कुछ नहीं कर पाएगा जनलोकपाल बिल!

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अमिताभ पिछले कुछ दिनों से देश में एक ही शब्द गूंज रहा है- जन लोकपाल बिल और इससे जुड़ा एक ही नाम- अन्ना हजारे. मैं इतने दिनों तक ये चर्चाएँ तो सुन रहा था पर कभी भी प्रस्तावित जन लोकपाल बिल को देखने का मन नहीं बना था. आज अचानक इस जन लोकपाल बिल का प्रस्ताव देखा तो इस कदर सन्न रह गया कि सोच भी नहीं पाया एक पूरा देश किसी भी कही-अनकही पर किस तरह आ सकता है.

मैंने और आपने इससे पहले गणेशजी को दूध पिलाने की घटना देखी और सुनी थी,  जिसके दौरान एक ही दिन के अंदर सारा देश गणेश जी को दूध पिलाने लगा था और शाम होते-होते गणेश जी ने दूध पीना बंद कर दिया था. मुझे अचरज है कि किस तरह से एक लंबे समय से गणेश जी के दूध पिलाने वाले वाली बात चल रही है और पूरा देश उसके पीछे ऐसा मंत्रमुग्ध हो कर चल रहा है,  जैसे हमने रॉबर्ट ब्राउनिंग की विश्वप्रसिद्ध कविता पाईड पायिपर ऑफ हेमलिन में देखा था जब पूरे शहर के चूहे और बच्चे इस पाईड पायिपर के पीछे बस चल ही देते हैं.

इस भूमिका के साथ मैं मुख्य बिंदु पर आ जाता हूँ. भ्रष्टाचार हमारे देश की एक प्रमुख समस्या मानी गयी है जिसके विषय में आम और खास सभी एकमत हैं. तभी तो हम देखते हैं कि नीरा राडिया जैसी महिला भी, जो आम तौर पर एक मिडलमैन (या दलाल) के रूप में मानी जाती है, राजस्थान के अपने परिचित आईएएस अफसर के साथ बातें करते हुए कथित टेप में इस बात पर कड़ा ऐतराज जताती हैं कि इस देश की उच्च न्यायपालिका में भयानक घुन लग गया है और बिना पैसे के काम नहीं होता. अभी हाल में शांति भूषण की बातचीत से सम्बंधित जो कथित सीडी प्रसारित हो रहा है उसमे शांति भूषण की आवाज़ वाले व्यक्ति जहां एक तरफ अपने पुत्र के लिए पीआईएल के नाम पर चार करोड़ रुपये मांग रहे हैं, वहीँ वह भी यह टिप्पणी करने से नहीं चूकते कि आज कल तो हाई कोर्ट जज बनाने के लिए भी पैसे चल रहे हैं. इस तरह क्या आम और क्या खास, भ्रष्टाचार से हर आदमी भयानक रूप से पीड़ित है.

इस भ्रष्टाचार रुपी दानव से निजात सभी चाहते हैं, और इसके लिए कई सारे सामाजिक कार्यकर्ता विशेष तौर पर प्रयासरत हैं. ये सभी अत्यंत सम्मानित व्यक्ति हैं और देश भ्रष्टाचार के मुद्दे को सामने लाने के लिए उनका हर तरह से आभारी है. पर इसके साथ यह बात भी ध्यान में रखना चाहिए कि कई बार अच्छे उद्देश्य मात्र से काम नहीं चलता, इसके साथ सही दिशा में और सही तरीके से प्रयास की भी जरूरत होती है. और इसी जगह पर मुझे इस कथित जन लोकपाल बिल से गहरा ऐतराज है.

