'हवाला के देशद्रोही' में भूषण पिता-पुत्र के कारनामे

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संजय कुमार सिंह : हमने जो समाज बनाया है, यह उसी की अदा है : डॉ. नूतन ठाकुर के लेख, "भूषण पिता-पुत्र पर चुप क्यों हैं सिविल सोसाइटी के लोग" के संदर्भ में कहना चाहता हूं कि उनके सवाल का जवाब हरीश साल्वे ने उसी टीवी कार्यक्रम में दे दिया था,  जिसमें पत्रकार विनीत नारायण ने भूषण पिता-पुत्र पर गंभीर आरोप लगाए थे और जिसकी चर्चा नूतन जी ने की है। हरीश साल्वे ने जो कहा उससे मैं भी सहमत हूं।

उनके कहे का सार-संक्षेप यही था कि हमने जो समाज बनाया है, उसमें किसी पर कोई भी आरोप, कई बार बिना किसी आधार के लगा दिया जाता है। समाज वही कर रहा है जो करता रहा है। और इसीलिए हिन्दुस्तान टाइम्स में सीडी के ठीक प्रतीत होने से संबंधित विनोद शर्मा की खबर के बारे में पूछे जाने पर विनोद शर्मा ने जो कुछ कहा उसपर अक्सर गंभीर रहने वाले कार्यक्रम संचालक अरनब गोस्वामी को मजाक का भी सहारा लेना पड़ा।

सिविल सोसाइटी में जो सब होता रहा है यह उसी की अदा है। फर्क सिर्फ यह है कि अब मियां की जूती मियां के सिर पड़ी है। अभी तक जो सभ्य या नागरिक समाज करता था वही इस बार राजनीतिकों ने कर दिया है और नागरिक समाज ने भष्टाचार मुक्त समाज का जो सपना देखा था वह धाराशाई होता नजर आ रहा है। यह अच्छी स्थिति नहीं है पर कीचड़ में पत्थर मारने पर फूलों की बारिश होने की उम्मीद भी तो नहीं करना चाहिए। नागरिक समाज राजनीतिकों की तरह शातिर नहीं है और बड़े कमजोर व लचर तर्क दे रहा है। चकित है कि हम अच्छा काम कर रहे हैं तब भी हमपर निशाने साधे जा रहे हैं।

पर काम वैसे ही कर रहा है जैसे करता रहा है। अरविन्द केजरीवाल ने उसी कार्यक्रम में विनीत का विरोध करते हुए पूछा कि क्या वे पी चिदम्बरम, प्रणब मुखर्जी आदि को ईमानदार मानते हैं। विनीत ने इस सीधे सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया और कहा कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखता रहता हूं और इसमें कांग्रेस भाजपा का अंतर नहीं करता। पर हरीश साल्वे ने अरविन्द केजरीवाल की इस गैर-जिम्मेदारी पर आपत्ति की तो उन्होंने सफाई दी और कहा कि उनके कहने का मतलब कुछ और था। हमारे यहां राजनीतिज्ञों पर यूं ही आरोप लगा देना फैशन है और कोई भी (अरविन्द केजरीवाल), कहीं भी (टीवी बहस में) देश के गृहमंत्री और वित्त मंत्री पर बिना किसी ठोस सबूत के चलताऊ आरोप लगा देता है या उनके ईमानदार होने पर शक जता सकता है।

ऐसे में भूषण पिता पुत्र के कारनामे अभी तक जग जाहिर नहीं थे तो इसीलिए कि उनमें लोगों की दिलचस्पी थी ही नहीं। अब जब कारनामे सामने आ रहे हैं तो यकीन नहीं हो रहा है क्योंकि हमारे यहां भ्रष्ट तो शायद राजनीतिज्ञ ही (कुछ और पेशे वाले भी इस श्रेणी में आते हैं) होते हैं। भूषण पिता-पुत्र के मामले में अब सामने आई सीडी के बारे में हर कोई यही पूछ रहा है कि यह सीडी अब क्यों आई? इस तरह आरोपों के आगे झुकने पर तो किसी पर भी आरोप लगाए जा सकते हैं आदि। यहां यह कहना जरूरी है कि भ्रष्टाचार और जनहित याचिका के मामले में इनकी भूमिका पर विनीत नारायण की किताब 'हवाला के देशद्रोही' 1999 में ही आई थी। चर्चित टीवी कार्यक्रम में बार-बार कहा गया कि सीडी भेजने वाले पर्दे के पीछे हैं, सामने नहीं आ रहे (शैडो बॉक्सिंग) आदि। पर विनीत नारायण तो सामने हैं। और 20 साल से पिता-पुत्र की जोड़ी के खिलाफ हैं। विनीत नारायण ने कहा भी कि जब मैं सामने आकर विरोध कर रहा हूं तो कहा जा रहा है कि मैं बायस्ड (पूर्वग्रह से प्रेरित) हूं।

भूषण पिता-पुत्र के बारे में जानना हो तो विनीत नारायण की पुस्तक 'हवाला के देशद्रोही' पढ़ लेना चाहिए (इस पुस्तक की भूमिका लिखने का मौका विनीत ने मुझे दिया था)। नूतन जी जिस टीवी कार्यक्रम की चर्चा कर रही हैं उसमें तो विनीत बोल ही नहीं पाए (उन्हें मौका नहीं मिला या दिया ही नहीं गया) उनके पास जो सामग्री, सबूत और परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं उसे जानने के बाद कोई भी ताज्जुब करेगा कि ये लोग अभी तक कैसे बचे हुए थे या दूध के धुले क्यों माने जाते हैं। विनीत को वर्षों से जानने और उनका प्रशंसक होने के कारण कह सकता हूं कि वे यह सब बताना चाहें तो एक अच्छी पुस्तक लिख सकते हैं, फाइटिंग करप्शन इन इंडिया।

जहां तक एक करोड़ रुपए की संपत्ति एक लाख में बेचने का सवाल है, यह कानूनन संभव नहीं है। कुछ साल पहले तक यह नियम था कि 20 लाख रुपए से ऊपर की संपत्ति खरीदने-बेचने से पहले आयकर विभाग को सूचित करना होता था कि हम अमुक संपत्ति का सौदा इतने में कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि आयकर विभाग को लगता कि संपत्ति का सौदा कम पैसे में हो रहा है और कालेधन का लेन-देन हो रहा होगा तो वह उतने पैसे में उस संपत्ति को खुद खरीद लेता है। बाद में ऐसी संपत्ति नीलाम कर दी जाती थी। अब सर्किल रेट के जमाने में ऐसे धंधे पर काफी रोक लग गया है पर कोई अपनी एक करोड़ की जमीन एक लाख में नहीं बेच सकता है। लेकिन जब मामला देश के दो नामी वकील पिता-पुत्र का हो तो कानून का कौन सा पेंच ढीला था और कौन सा गिर गया ये तो वकील ही बता पाएंगे। वकीलों पर सरकार की मेहरबानी वैसे ही कम नहीं है। आप जानते ही हैं कि छोटे-मोटे कारोबार करने वाले सर्विस टैक्स की जद में हैं लेकिन वकील सर्विस टैक्स से मुक्त हैं।

लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता, दिल्ली से जुड़े रहे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना खुद का काम शुरू किया. अनुवाद के काम को संगठित तौर पर शुरू किया. ब्लागिंग में सक्रिय रहे. सामयिक मुद्दों पर लिखते-पढ़ते रहते हैं.


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