भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम का पहला राउंड सोनिया गाँधी ने जीता

E-mail Print PDF

शेष नारायण सिंह: एक विश्लेषण : अन्ना हजारे का आन्दोलन उच्चकोटि की राजनीति का उदाहरण है : पर आसानी से हार नहीं मानने वाले हैं हमारे देश के प्रोफेशनल नेता : अन्ना हजारे के अनिश्चितकालीन अनशन के दौरान मैं अस्पताल में पड़ा था. मुझे तो पीड़ा थी लेकिन डाक्टरों ने कहा कि बहुत ही मामूली बीमारी है. जो भी हो उस दौर में कुछ लिख नहीं पाया.

कई मित्रों ने कहा कि इतनी बड़ी घटना घट रही है और आप कुछ लिख नहीं रहे हैं. लगा कि अवसर चूक रहा था लेकिन आज करीब दो हफ्ते बाद जब फिर लिखने बैठा हूँ तो लगता है कि अच्छा हुआ कुछ नहीं लिखा. क्योंकि चीज़ें इतनी तेज़ी से बदल रही थीं कि अगर कुछ लिख मारता तो ख़तरा पूरा था कि बेवकूफी भरा ज्ञान ही बघारता. अब ठीक है. अन्ना हजारे के मौजूं पर रवीश कुमार का बेहतरीन आलेख पढ़ और अन्ना के मंच से रवीश का भाषण सुन चुका हूँ. अंग्रेज़ी अख़बारों में सर्वज्ञ विश्लेषकों की शेखी पढ़ चुका हूँ और अब अन्ना हजारे के आन्दोलन को रास्ते से धकेल देने की कोशिशों के बारे में शुरुआती कोशिशों का जायजा ले चुका हूँ.

लगता है आज जो कुछ लिखा जाएगा वह थोडा बहुत सन्दर्भ में होगा. सबसे बड़ी बात अब यह समझ में आ रही है कि जिन राजनेताओं ने लोकपाल बिल को ४२ वर्षों से लटकाए रखा वे आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं. वे इस बिल को लगभग उसी क्वालिटी की सब्जी बनाने की कोशिश करेगें जैसी प्रसार भारती के साथ इन लोगों ने किया था. करीब बीस साल पहले जब प्रसार भारती की बात होती थी तो लगता था कि ऐसी संस्था बन जायेगी जो नेताओं की खूब जमकर पोल खोलेगी लेकिन प्रसार भारती का जो स्वरुप बन कर आया वह ऐसा है जैसे लाखों वर्षों से पाली गयी किसी बिल्ली ने म्याऊँ की आवाज़ निकाली हो.

जैसा कि ज़्यादातर फालतू किस्म की संस्थाओं के साथ होता है, प्रसार भारती भी सत्ता पक्ष के मित्रों को नौकरी देने का मंच बन कर रह गयी है. नेता लोग कोशिश करेगें कि लोकपाल बिल भी कुछ उसी डिजाइन का एक मंच बन जाए. लेकिन सूचना के अधिकार कानून और वेब पत्रकारिता की पूंजी से लैस इस देश का शिक्षित समाज नेताओं की मनमानी को शायद अब कारगर नहीं होने देगा. आजकल कांग्रेस की तरफ से कुछ नेता अन्ना हजारे को बेचारा साबित करने के चक्कर में जुटे हैं. उनकी टीम के खिलाफ सड़क छाप टिप्पणियाँ कर रहे हैं.

उनकी कोशिश है कि लोकपाल बिल को या तो ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाए और अगर नहीं तो इतना बवाल खड़ा कर दिया जाए कि मामला विवादित हो जाए. लेकिन सूचना की क्रान्ति, और विकीलीक्स की परंपरा से वाकिफ लोगों को उन तरीकों से बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता जिस से पहले बनाया जाता था. आगे क्या होगा वह तो अभी अंदाज़ लगाना भी ठीक नहीं है लेकिन ३० जनवरी और आज के बीच जो कुछ भी हुआ है उस पर अब अपनी बात कहने का अवसर आ गया है. इतनी सूचना पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है कि विश्लेषण करने में रिस्क बिलकुल नहीं है.

