक बन चुका हो तो सहारा छाप टीशर्ट भी सहारा समूह को राष्ट्रभक्ति और आस्था का लाइसेंस दिलाने के लिए काफी है. इस लाइसेंस के बल पर जनता से पैसा उगाहना आसान हो जाता है.

इस लाइसेंस के बल पर ईमानदार संस्थाओं और ईमानदार अफसरों को धमकाना आसान हो जाता है. इस लाइसेंस के बल पर हर कहीं खुद को पवित्र और महान बताना आसान हो जाता है. दुर्भाग्य तो देखिए कि जब भारत की टीम विश्वकप क्रिकेट का मैच जीतती है तो सहारा में काम करने वाले कर्मचारियों का दिल धक से होकर रह जाता है. वजह यह कि विजेताओं पर सहारा समूह नोटों की अतिरिक्त बरसात करेगा और इसे सहारा के कर्मियों से वसूला जाएगा. भूकंप आए या विश्वकप जीते, सहारा समूह पैसे बरसाने में आगे रहता है लेकिन इसकी भरपाई अपने कर्मियों की सेलरी काट के करता है.

इनक्रीमेंट, पेंशन, भुगतान के लिए परेशान सहारा के पत्रकार, रिटायर पत्रकार, स्ट्रिंगर जब रोते-कलपते हैं तो लगता है कि नोटों की बारिश करने वाले ग्रुप के अंदर यह हालत क्यों है. फिर याद आता है वो मुहावरा. दूर के ढोल सुहावने होते हैं. सहारा के नजदीक जाने पर पता चलता है कि ताश के पत्तों पर खड़ा ये साम्राज्य है जिसका विस्तार विदेश तक हो चुका है. लंदन में होटल करके भले सहारा ने एक नया इतिहास रचा है लेकिन कुछ लोग ये भी कहने लगे हैं कि भारत में धंधा कोलैप्स होने पर विदेश भागने और रहने का पुख्ता इंतजाम कर चुके हैं सहाराश्री. पता नहीं ये जुमला-जोक, कितना सच है लेकिन कुछ तो है.

क्योंकि  सेबी (सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) की पाबंदी के बावजूद सहारा इंडिया परिवार समूह की दो कंपनियां सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड व सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड अभी भी जिस तरह से आम लोगों से पैसा बटोर रही हैं, वो बता रहा है कि सहारा समूह कितना ढीठ ग्रुप है और उसने शीर्ष स्तर पर नेताओं को किस कदर पटा रखा है. न कोई डर न भय. बता दें कि सेबी ने सहारा की इन दोनों कंपनियों पर नवंबर में आम लोगों से पैसा एकत्र करने पर रोक लगाई थी. तब सहारा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्टे ले लिया था.

बाद में स्टे निरस्त हो गया तो सेबी की पाबंदी सात अप्रैल से पूरी तरह से अस्तित्व में आ गई. सहारा का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले की जानकारी चार दिन पहले मिली है और कंपनी ने पैसा एकत्र करने की प्रक्रिया पर रोक के लिए कह दिया है. सहारा समूह के मुताबिक कोर्ट के निर्णय की जानकारी कंपनी को 11 अप्रैल को हुई. 11 व 12 अप्रैल को छुट्टी रहने के चलते इस प्रक्रिया पर पूर्ण रूप से रोक नहीं लगाई जा सकी. रोक लगाने के लिए कंपनी को उचित समय चाहिए. सहारा की आधिकारिक एजेंसी के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने की कंपनी की कोई मंशा नहीं है. कंपनी उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करने के लिए वचनबद्ध है.

