यूनिक आईडी खोल देगा भ्रष्‍टाचारियों की पोल

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मदन कुमार तिवारीभ्रष्टाचार के खिलाफ़ बातें बहुत लंबी-चौड़ी की जा रही है, लेकिन राजनीतिक दलों से लेकर समाज सुधारक कोई भी नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार मिटे। अन्ना हजारे को महाराष्ट्र से निकाल कर हिंदुस्तान और पुरी दुनिया के स्तर पर प्रसिद्ध होने का लालीपॉप दिखाकर तथा कथित सिविल सोसायटी नामक करोड़पतियों की एक संस्था ने जन लोकपाल नाम के बिल को लेकर एक अच्छा खासा ड्रामा दिल्ली में किया।

इन ड्रामेबाजों ने उस अनशन के ड्रामे को प्रचारित करने के लिये सभी तरह के हथकंडे अपनाये। मीडिया मैनेजमेंट से लेकर विभिन्न क्षेत्रों से आये ड्राइंग रुम योद्धाओं ने वहां आकर समर्थन जताया। पांच दिन तक चले इस ड्रामे तकरीबन पचास लाख रुपये प्रचार-प्रसार, टेंट-शमियाना और पीने-पिलाने में खर्च हो गये। पीने-पिलाने का मतलब है मिनरल वाटर। हासिल क्या हुआ यह भविष्य के गर्त में है। मैं शुरुआत से ही इस ड्रामे का विरोध कर रहा हूं। मुझे यह एक षड़यंत्र लगता है, भ्रष्टाचार से ध्यान बटाने का। सोने के गहने की बजाय सिटी गोल्ड देकर ठगने वाली हरकत जैसा।

अब जब यह बिल पास होने ही वाला है तो इसका सबसे पहला मुख्य पदाधिकारी अन्ना हजारे को बनना चाहिये। अगर वह नहीं बनेंगे तो बाद में इस वाहियात संस्था के असफ़ल होने की स्थिति में दूसरे के मत्थे असफ़लता का ठिकरा फोडेंगे। खैर अब मैं आता हूं असली मुद्दे पर। वह है कि भ्रष्टाचार कैसे खत्म हो या कम हो। लोकपाल एक दंडात्मक विधान है और उसके पीछे सजा का भय पैदाकर भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने की अवधारणा है। सरकार ने एक योजना लागू की थी,  उसे नाम दिया था यूनिक आईडी। यह प्रचारित किया गया था कि इस यूनिक आईडी में हरेक व्यक्ति के विषय में सभी जरूरी सूचना दर्ज रहेगी। यानी यूनिक आईडी धारक के परिवार से लेकर, गांव, पंचायत, प्रखंड, अनुमंडल, जिला, राज्य, अपराध, संपत्ति ( चल एवं अचल)  सारी सूचनायें इसमें दर्ज हो जायेंगी।

मुझे बहुत खुशी हुई थी और मैंने यह कहना भी शुरू कर दिया था कि जल्द ही वह समय आ रहा है जब कालाधन छुपाना आसान नहीं रहेगा। इस योजना के लागू होने के पहले से यह मेरी परिकल्पना थी और मैं इसपर काम कर रहा था। अपने मुंह मियां-मिठ्ठू बनने के लिये मैं यह दावा नहीं कर रहा हूं। आज भी मैं जातिवाद, दहेज और परिवार नियोजन जैसी समस्याओं पर काम कर रहा हूं। लेकिन जब यूनिक आईडी कुछेक जगहों पर जारी की गई तो यह बताया गया कि यह मात्र एक पहचान पत्र-होगा। मुझे गहरी निराशा हुई।

मैंने मंथन शुरू किया कि आखिर वोटर आईकार्ड और पैन जैसे पहचान पत्र रहते हुये फ़िर से एक नये पहचान पत्र की जरूरत क्यों पड़ी और उसके लिये नंदन निलकर्णी जैसे तकनीक के जानकार की जरूरत क्यों थी। पूरी तरह मंथन के बाद मुझे लगा कि शायद इस योजना के पीछे काम कर रहे लोग नहीं चाहते हैं कि योजना के मूल उद्देश्य का पहले खुलासा हो जाय और बडे़-बड़े कालाधन धारक सचेत हो जाएं। इसके खतरे भी थे, यूनिक आईडी में संपत्ति का विवरण दर्ज होने की संभावना से घबरा कर काले धन को तरल संपत्ति यानी सोना-चांदी, हीरे इत्यादी में परिवर्तन करने का काम शुरू हो जाता, जिसका पता लगाना कठिन था।

हालांकि सोने-चांदी की कीमतों में अचानक आये उछाल से यह लग रहा है कि यूनिक आईडी के मूल उद्देश्य का पता कालेधन वालों ने लगा लिया है और उसका भी फ़ायदा उठा रहे हैं। पूरी दुनिया में इन धातुओं की कीमत में भारी बढ़ोतरी हुई है, शायद आनेवाले समय में संभावित लाभ देखकर इन धातुओं की जमाखोरी शुरू हो चुकी है। खैर अब भी यूनिक आईडी कालेधन को बाहर निकालने का सशक्त जरिया बन सकती है।

यूनिक आईडी में संपत्ति का विवरण दर्ज होने की स्थिति में हर यूनिक आईडी धारक को अपनी संपत्ति के विवरण में उसका जिक्र करना होगा। यानी आपके मकान के टैक्स की रसीद से लेकर नये मकान-जमीन की खरीद, बैंक के खाते, कार और अन्य बहुमूल्य सामानों की खरीद के समय यूनिक आईडी का उल्लेख करना पडे़गा, थाने में मुकदमा दर्ज होने पर मुकदमा करने वाले को अपना यूनिक आईडी देना पडे़गा। चार्जशीट दाखिल होने की स्थिति में अभियुक्त की यूनिक आईडी का जिक्र पुलिस को करना पडे़गा।

प्रत्येक यूनिक आईडी का एक अपना लिंक होगा यानी जैसे ही यूनिक आईडी का उल्लेख होगा, मुख्य सर्वर में उस यूनिक आईडी से संबंधित समचना दर्ज हो जायेगी। अगर आप बैंक में पैसे जमा करने जाते हैं तो जैसे ही बैंक के कम्प्यूटर में आपका यूनिक आईडी भरा जायेगा, जमा की गई राशि आपके यूनिक आईडी में आपकी जो संपति का ब्योरा है,  उसमें दर्ज हो जायेगी। यह एक पूर्ण पारदर्शिता की स्थिति होगी। यूनिक आईडी जिस संपत्ति पर नहीं होगी वह संपत्ति बेनामी हो जायेगी और उस संपत्ति को जप्त कर लिया जायेगा। हालांकि इसमें एक बाधा उत्पन्न होगी संविधान प्रदत निजता के अधिकार में हस्तक्षेप का। लेकिन इसे दूर करना मुश्किल नहीं होगा। हमने संविधान की समानता की भावना के विपरीत जाकर जरूरतमंदों को आरक्षण का प्रवधान दिया है, उसी तर्ज पर यह भी कार्य होगा।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.


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