भूषण पिता-पुत्र पर भीषण बहस

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अमिताभमैं ईमानदार हूँ और आप भी ईमानदार हैं. इस दुनिया का हर आदमी ईमानदार है. बल्कि जो जितना बड़ा आदमी है, वह उतना ही ईमानदार है. साधारण आदमी को ईमानदारी के बारे में ना तो कहने की जरूरत होती है और ना कोई उसकी सुनता है. उसके लिए यह पूरा प्रसंग ही बेमानी होता है. पर बड़े आदमी को पता नहीं क्यों, दिन भर ना सिर्फ अपनी ईमानदारी साबित करनी होती है बल्कि दूसरों को भी उसी हद तक बेईमान बताना होता है.

स्थिति कुल मिला कर यह हो जाती है कि मैं आपको बेईमान बता रहा हूँ, आप मुझे और हम दोनों मिल कर एक तीसरे को, या फिर बाकी दुनिया को. इस पूरे उपक्रम में ज्यादातर समय काफी मजेदार हालत बन जाते हैं. मैं अपनी बात कहने के लिए अन्ना हजारे के हाल का जंतर मंतर के महातंत्र से कहानी की शुरुआत करता हूँ. लकदक कुरता-पायजामा में चमकते, दमकते और तीखे तेवरों के बीच से मुस्कुराते अन्ना हजारे कुछ दिनों पहले दिल्ली पहुंचे तो उनके अगल-बगल दो मजबूत सिपहसालार भी हो लिए.

“सिविल सोसायटी” (यह भी एक कम मजेदार और बहु-आयामी शब्द नहीं है, उसी तरह जैसे पत्रकार शब्द जिसको चिट्ठी लिखने वाले पत्रकार से ले कर प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाला प्रेसमैन और आयरन (इस्त्री) करने वाला आदमी भी सुविधानुसार इस्तेमाल करता है) के रहनुमा के तौर पर अन्ना हजारे दिल्ली आये थे, इस देश की दशा और दिशा बदलने के लिए और जूलियस सीजर की तौर पर- “विनी, विदी, वीसी” (आई केम, आई सा, आई कौन्कर्ड- मैं आया, मैंने देखा और मैंने फतह कर लिया) सा नारा देते हुए जन्तर मंतर पर बैठ गए. सीधा सा नारा था- देश में भ्रष्टाचार अब नहीं चलेगा.

इसके साथ ही पूरे देश के प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रौनिक चैनलों ने उस नारे को वो कुंचालें भरवाई कि मैं भी पूरी तरह हतप्रभ हो गया. मैंने इससे पहले कई बार बड़े-बड़े आंदोलन होते देखे थे, कभी गलत उद्देश्य से, कभी सही उद्देश्य से, कभी स्वार्थ से प्रेरोत तो कभी परमार्थ से. पर ऐसा मैंने कभी नहीं देखा था कि पांच-सात सौ की भीड़ को पूरे राष्ट्र के आंदोलन के रूप में दर्शाते हुए इस तरह का माहौल बना दिया जाएगा जिसमे पूरे देश में काशी के “हर-हर महादेव” और हिंदू साधुओं के “हर-हर गंगे” की तर्ज़ पर नारा लगने लगेगा- “हर, हर अन्ने.”

मैं यहाँ किसी भी व्यक्ति विशेष के प्रति टीका-टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ और ऐसा भी नहीं कि बहुत साफ़ ह्रदय से उनकी कोई प्रशंसा ही कर रहा हूँ. कुल मिला कर राष्ट्रीय रंगमंच पर प्रस्तुत और अभिनीत इस महान काव्यावली की समीक्षा करते हुए ईमानदारी और बेईमानी विषयक अवधारणा पर अपने भी कुछ विचार उद्धृत करने का प्रयास कर रहा हूँ.

तो हो ये रहा था कि मंच से भारत का ओबामा “एस, आई कैन” के नारे लगा रहा था और साथ में पूरे देश के तमाम सेलिब्रिटी सोशल एक्टिविस्ट उसके नारे की गूँज के साथ अपने भी नारे जोड़ते जा रहे थे. एक अद्भुत फिजां, और एक चित्ताकर्षक माहौल. लगने लगा था कि अब कुछ होगा.

जैसे का हमेशा होता है जहां गुड होता है, वहाँ मक्खियाँ भिनभिनाने लगती हैं. जितना अधिक गुड के लिए मक्खियाँ नहीं ललचाती हैं, उससे कहीं ज्यादा नेता लोग टीवी कैमरा के लिए मार-काट मचाते हैं. यहाँ भी ऐसा ही हुआ. कुछ लोग लपलपाए पहुंचे. पर वहाँ उपस्थित “सिविल सोसायटी” वालों ने उन्हें खदेड़ दिया. कारण क्या बताया- “भ्रष्ट हैं.” चूँकि मंच भ्रष्टाचार के विरुद्ध था अतः ऐसे जगह पर भ्रष्ट नेताओं का क्या काम था. इस बात की भी बड़ी वाह-वाही हुई.