देखा आपने. ये है सहारा की भाषा. किसी कूटनीतिक नेता की भाषा है इस समूह की. पैसे बटारते रहने का काम ग्राउंड लेवल पर जारी है और पब्लिक में स्टेटमेंट दे रहे हैं कि पैसा बटोरने का काम बंद करने के लिए वक्त चाहिए. हिंदुस्तान अखबार ने इसी बात का खुलासा किया है कि प्रतिबंध के बावजूद अब भी पूरे देश में सहारा समूह के एजेंट्स विवादित डिबेंचर्स बेंच रहे हैं. इन डिबेंचर्स को आम तौर पर सहारा की दो कंपनियों द्वारा जारी हाउसिंग बांड के रूप में जाना जाता है. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात में सैकड़ों एजेंट्स के अनुसार उन्हें कंपनी से इन डिबेंचर्स की बिक्री रोकने के संबंध में अब तक कोई निर्देश नहीं मिले हैं. सेबी के सलाहकार आरएन त्रिवेदी के अनुसार यह पूर्ण रूप से उच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है. यदि हमें किसी प्रकार के सबूत मिलते हैं कि सहारा की इन फर्मों द्वारा अभी भी आम लोगों से पैसा एकत्र किया जा रहा है तो हम उच्च न्यायालय के निर्देशों के उल्लंघन का मामला उठाएंगे.

सुनिए, यूपी के गोरखपुर में सहारा के एजेंट जीएन दीक्षित क्या कहते हैं. दीक्षित जी बताते हैं कि कंपनी ने अब तक बांडों की बिक्री रोकने के लिए कुछ नहीं कहा है. इसी कारण हम लोग निर्माण, अबोड व हाउसिंग बांड बेच रहे हैं.ज्ञात हो कि सहारा समूह की फर्मों के लिए तीन स्कीमों अबोड बांड, निर्माण व रियल एस्टेट स्कीमों के जरिए पैसा एकत्र किया जाता है. पूरे देश में सहारा के एजेंट किसी प्रकार की रोक के बारे में नहीं जानते हैं और लगातार आम लोगों से पैसा एकत्र कर रहे हैं. सहारा इंडिया रियल स्टेट व सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट द्वारा कंपनी रजिस्ट्रार के यहां दी गई पिछली वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इन्होंने बाजार से जून 2009 तक बांडों के जरिए 4843 करोड़ रुपए जुटाए.

सहारा के इन बांडों में पैसा लगाने वाले कितना बड़ा रिस्क उठा रहे हैं, इसका उन्हें कतई अंदाजा नहीं होगा. सेबी का कहना है कि सहारा के इन डिबेंचर्स को जारी करने में किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया है. मुम्बई स्थित इनवेस्टर एंड कंज्यूमर गाइडेंस सोसाइटी के जनरल सेक्रेट्री अनिल उपाध्याय का तो यहां तक कहना है कि यहां आम लोगों का काफी पैसा डूबता दिख रहा है. इसके चलते यहां एक एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने की मांग भी की जाएगी.

आपको पता ही होगा कि शुक्रवार को सेबी ने सार्वजनिक सूचना के जरिये निवेशकों को यह सूचित किया कि सहारा समूह की कंपनियों को 'वैकल्पिक रूप से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचर'(ओएफसीडी) के जरिये कोष जुटाए जाने से प्रतिबंधित किए जाने का आदेश इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ न्यायपीठ द्वारा बरकरार रखा गया है। न्यायालय ने 7 अप्रैल 2011 को इस संबंध में आदेश जारी किया था। सेबी से  नवंबर 2010 में सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को अगला आदेश नहीं आने तक जनता से जुटाए जाने से प्रतिबंधित कर दिया था.

इन कंपनियों पर यह आरोप लगाया था कि हालांकि उन्होंने ओएफसीडी के जरिये धन जुटाया था, लेकिन बाजार नियामक द्वारा इसकी इजाजत हासिल नहीं थी. बाजार नियामक ने सुब्रत रॉय सहारा और रवि शंकर दुबे समेत इन कंपनियों के प्रवर्तकों को भी नया आदेश नहीं आने तक जनता से धन जुटाए जाने से प्रतिबंधित कर दिया. इन प्रवर्तकों को इस मामले में सख्ती नहीं बरते जाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. सार्वजनिक अधिसूचना के अनुसार हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ ने 13 दिसंबर 2010 को सेबी के आदेश को बरकरार रखा और नियामक को अपनी जांच बरकरार रखने को कहा गया. इस बीच सेबी ने सर्वोच्च न्यायालय में भी एक विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी है. सर्वोच्च न्यायालय ने इन कंपनियों से किसी भी तरह की जानकारी मांगने की अनुमति दे दी है.

