किसी पत्रकार साथी का मजाक बनाने की बजाय उसकी मदद की सोचें

E-mail Print PDF

यशवंत भाई जी, सर्वप्रथम मैं आपका और पत्रकारों की अपनी भड़ास का दुखी मन से शुक्रिया करना चाहता हूं, क्योंकि आपने मेरी व्यथा 'क्‍या ईमानदारी का यही सिला मिलता है?' को प्रमुखता से भड़ास पर प्रकाशित किया। दुखी मन से ऐसा कह रहा हूं कि मेरे द्वारा भेजी गई पोस्ट पर कुछ पत्रकारों ने यह कह उलाहने देने शुरू कर दिए कि देर हुई पछता रहे हो कि काश मैं भी बेइमानों की कतार में शामिल हुआ होता तथा अब पछताए क्या होत है जब चिडिय़ां चुग गई खेत? तथा बहती गंगा में हाथ धो लेते जैसी दिल दुखाने वाली बातें कह कर मेरे दिल को ठेस पंहुचाने की पूरी कोशिश की है।

मै यह भी जानता हूं कि आज के दौर में सच्चाई के रास्ते पर चलना अत्‍यंत कठिन है और ईमानदार को आज भी परेशानी, भूख, गरीबी, प्रताडऩा झेलनी पड़ती है। 20 अप्रैल को बिहार से एक शुभ चिंतक का मुझे फोन आया था और उन्होंने कहा कि आपके द्वारा लिखी गई मेल पढ़ कर यह आश्‍चर्य हुआ कि इतने पुराने पत्रकार हो और ईमादारी की बातें कह रहे हो, कुछ अटपटा सा लगता है। मैंने अपने पत्रकार भाई को कहा कि जब कभी जम्मू आओ तो मेरे पास सांबा ज़रूर आना और अपनी आंखों से देख व कानों से सुन लेना मेरे जिले के लोगों से कि मेरे बारे में लोगों के क्या राय है। मैने यहां तक भी बताया कि मेरी इतनी देर की पत्रकारिता के लंबे सफर के दौरान मैं आज तक अपना एक छोटा सा कमरा भी नहीं बना सका,  इससे और ज्यादा मैं अपनी ईमानदारी का क्या सबूत पेश करूं।

पापा द्वारा बनाए गए कुछ कमरों में से एक कमरे में मैं तथा मेरा परिवार गुज़ारा कर रहा है। पत्नी हर बार कहती है कि अपना मकान बनाओ पर कैसे और कहां से गृस्हथी की बुनियाद रखूं। आज एक वक्त का खाने का जुगाड़ करना भारी है। ऊपर से बच्चों के खर्चे,  कौन किसको समझाए,  यहां तो भूखे को कोई देता नहीं और मुफ्त की हमदर्दी से तो पेट भरता नहीं है। आप को एक बताता चलूं कि कुछ लोग दिल से भी हमदर्द होते हैं और जब से मैं अपने चैनल से बाहर आया हूं आम लोगों की तो दूर की बात है,  मेरे अपने भाइयों सहित किसी ने भी नहीं पूछा कि आज तेरे घर पकाने के लिए आटा है कि नहीं?

परन्‍तु एक शख्स जिसे मैं शायद ही अपने जीवन काल में भुला सकूं जो मेरे काम करते समय भी अपना था तथा काम छूटने के बाद भी आज मेरा हमदर्द है।  कुछ दिन पहले वह मेरे कार्यालय आए और संकोच से उन्होंने मेरी जेब में कुछ रुपये डालने के लिए अपना हाथ बढ़ाया तो मैंने उनका हाथ पकड़ ऐसा न करने को कहा और अपनी जगह से उठ दोनों हाथ जोड़कर दिए जा रहे रुपये न लेने की बात कही,  तो उन्होंने कहा कि मैं जानता था कि आप यह पैसे नहीं लोगे।  इसी कशमकश में मेरी आंखों से आंसू निकल आए और मैं किसी छोटे बच्चे की तरह रोने लगा तो उन्होंने मुझे चुप कराते व अपनी कसम का हवाला देकर पैसे रखने के लिए कहा। उन्‍होंने कहा इसे आप अपने अखबार पर खर्च करो अथवा बच्चों की फीस पर,  उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग और भी होंगे जो आपकी मदद करना चाहते हैं लेकिन आपकी ईमानदारी के चलते शायद आपकी मदद करने में आगे नहीं आ रहे हों।

एक बात और कुछ लोग पत्रकारिता का क्षेत्र चुनते ही इसलिए हैं कि पैसा कमाया जा सके लेकिन मैं यह सोच लेकर इस क्षेत्र में नहीं आया था। मैने पहले भी जिक्र किया कि अगर पैसा कमाना होता तो मैं और मेरा परिवार पापा के बनाए कमरे में नहीं रहता। एक आलीशान मकान बनाया होता। आज मैंने अपना समाचार पत्र जन चेतना शुरू किया है। लोगों का साथ मिल रहा है तमाम पत्रकार बिरादरी से मेरी अपील है कि दुआ करना कि मैं अपने मिशन में सफल रहूं। बाकी रही बात बच्चों की,  जितना मुझसे हो सकेगा करूंगा। अगर भगवान ने उनको इस धरती पर भेजा है तो उनके पालन- पोषण का भी कोई बंदोबस्त किया होगा। बाकर काम कर रहे पत्रकार बंधुओं से मेरी एक विनती है कि किसी भी पत्रकार के माली हालात बुरे हो अथवा परेशान हो तो उसको उलाहने देने की बजाए उसकी मदद करने की सोचें न कि उसका मजाक बनाएं।

सोम दत्‍त

संपादक

जन चेतना

सांबा

मो- 094192-52956


AddThis