फिर हल्ला हुआ कि मान लिया, मान लिया- सरकार ने अन्ना की बात मान लिया. बस, फिर क्या था, जश्न ही जश्न, शोर-शराबा. इस शोर-शराबे से निकले पांच नाम जो भ्रष्टाचार का खात्मा करने वाले पांच पांडव बनने वाले थे. ये नाम क्या निकले, एक बार फिर हंगामा शुरू हो गया, नए किस्म का हंगामा. बाबा रामदेव बोले-“भाई भतीजावाद” तो दूसरे लोग इसके सदस्यों का कच्चा चिटठा खोलने में लग गए.

इस श्रेणी में जो नवीनतम घटनाएं हैं वह हैं भूषण पिता-पुत्र, शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर दो गंभीर आरोप. पहला आरोप है उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेताओं से उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ पीआईएल करने के लिए पैसे मांगने का. इस तरह का एक सीडी इस समय हर अखबार के दफ्तर के बाहर मुफ्त बांटा जा रहा है. दूसरा आरोप है बीस करोड की एक इलाहाबाद की संपत्ति एक लाख में खरीदने और उसमे भी सरकार को एक करोड तैंतीस लाख का स्टैम्प राशि नहीं देने का.

आरोप दोनों गंभीर है. भूषण पिता-पुत्र इससे नाराज़ हैं और कहते हैं कि इसकी तुरंत जांच/ तफ्तीश हो. मैं समझता हूँ आज देश का हर आदमी यही बात कहेगा. स्वाभाविक भी है कि एक तरफ तो हम आम नेताओं को भ्रष्ट मान कर लोकपाल बिल की बात कर रहे हैं और यदि दूसरी तरफ कोई बीस करोड की चीज़ एक लाख में खरीद कर उसमे स्टैम्प चोरी करने तथा पीआईएल के लिए पैसे मांगे जाने के वास्तव में दोषी हैं तो ये दोनों बातें एक साथ तो नहीं चल सकतीं.

