अन्‍ना : नैतिक ताकत का प्रतिबिंब बनाम अलोकतांत्रिक फासिस्टी प्रवृ्त्ति

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गिरीशजीअन्‍ना हजारे के अनशन के बाद लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार करने के लिए बनी समिति की बैठकें शुरू हो चुकी हैं. इसे 15 अगस्त तक संसद से पारित कराने की समय-सीमा है, जो संभवतः स्वतंत्रता दिवस पर देश को उपहार जैसा ही होगा. ऐसा न होने पर अन्‍ना ने और भी बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी दी है. लेकिन इन सबके पीछे अन्‍ना के इस पूरे आंदोलन और उससे जुड़ी बातों को लेकर अनेक सवाल भी उठ रहे हैं.

अनेक लोग अन्‍ना और उनके आंदोलन में गांधी की 'नैतिक ताकत' का प्रतिबिंब देख रहे हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसमें अलोकतांत्रिक फासिस्टी प्रवृत्तियों के संकेत महसूस कर रहे हैं. सवाल तो जंतर-मंतर पर अनशन को भारी समर्थन देने वाली कुछ हजार लोगों की सिविल सोसाइटी, युवाओं और शहरी मध्यवर्ग की भीड़ को लेकर भी उठ रहे हैं कि क्या उसे और उसके समर्थन पर आधारित अन्‍ना के आंदोलन को पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाली संसद और जनप्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह सरकार से भी ज्यादा महत्व मिलना चाहिए? क्या जनता की नुमाइंदगी करने वालों के प्रति अन्‍ना और उनके समर्थकों द्वारा ऐसे शब्द सरेआम बोले जाने चाहिए जो बोले गए?

अब तो सवाल बिल को तैयार करने के लिए बनी समिति में पिता-पुत्र की एकसाथ सदस्यता को लेकर तो विपक्ष के लोगों को शामिल न करने को लेकर भी रह-रह कर उठ रहे हैं. ऐसे भी लोग हैं जो अन्‍ना के अनशन में 'ब्लैकमेलिंग की गंध' महसूस कर रहे हैं तो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आरोपित शरद पवार के मंत्री समूह से इस्तीफे और विपक्षी नेताओं को धरना स्थल पर भीड द्वारा अन्‍ना तक पहुंचने से रोके जाने को भी गलत मान रहे हैं.

जाहिर है सवालों और शंकाओं की श्रृंखला काफी लंबी है. और सबसे बड़ा सवाल तो खुद अन्‍ना ने जिस लोकपाल की बाबत कानून बनाने को लेकर अनशन किया, उस अवधारणा को ही लेकर खड़ा हो गया है. क्या किसी संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री और संसद से भी ज्यादा शक्तिसंपन्‍न लोकपाल या कोई अन्य संस्था हो सकती है? क्या प्रस्तावित जन लोकपाल की अवधारणा में कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका- तीनों ही अंगों के शीर्ष अधिकारों का केंद्रीकरण नहीं है? सीबीआइ, सीवीसी जैसी संस्थाओं को स्वायत्तता के नाम पर लोकपाल के अधीन रखते हुए लोकपाल को खुद की पहल पर जांच करने, निर्णय सुनाने और बर्खास्त तक करने का अधिकार- क्या किसी तानाशाह को पैदा नहीं करेगा?

यहां रुक कर क्या गांधी के संदेश को याद करने की जरूरत नहीं कि 'अच्छे साध्य के लिए अच्छे साधन की ही जरूरत होती है'? यानी कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अलोकतांत्रिक फासिस्टी तानाशाहीजनित कार्रवाई कोई रास्ता नहीं. क्या फ्रांस के उस मशहूर विचारक मॉन्टेस्क्यू के 'शक्ति पृथक्करण' के सिद्धांत को भुला दिया जाएगा, जो आधुनिक सभ्य संवैधानिक व्यवस्थाओं का मूल आधार है ' यानी कि राजतंत्र के विपरीत लोकतंत्र का आधार ही इस तथ्य में समाया है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में शक्तियों का पृथक्करण निहायत जरूरी है'  और जिसे महान विचारक मेडिसन ने अमेरिकी संविधान का मूल वैचारिक आधार ही नहीं कहा, इसे भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में भी काफी कुछ स्वीकार किया गया है?

आखिर इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व का उद्घोष करने वाली 1789 की फ्रांसीसी क्रांति भी लोकतांत्रिक रास्ते से तभी भटकी थी, और एक आम सैनिक नैपोलियन बोनापार्ट तभी मदांध तानाशाह सम्राट बन बैठा था, जब तीनों शक्तियों के पृथक्करण और उनके संतुलन के मॉन्टेस्क्यू के विचारों को खुद फ्रांस ने ही भुला दिया और शक्तियों के केंद्रीकरण के रास्ते को बेहतर मान बैठा-  और इसकी कीमत देश-समाज के साथ लोकतंत्र की अवधारणा को भी चुकानी पड़ी. उम्मीद की जानी चाहिए कि लोकपाल बिल में स्वस्थ और दीर्घजीवी लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार से निपटने की आड़ में केंद्रीकरण की राजतंत्रीय प्रतिच्छाया से हर हाल में बचा जाएगा.