पहले तो मैं यह प्रस्तुत करूँ कि इस मूवमेंट से जुड़े लोग क्या कहते हैं. इनका कहना है कि जन लोकपाल एक्ट आएगा और देश से भ्रष्टाचार की रुखसती के दिन आ जायेंगे. मैं सबसे पहले तो इसी दावे को पूरी तरह खारिज करता हूँ. कोई भी क़ानून, कोई भी नियम, कोई भी एक्ट तब तक अपना व्यवहारिक स्वरुप नहीं पकड़ सकता जब तक उसके क्रियान्वयन में ईमानदारी नहीं हो, जब तक उसका सच्चा पालन नहीं हो. यदि एक लोकपाल और कुछ उसके साथी बन भी गए तो सिद्धान्ततया यह होगा कि लोग उनके पास शिकायतें करेंगे, वे जांच करना शुरू करेंगे, सही पाए जाने पर मुक़दमा लिखवायेंगे, यदि गलत ढंग से पैसा आया साबित हुआ तो उसे सीज कर लेंगे और ना जाने क्या-क्या. लेकिन हकीकत में इसमें से कुछ भी नहीं होगा. क्यों?

बहुत सीधा सा उत्तर है. इसीलिए कुछ नहीं होगा क्योंकि हिंदुस्तान में एक-दो नहीं, सैकड़ों-हज़ारों नहीं लाखों-करोड़ों की संख्या में शिकायतें मिलेंगी. जी हाँ, एक सौ बीस करोड़ का यह देश कोई स्विट्ज़रलैंड नहीं है कि जहां लोकपाल बैठ कर आनन फानन में निर्णय कर देगा. एक-दो महीने में ही इतनी शिकायतें आ जायेंगी कि लोकपाल साहब चारों खाने चित्त हो जायेंगे. कुल लोग ही कितने होंगे- दस, बीस, तीस, पचास. और शिकायतें एक करोड. सोच लीजिए, एक आदमी पर कितनी शिकायतों का औसत हुआ. फिर वह बेचारा (मैं इस भविष्य के लोकपाल को बेचारा ही कहूँगा क्योंकि एक अकेला एक शहर में, शिकायतों की भीड़ में उसी तरह खोया दिखेगा जैसा भूसे के बीच सुई दिखती है) लोकपाल कौन-कौन सी शिकायतें देखेगा और कौन-कौन सी शिकायतें छोड़ेगा? दो-चार महीने में इसकी दशा वही हो जायेगी जो तमाम अन्य पदों और संस्थाओं की हो जाया करती है.

क्या हमारे देश में पहले से संस्थाएं कम हैं? क्या हमारे यहाँ न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं है? क्या हाई कोर्ट और निचली अदालत नहीं हैं? क्या अलग-अलग कार्यों के लिए दुनिया भर के ट्रिब्यूनल नहीं हैं- नौकरीपेशा लोगों के लिए अलग, सेल्स टैक्स के लिए अलग, इन्कम टैक्स के लिए अलग, बैंक से वसूली के लिए अलग, इलेक्ट्रिसिटी मामलों के लिए अलग. इनमे से हर नया ट्रिब्यूनल इस आस से बनाया जाता है कि चूँकि कोर्ट में बहुत मारा-मारी हैं, देरी है इसीलिए ट्रिब्यूनल बन जाए. वहाँ जल्दी-जल्दी केस निपटेंगे. फिर उसके लिए अलग भवन, अलग स्टाफ, अलग व्यवस्थाएं बनती हैं और साल भर में वहाँ भी वही हाल हो जाता है. मैंने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटीव ट्रिब्यूनल में तीस साल पहले एक केस किया था, अभी लंबित है. कई साल पुराने केस भी चल रहे हैं जबकि सोच यह थी कि छह महीने में मामलों का निस्तारण हो जाया करेगा.

अभी कुछ साल पहले केन्द्रीय और राज्य सूचना आयोग बने. बड़ा खुशनुमा माहौल बन गया. छह साल भी नहीं बीते हैं. उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग में नंबर आने में ही सात-आठ महीने तक लग जा रहे हैं, निस्तारण होने में साल से ऊपर भी. यही स्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग की है. प्रशासनिक हलकों में भी यही हाल है. राष्ट्रपति कार्यालय में शायद लाखों शिकायतें आती होंगी और प्रधान मंत्री कार्यालय में भी. मेरी पत्नी नूतन ने एक शिकायत उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के यहाँ रजिस्टर्ड डाक से भेजा था. एक दिन वहाँ के एक अधिकारी मिल गए, नूतन ने गलती से पूछ लिया कि मैंने भी एक शिकायत भेजी थी, क्या वह ऊपर चला गया होगा. उस अधिकारी ने धीरे से मुस्कुरा कर कहा कि यहाँ शिकायत पत्र एक साथ बोरों में डाल कर ट्रकों में भर के सम्बंधित स्थानों पर भेज दिए जाते हैं, आप की शिकायत भी उन्हीं बोरों में कहीं पड़ी होगी.