इस बात में दो राय नहीं है कि अन्ना हजारे का आन्दोलन उच्चकोटि की राजनीति का उदाहरण है. अन्ना के कैम्प में अपने लोगों को अहम रोल दिलवाकर आरएसएस/बीजेपी ने कोशिश की थी कि इस आन्दोलन को कांग्रेस के खिलाफ तूफ़ान के रूप में खड़ा कर दिया जाए. यह बिलकुल सही राजनीति थी और हर राजनीतिक पार्टी को अपने लाभ के लिए काम करना चाहिए. आर एस एस/बीजेपी की कोशिश थी कि कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बनाकर पेश कर दिया जाए और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को कांग्रेस के खिलाफ तूफ़ान के रूप में खड़ा कर दिया जाए. यह बहुत ही सही राजनीतिक रणनीति थी.

लेकिन सच्ची बात यह है कि अन्ना हजारे का आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था. वह भ्रष्टाचार मूल रूप से तो कांग्रेस में ही है लेकिन आर एस एस/बीजेपी की सरकारें भी कम भ्रष्ट नहीं है. ज़ाहिर है अन्ना का आन्दोलन आर एस एस/बीजेपी की सरकारों के खिलाफ भी है. उन्होंने इस बात को बार बार कहा भी है.आर एस एस/बीजेपी ने किसी बहुत ही पाक साफ़ आदमी के आन्दोलन को अपने हित में इस्तेमाल करने की पहली कोशिश जेपी आन्दोलन के साथ की थी. जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने १९७४ में इंदिरा गाँधी की कांग्रेस के खिलाफ आन्दोलन की शुरुआत की तो उनके साथ कुछ आदर्शवादी समाजवादी लोग ही थे. लेकिन देश में इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय के खिलाफ माहौल बन रहा था.

आर एस एस ने राजनीति के इस रुख को पहचान लिया. इस बीच बी एच यू से अपनी पढाई पूरी करके के एन गोविन्दाचार्य पटना में आर एस एस के प्रचारक के रूप में गये. उन्होंने ही जेपी से बात की और उनके आन्दोलन को आर एस एस के समर्थन की पेशकश की. जेपी को बताया गया कि आपके साथ जो समाजवादी लोग लगे हैं वे सब नेता है और नेताओं के बल पर कोई भी आन्दोलन नहीं चलता. आर एस एस में सभी कार्यकर्ता होते हैं और वे आन्दोलन को ताक़त देगें. उसके बाद तो जेपी की बड़ी सभाएं होने लगीं. शुरू में जेपी का आन्दोलन भी इंदिरा गाँधी के खिलाफ नहीं था. वे कहते थे कि राजनीति में जो गड़बड़ियां आ गयीं है उन्हें ठीक करने की ज़रूरत है और उसमें इंदिरा गांधी को भी योगदान करना चाहिए.

वे कई बार जवाहरलाल नेहरू से अपने संबंधों का हवाला भी देते थे लेकिन इंदिरा गाँधी की मानसिकता दूसरी थी. उन्होंने सोचा कि सत्ता का दमन चक्र चला कर उस आन्दोलन को निपटाया जा सकता था. वैसे महात्मा गाँधी के बाद इस देश में यह पहला आन्दोलन भी था जिसमें आम आदमी शामिल हुआ था.उन्होंने जेपी के कांग्रेस में मौजूद समर्थकों को कसना शुरू कर दिया. हेमवती नंदन बहुगुणा और चन्द्र शेखर उनकी इस नीति के शिकार हो गए. और आर एस एस ने अपने समर्थकों को पूरी तरह से आन्दोलन को ताक़त देने में लगा दिया. इंदिरा गाँधी ने जेपी को नज़रंदाज़ करना शुरू कर दिया और उनको 'कुछ लोग ' कहने लगीं.