कुल मिलाकर फिलहाल कानूनी झमेले और पचड़े में फंस चुके सहारा समूह का बाल बांका होता नहीं दिख रहा है क्योंकि सहारा समूह के खिलाफ एक्शन लेने वाली संस्थाओं के उपर ऐसे भ्रष्ट नेताओं का हाथ है जो एक्शन लेने के लिए आगे बढ़ने वाले अफसरों-संस्थाओं के पैरों में बेड़ियां जकड़ देते हैं और मामला ठंडा पड़ जाता है. इस प्रकार सहारा समूह चुपचाप एक कदम और आगे बढ़ चुका होता है.

लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जाग चुकी देश की जनता को अब सहारा का खेल समझने में वक्त नहीं लगेगा. जिन भी कुछ वजहों से हिंदुस्तान अखबार ने सहारा के खिलाफ अभियान चलाया है, और मुंबई में कई एक्टिविस्ट किस्म के लोग सहारा की असलियत सामने लाकर बैंड बजाने के अभियान में लगे हुए हैं, उससे उम्मीद बंधती है कि जल्द ही सहारा को बेसहारा होना पड़ सकता है. मीडिया के ईमानदार लोगों, खासकर न्यू मीडिया से अपील है कि वे सहारा समूह की वास्तविकता जनता के सामने ले आएं, अन्य गड़बड़झालों को उजागर करें, पीड़ितों को सामने लाएं और जनता को ठगे जाने से बचाएं.

सवाल एक और भी है. सिर्फ एचटी मीडिया के ही अखबार क्यों सहारा समूह से जुड़ी खबरें छाप रहे हैं. बाकी अखबारों को सेबी के आदेशों और दो कंपनियों द्वारा जनता से जबरन धनउगाही की परिघटना नहीं दिखाई देती है. न्यूज चैनल क्यों सोए पड़े हैं. इसलिए कि मालिक-मालिक एक होता है. इसलिए कि सहारा समूह इतना विज्ञापन दे देता है कि ये मीडिया हाउस इतनी बड़ी रकम को खोना नहीं चाहते.

देर-सबेर बाकी मीडिया हाउसों को भी ये जवाब देना होगा. यहां यह बताना सही रहेगा कि मीडिया हाउसों के गलत कामों को आमतौर पर दूसरे मीडिया हाउस नहीं छापते लेकिन इधर के दिनों में एक नई परंपरा शुरू हुई है. कुछ मीडिया हाउस दूसरे मीडिया हाउसों के कारनामों को जमकर छापने लगे हैं. भास्कर समूह के जिन प्रोजेक्ट्स के खिलाफ छत्तीसगढ़ की जनता सड़कों पर है, उसकी सच्चाई का प्रकाशन द हिंदू, हिंदुस्तान, पत्रिका समेत कई अखबारों ने किया. यह अच्छा संकेत है. इसे जारी रहना चाहिए. लेकिन सहारा वाले मामले में दूसरे मीडिया हाउसों की खौफनाक चुप्पी रहस्यमयी है.

(इस आलेख में हिंदुस्तान में प्रकाशित दो खबरों से कुछ इनपुट लिए गए हैं)

लेखक यशवंत अमर उजाला, दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट में करीब 12 वर्षों तक कई शहरों में कई पदों पर काम करने के बाद पिछले चार वर्षों से दुनिया के सबसे बड़े हिंदी कम्युनिटी ब्लाग भड़ास और हिंदी के सबसे चर्चित और तेवरदार पोर्टल भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संपादक के रूप में कार्यरत हैं. यशवंत से संपर्क [email protected] This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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