तात्पर्य यह हुआ कि जब सारी संस्थाएं 'काम के बोझ से मारा यह बेचारा'  बनी हुई हैं तो यह नई-ताज़ी संभावित संस्था कौन से नए कारनामे करने लगेगा. क्या जो लोग इस बिल से जुड़े हुए हैं, वे इस तथ्य को नहीं जानते? यदि जानते हैं तो फिर क्यों इस तरह से पूरे देश को छलावा कि आया, आया एक नया जादूगर आया. इस पूरी बात को कहने के पीछे मेरा मात्र यह उद्देश्य है कि यदि वर्तमान संस्थाएं कथित तौर पर फेल हैं तो हमें उन्हें तुरंत त्याग कर फिर एक नयी संस्था के चक्कर में पड़ने की जगह वर्तमान में जो संस्थाएं हैं उन्हें ही ठीक करने की बात सोचनी चाहिए और उसी दिशा में प्रयास करना चाहिए.

आज इस देश में सुप्रीम कोर्ट है, हाई कोर्ट हैं, राष्ट्रपति हैं, प्रधान मंत्री हैं, मंत्रिमंडल है, प्रत्येक राज्य में मुख्यमंत्री हैं, उनके अपने मंत्रिमंडल हैं, फिर करोड़ों शासकीय अधिकारी हैं, ना जाने कितनी ही संस्थाएं और संगठन हैं, उन सब में अपने विजिलेंस विंग हैं और तमाम तरह की व्यवस्थाएं हैं. यदि कथित तौर पर ये सब भ्रष्टाचार मिटाने में फेल हैं तो यह 'सुपरमैन' लोकपाल कौन से नए कारनामे कर लेगा?

इसीलिए मेरा यह स्पष्ट और अत्यंत दृढ मत है कि हम 'ये बीवी अच्छी नहीं, नयी बीवी लायेंगे'  का सिद्धांत छोड़ कर (जिसका एक रूपान्तर एलिजाबेथ टेलर के रूप में अमेरिका में हुआ था जो आठ-आठ शादी के बाद भी अपनी मृत्यु के समय अकेली थीं) जो कुछ अपने पास है, उसी पर पूरा ध्यान केंद्रित करें और उसी की जरूरतों को समझते हुए उन्हें पूरा करने की कोशिश करें. यह नहीं कि जो मेरे पास है, उसे तो नकार दिया और काल्पनिक लोक से एक नया शिगूफा ले आये. ठीक है, लोकपाल अपने देश में नहीं है, पर लोक आयुक्त तो हर राज्य में हैं. क्या लोग उसके कार्यों से संतुष्ट हैं? क्या लोग ऐसा मानते हैं कि लोक आयुक्त ने अपने सारे काम कर दिए? बात वहाँ भी वही है. शुरू में तो शिकायतें आती हैं और जब स्टाफ और संसाधनों की कमी के कारण वे शिकायतें लंबित रह जाती हैं तो लोगों का इन संस्थाओं पर से विश्वास कम होता जाता है, और एक समय के बाद ये अपना मूल्य खो दी सी दिखती हैं.

यह वह मूल बात है जिसके आधार पर मैं दावे से कह सकता हूँ कि लोकपाल या किसी अन्य नए संस्था के स्थान पर यदि हम मौजूदा संस्थाओं को ही मजबूत करेंगे तो वह हमारे देश के लिए वास्तविक तौर पर लाभप्रद रहेगा. यदि हमारा उद्देश्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार है तब तो हम सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, ट्रिब्यूनल, न्यायालयों, राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री कार्यालयों की जरूरतों को पूरा करने में लगें और उनकी दृष्टि से उनकी समस्याओं को समझते हुए उन्हें मजबूती प्रदान करें और यदि हमारा उद्देश्य मात्र अपने अहम की तुष्टि है तब तो हम लोकपाल के बाद एक नए संस्था के आने के लिए भी तैयार रहें.

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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