मैं जानता हूँ और आप भी कि बहुत सारी जांचों की तरह इसका भी अंत राम जाने कब होगा, पर इतना अवश्य है कि इस तरह के आरोप एक व्यक्ति को अधर में लटका के छोड़ देते हैं. एक तो सच्चाई यही है कि इंसानी फितरत काफी हद तक एक सी होती है और यदि कहीं पर न्यायिक व्यवस्था ऐसी हुई कि सत्यता के ज्ञान में अतिशय विलम्ब हुआ तब तो इमानदारी की सत्यता-असत्यता पर और घना कोहरा पड़ जाता है जिसमें हर कुछ इस तरह मंद और प्रभाहीन हो जाता है जिससे किन्ही दो चीज़ों को अलग कर पाना लगभग असंभव सा हो जाता है. कष्टप्रद है पर सत्य भी आज हमारी व्यवस्था में ऐसा कुछ अक्सर देखने को मिल जा रहा है.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं, इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में पुलिस अधीक्षक के पद पर आसीन हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या फिर 09415534526 के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (5)Add Comment
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written by ishu, April 16, 2011
Amit ji,
Dhanyawad bahut hi sadhi hui vivechana karne ke liye. Yeh sach hai ki kuchh sau logon ki bheed ko karodon ki bheed ka andolan dikha diya media ne, aur unka kaam to sirf sansani wala masala parosna hai taaki koi unka chanel khol le aur advertisement mil jayen.
PArantu sarkar jo maani iskeliye uske peeche bhi dam hai. Sarkaar tak uske khufiya tantra se khabar thi ki log corruption se tang aakar bhare pade hain aur kabhi bhi fat sakte hain. Koi bada bakheda khada karne ki bajay sarkar ne jhunjhuna pakda diya hai.
Pita Putra Bhushan bandhuon ko usi tarah paak saaf hoka nikalne ki jaroorat hai jaise Raja wagairah ko thi bhale hi abhi tak raja par arop sabit na huye hon unko kursi chhodni padi aur bade ghar ki hawa bhi khane ko mili. Aropon ke aadhar par Shashi Tharur ne kursi chhodi.
Par kulmilake maha brastachar ke mahaul main kuchh to nakel daali gayi kisi par chahe woh sarkar ko lokpal ke liye manane ki baat hi ho.
Majedaar baat yeh hai ki Bhushan and Sons Pvt Ltd ne itne paise kahan se jugad liye. Ab judiciary par koi ungali nahin utha sakta to yeh maan ke hi chala jaye ki wahan koi paisa nahin khata. Jagan bhai ka afidae (declaration of assets) dekh kar to yahi laga ki har neta ke paas isse jyada maal hai, Andhra wale bechare declare kar dete hain , but equal opportunity ke desh main same job hote huye BJP ke mantriyon/netaon ne nahin kamaye aisa manne ka dil nahin kar raha par mujhe kya maloom bechare Jaitely ji ke saath galat hua ho, equal opportunity na mili ho. So sad very bad. Bechare swargiya Pramod ji Telecom jaise dudharu deparment main hote huye bhi kuchh na kama sake hin (bade bhole jo they), Bechare Dr Raman CG wale mauka hi na pate hon. Yeh bhi ho sakta hai ki inlogon ko paisa achha hi na lagta ho. Katne ko daudta hoo.
Khair koi baat nahin, Jahan school admission main hum sabhi paisa de rahe hain, kachahri main judge ke samne uska order jo woh de chuke hain usko clerk se lene ke liye bhi judge sahab ke samne hi unke babu ko paise de rahe hain, Kiraye ke makan ka agreement register karane GZB jakar har babu, seal lagane wale, raseed dene wale aur filing arne wale tak to 100-50 dete rah te hon hum log parantu phir bhi yeh maan lete hain ki Other than Congress and unke alliance ke baaki sab (officer, Judge, Neta, Mantri) imandaar hain. Agar nahin to logon ko Jantar mantar ki jagah apne bhai, baap bete ke saamne andolan karna chahiye tha.
Note: Congressiyon ne jyada din raaj kiya hai to unko mauka jyada mila hai obviously so unke kamane ke chance jyada they, mujhe kabhi kabhi lagta hia ki unke virodhi isiliye unse frustrated rahte hain ki inko jitna mauka mila humko kyon nahin (hum mauka milne par bhi na khate!!!!)
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written by ravi, April 16, 2011
madanji ne sahi farmaya hai.yeh cbi janch ke alawa court ki prakriya ke durupyog ka bhi mamla hai.
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written by Dr M.s. Pairhar, April 16, 2011
यह बात किसी के गले से नीचे नहीं उतर रही है कि इलाहाबाद के एल्गिन रोड पर 20 करोड का बंगला मामूली पैसों में अपने आप को भ्रष्‍टाचार के खिलाफ स्‍वघोषित योद्धा ले सकते हैं। लेकिन सच्‍चाई है इससे पिता पुत्र इंकार भी नहीं कर रहे हैं। सवाल यह भी पैदा होता है कि कया पूरे देश में पांच लोग ही सिविल सोसायटी के ठेकेदार हैं और यह हक उन्‍हें किसने दिया। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ नहीं कही जा सकती। यह सच भी जांच का विषय हो सकता है कि अपने आपको भ्रष्‍टाचार और जनाधिकार के लिए लडने वाले लोगों के पास अरबों की सम्‍पत्ति कहां से आई, मिशनरी और समाज के प्रति संवेदना रखने वाला व्‍यक्ति इतना अमीर हो ही नहीं सकता, वह जरूरतमंदों को निश्चित रूप से अपनी दौलत को बांट देगा। यह भी सच है कि व्‍यापारी जोडता है और समाजसेवी उसी समाज पर खर्च करता है जहां से उसने आय अर्जित की है।
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written by Indian citizen, April 16, 2011
अब यह कहा जाये कि पहला पत्थर वो मारे जिसने पाप न किया हो, तो नहीं चल सकता. सबसे कम गन्दी कमीज ही पहनने के लिये चुनी जाये तो बेहतर हो. और यदि पूरे देश का भला हो रहा हो तो एक बार फांसी भी माफ करने में कोई हर्ज नहीं. आपके मेरठ का ही किस्सा है एक पुलिस अधिकारी अपना टायलेट होमगार्ड से साफ करवा रहा था, इसमें भी वही सब होगा, जांच बैठेगी और फिर इस दौरान होमगार्ड ही पलट जाये कि साहब वो घर किसी और का था या मैं अपने ही घर में कर रहा था या तस्वीरें मार्फ्ड हैं. एक हमारे यहां ये सब होता है और दूसरी तरफ इस्रायल है जहां के राष्ट्रपति को यौन शोषण के आरोप में जेल हो जाती है. यहां अब हर शहर में हजारों राजा पैदा हो चुके हैं. इसलिये हमारे जैसे लोगों को जहां आशा की किरण दिखाई देती है वहीं चल देते हैं..
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written by मदन कुमार तिवारी , April 16, 2011
सर जी ईलाहाबाद वाला मामला सिर्फ़ टैक्स ( स्टाम्प ) की चोरी का नही है। किरायेदारी का विवाद था उस संपति पर , यह जांच का विषय है की किस परिस्थिति में जमीन के मालिक को अपनी जमीन बेचनी पडी । ३८३ से लेकर ३८९ तक कहीं न कही कोई अपराध हुआ है उक्त जमीन को बेचने के लिये बाध्य करने का । यह पुरा मामला सीबीआई की जांच का विषय है । रह गई सीडी की बात अभीतक जो सफ़ाई पिता-पुत्र दे रहे हैं वह है की सीडी अधिकर्‍त नही है । यह कहने की हिम्मत नही हो रही है की सीडी नकली है या फ़ैब्रिकेटेड है ।

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