इस बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया और इंदिरा गाँधी के अंदर का तानाशाह भड़क उठा. नतीजा यह हुआ कि जो आन्दोलन राजनीति से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए शुरू हुआ था वह कांग्रेस के खिलाफ एक तूफ़ान की शक्ल में खड़ा हो गया. बाद में १९७७ आया और आर एस एस को एक बार केंद्र की सरकार में शामिल होने का मौक़ा मिला. अन्ना हजारे का आन्दोलन भी उसी तर्ज़ पर चल निकला था. ३० जनवरी २०११ के दिन जो देश भर में लोग उठ खड़े हुए थे ,उसमें बड़ी संख्या आर एस एस के कार्यकर्ताओं की थी. इस आन्दोलन में बहुत बड़े पैमाने पर सक्रिय बाबा रामदेव के ठिकाने पर जाकर बीजेपी के अध्यक्ष ने मुलाक़ात कर ली थी.

अगर तीन चार दिन और यही हाल रहता तो आर एस एस/बीजेपी की कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय बना देने में सफलता मिल जाती. और फिर १९७४ के आन्दोलन से भी ताक़त वर आन्दोलन तैयार हो जाता. कांग्रेसी नेताओं ने भी ऐसा माहौल बनाना शुरू कर दिया था कि अन्ना हजारे न चाहते हुए भी आर एस एस/बीजेपी के हित में काम करते नज़र आने लगते. लेकिन ठीक इसी वक़्त पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हस्तक्षेप किया और अन्ना हजारे के आन्दोलन से आर एस एस/बीजेपी को अलग कर दिया. उनकी पार्टी और सरकार के खिलाफ जो तूफ़ान चल पड़ा था उसे रास्ते में ही रोक कर अपनी राजनीतिक दक्षता का परिचय दिया.

ज़ाहिर है कि आर एस एस/बीजेपी को इस खेल ने निराशा हुई और एक बड़ा राजनीतिक मौक़ा हाथ से निकल गया. बीजेपी के प्रवक्ताओं और उनकी तरफ से मीडिया में काम करने वालों का जो अन्ना के प्रति गुस्सा है वह इसी राजनीतिक घटना क्रम का नतीजा है.जिस सोनिया गाँधी को आर एस एस/बीजेपी वाले राजनेता ही मानने को तैयार नहीं थे, उसने एक बार उन्हें फिर परेशानी में डाल दिया है. अब तो आर एस एस/बीजेपी वाले यह कहते पाए जा रहे हैं कि अन्ना हजारे वास्तव में कांग्रेस के बन्दे हैं. जो भी हो देश का राजनीतिक घटना क्रम एक बहुत ही दिलचस्प दौर से गुज़र रहा है और इस युद्ध का पहला राउंड सोनिया गाँधी ने जीत लिया है. आने वाला वक़्त दिलचस्प होगा और दुनिया भर के राजनीतिक विशेषकों की उस पर नज़र रहेगी.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.