ऐसा भी संभव है कि पिछले 40 साल से सरकारी स्तर पर, जिस अनमने ढंग से और वो भी लूले-लंगडे लोकपाल बिल को लाने की बात चल रही थी और अब फिर सरकार जिस तरह से नखदंत विहीन लोकपाल को लाना चाह रही थी, जिसकी जांच करने के सामर्थ्‍य और अधिकार पर ही अनगिनत पाबंदियां थीं-  उसकी प्रतिक्रिया में भी जनसमर्थन में अन्‍ना की टीम जनलोकपाल बिल को शक्ति के केंद्रित रूप में अभिव्यक्त करती प्रतीत हो सकती है. लेकिन यह मसला द्विपक्षीय वार्ता के विभिन्‍न चरणों में संतुलित रूप में हल हो सकता है. फिर अब तो अनेक लोकतांत्रिक देशों के उदाहरण भी सामने हैं. लेकिन स्वीडन, फिनलैंड जैसे स्कैंडिनेवियन देशों में जहां लोकपाल की शुरुआत काफी पहले हो चुकी थी, वहां के बारे में भी अनेक आदर्शवादी अच्छाइयों के साथ हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बोफोर्स घोटाले से स्वीडन ही सम्बद्ध था.

और फिर जहां तक सिविल सोसायटी, शहरी मध्यवर्ग और युवाओं की जलती मोमबत्तियों के साथ जुलूस निकालने वाले तबके के समर्थन का सवाल है तो क्या हम इस ऐतिहासिक तथ्य को भूल सकते हैं कि दुनिया में हर बदलाव, हर क्रांति, हर सामाजिक-राजनीतिक बेहतरी की शुरुआत मध्य वर्ग के जरिए ही हुई है. फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांतियां यदि मध्यवर्गीय थीं तो लेनिन ने भी बोल्शेविक क्रांति में नेतृत्व के स्तर पर मध्य वर्ग की अहमियत को स्वीकार किया था. और, ये कोई सिर्फ आज की ही बात नहीं है, दो हजार साल पहले युनानी दार्शनिक-विचारक अरस्तू ने भी सबसे बेहतर शासन और बेहतर व्यवस्था निर्मित करने में मध्य वर्ग के महत्व को समझा था. समझा जाना चाहिए कि यदि 50-60 साल पहले मार्टिन लूथर किंग जूनियर की अगुवाई में अमेरिका में अश्वेतों को नागरिक अधिकार दिलाने का आंदोलन न चला होता तो क्या आज बराक ओबामा अमेरिका के राष्‍ट्रपति हो पाते. तो मध्य वर्ग की अगुवाई हमेशा रही है. गांधी, जेपी के साथ भी शुरू में यही मध्यवर्ग था, जिसका बाद के चरणों में विस्तार हुआ.

अन्‍ना की समर्थक टीम के सदस्यों पर अनेक आरोप और चर्चित विवादित सीडी भी प्रमुखता से उभरी हैं, इन पर सफाई भी सामने आई है. लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है कि अन्‍ना समेत अनेक लोगों ने खुद की पहल पर अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करके नई और बेहतर पहल की है. दरअसल, भ्रष्टाचार और घोटालों से ऊबी जनता अब संचार साधनों के बढ़ते प्रयोग से दुनिया के अनेक देशों में भ्रष्ट शासकों के ताज को उछाले जाते देख रही है, महल छोड़ कर भागते बर्बर शासकों को ठौर की तलाश में भटकते देख रही है-  तो कमाल उस 'आतिशी आईने' का भी है, जिसने सभी स्तरों पर अवाम को जागृत किया है.

अब लोग 'सिर्फ सुविधा संपन्‍न लोगों का ही लोकतंत्र नहीं चाहते, जो उनका उनके द्वारा और उनके लिए हो.' लोग अब सही अर्थों में 'जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए लोकतंत्र'  की आकांक्षा में सड़कों पर उतर रहे हैं. गांधी ने अपने जीवन में 17 बार अनशन का सहारा लिया था- नैतिक शक्ति के प्रतीक के तौर पर. कई बार अनशन हफ्तों भी चला, पर गांधीवादी अन्‍ना ने महज 97 घंटे के अनशन में जिस दरकते जनविश्वास के सेतु को फिर से जागृत किया है- उसे आगे अनेक परीक्षाओं-चुनौतियों के दौर से गुजरना है. बात सिर्फ एक संतुलित लोकपाल बिल के निर्माण की ही नहीं है, अब बारी चुनाव सुधारों की भी है, सभी जगह व्याप्त भ्रष्टाचार के खात्मे की भी है, भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने (राइट टु रिकौल) की भी है. और उस विश्वास को फिर से लौटाने की है, जिसे आम-ओ-खास खो चुका है. लेकिन यह तभी संभव है जब जनता का जागना एक अनवरत प्रक्रिया हो- आखिर जागृत लोकपक्ष से ही राजपक्ष जागृत होता है- और तभी जागरूक लोकतंत्र निर्मित हो पाता है. और, अन्‍ना ने कम से कम सोते लोगों को जगा तो दिया ही है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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