AddThis
Comments (4)Add Comment
...
written by Vinay K Pathak, April 20, 2011
Shesh ji ko aise rss fobia se grast kahana theek nahi hai...har aadmi ki apni soch hoti hai aur uska vishleshan bhi usi tarah ka hota hai....Shesh ji aaj ki pidhi ke kayi patrakaro se salon senior hain...aur unhone sirf khabron ka vishleshan kiya hai...kayi muddon par unse hamare-aapke vichar alag ho sakte hain...lekin iska matlab kisi ka fobiyagrast hona nahi hota...shesh ji ke sath JVG ke jamane maine kaam bhi kiya hai...halanki ab shayad unko meri yaad nahi hogi...lekin thode samay me hi hamane unki ek rajnitik teekakar ki yogyata ko samajhane me bhi safalata payi hai...vishay par unki pakad ki undekhi nahi ki ja sakti...aur ek patrakar ki yahi khasiyat hoti hai...main ek baar fir kahoonga ki sirf kisi ke vishleshan ko padh kar hi usake baare me pakki dharna nahi bana leni chahiye
...
written by madan kumar tiwary, April 20, 2011
सर जी मेरी टिपण्णी को व्यक्तिगत स्तर पर न लिजियेगा यह करबद्ध प्रार्थना है क्योंकि मैं आपका बहुत सम्मान एक अच्छे ईन्सान होने के नाते करता हूं। यह आंदोलन अन्ना का था हीं नहीं। वस्तुत: अन्ना को तो ठीक से पता हीं नही यह लोकपाल क्या बला है । बहुत कम पढे-लिखे लेकिन अच्छे आदमी हैं अन्ना कमी है तो नाम की भुख उसे मैं गलत भी नही मानता । अन्ना के आंदोलन के पहले हुई घटनाओं को बिना समझे सही आकलन नही निकाला जा सकता । इस आंदोलन की घोषणा रामदेव के द्वारा रामलीला मैदान में बुलाई गई सभा में अन्ना ने की थी । अन्ना को लोकपाल बिल नाम के एक थर्ड क्लास कानून के बारे में किरन बेदी और केजरीवाल जैसों ने समझाया । केजरीवाल आई आर एस की नौकरी से त्यागपत्र भले दे चुके हों आज भी आई ए एस वाली मानसिकता है उनकी । किरण तो नाम की भुखी है । अन्ना को पुरी तरह शीशे में उतार कर अनशन के ड्रामे की शुरुआत हुई । अगर आपको याद होगा तो उस दरम्यान टूजी घोटाला तथा विदेश से कालाधन वापस लाओ का मुद्दा जोर शोर से उठ रहा था । न्यायालय भी कठोर कदम उठाने के मुड में था । ठीक उसी वक्त यह आंदोलन शुरु हुआ । आपकी मीडिया ने प्रोजेकट किया की यह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन है , लोक्पाल आयेगा भ्रष्टाचार चुटकी बजाते खत्म हो जायेगा एक आपका आई बी एन ७ हैं न वह तो सबसे आगे था । कारण का पता तभी चलेगा जब उस ७ चैनल के हिस्सेदारों का नाम आप मुझे बता दें। खैर जनता पहले से भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आक्रोशित थी , उसने बिना पढे और समझे अन्ना के पिछे लाईन लगा दी। अन्ना को नाम मिला और जो लोग नही चाहते थे की भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोई ठोस कदम उठाया जाय उन्हें राहत मिली । कालेधन का मामला हीं नही दबा उसी दर्म्यान शायद २ या ३ अप्रील को ए राजा के खिलाफ़ चार्जशीत दाकिह्ल हुई किसी ने यह गवारा नही समझा की मनमोहन सिंह , काख़्ग्रेस और करुणानिधी के कुनबे के खिलाफ़ कीसी प्रकार के साक्ष्य का जिक्र है या नही । कोई यह पुछने नही आया की सीबीआई ने प्रधान मंत्री से पुछताछ की या नही । यानी अन्ना के आंदोलन ने अपराधियों के ्बचाव का काम किया । खैर बाकी कभी फ़िर कभी ।
...
written by Indian citizen, April 20, 2011
बहुत बढ़िया लेख.. आपको वह जगह नहीं मिल पाई जिसके आप हकदार हैं. लोगों ने आपकी प्रतिभा को कम कर आंका..
...
written by NIKHIL AGARWAL, April 20, 2011
lagta hai ki sheh ji ko RSS Fobia ho gaya hai.
kal ko ye na kahne lage ki center main congress ki sarkar banwane main bhi RSS ka hath hai

nikhil

Write comment

busy