भड़ास बनाम इंडिया अगेंस्ट करप्शन

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अमिताभइस समय पूरे देश में लोकपाल बिल और उसके ड्राफ्टिंग कमिटी को ले कर चर्चाएं ही चर्चाएं हो रही हैं. थोडा चैतन्य प्रकृति का होने के नाते मैंने भी इसमें अपनी सहभागिता करते हुए ये दो छोटी कवितायें लिखीं. उसमे एक कविता यह थी-

अन्ना का गुस्सा

दिग्विजय ने आरोप लगाया,
तो अन्ना को गुस्सा आया,
बिन शांति कौन रह पाया,
ऊपर चिट्ठी लिख डाला.

अब दंगल फिर से लौटा,
हर एक को मिला है मौका,
कोई किसे बचाए फिरता,
कोई कहीं मुकदमे करता

ये पांच पांडव प्यारे,
कृष्ण डबल रोल में आये,
आगे हैं कौरव सेना,
अब सत्य-असत्य बिसारे

देखें आगे क्या होता,
मुद्दा पीछे क्या छूटा,
जब प्रेम प्रबल होएगा,
महाभारत अवश्य मचेगा

मेरी इन कविताओं पर कुछ मित्रों के विचार आये और उन में से एक युवा और उत्साही दिल्ली के कुंदन कुमार जी ने लिखा- 'सुन्दरतम अमिताभ सर, आपकी अनुमति हो तो मैं इसे इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अधिकृत पृष्ठ पर लगा दूं. ये स्वच्छ लोग कम से कम जन प्रतिक्रिया तो सुनें.'

मैंने सहर्ष अनुमति दी और उसके बाद के हमारे बीच के संवाद देखें-

कुंदन- सर भेज दिया हूँ (लोकपाल विधेयकके निर्माण हेतु बनी समिति एवं समिति के सदस्यों से जुड़े विवाद पर अपनी कविता के माध्यम से अपने विचार को अभिव्यक्त किये हैं श्री अमिताभ ठाकुर.  ये विचार मात्र उनके ही नहीं, अपितु देश के उन असंख्य युवाओं के हार्दिक उदगार तथा अंतर्द्वंद का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जो इस समिति से सकारात्मक व स्थायी परिवर्तन की अपेक्षा रखते हैं.  श्री अमिताभ ठाकुर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी है तथा सूचना के अधिकार से सम्बंधित एक राष्ट्रीय संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं.  लेखन व सामाजिक चेतना के प्रखर-प्रसार हेतु वे देश के युवाओ में अत्यंत लोकप्रिय हैं)

कुंदन (पुनः, कुछ देर बाद)- सर, वे लोग बार-बार पोस्ट को डिलीट कर दे रहे हैं. लगता है उनको हमारी बात समझ में आ गयी है.

अमिताभ- तो फिर बार-बार भेजिए, क्योंकि जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्र ना हो तब तो गड़बड़ है.

कुन्दन- सर, क्या ये नैतिक रूप से पथभ्रष्ट लोग नहीं है जो अपने मनोनुकूल विचारों को ही अपने समूह में स्थान देते हैं. असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक अपरिहार्य स्थिति है, जो सदैव किन्हीं कारणों से निर्मित होते हैं. असहमति के स्वरों से भयभीत हो कर उसे मिटाने वाले क्या इस देश को नैतिक नेतृत्व देने योग्य हैं? उपयुक्त होता कि वे लोग उन बिंदुओं पर अपने उत्तर देते. मुझे उनका यह व्यवहार न्यायोचित नहीं लगा, लेकिन मैं भी उनको ऐसे नहीं छोड़ने वाला हूँ. आज देखता हूँ कि कितनी बार डिलीट करते हैं.

अमिताभ-  वाह मेरे शेर, ये हुई ना बात.

कुंदन-  10 सेकण्ड भी पोस्ट को अपने वाल पर नहीं रहने देते है ये लोग. एक सूचना यह आपको देनी थी कि मै "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" के उस समूह से कल प्रतिबंधित कर दिया गया हूँ.  कल प्रातः एक बार मैंने आपकी कविता को वहाँ प्रेषित किया था जो कुछ ही क्षणों में मिटा दिया गया था.  उसके उपरांत मैं पुनः उसे वहाँ प्रेषित नहीं कर पा रहा था.

अब इस पूरे वार्तालाप के बाद मेरी दूसरी कविता को स्वयं ही सन्दर्भ प्राप्त हो जाता है,  जिसे सामने रखते हुए मैं सोचता हूँ कि एक यशवंत बाबू हैं,  जो भड़ास पर अपने ही खिलाफ खबर छापने से नहीं चूकते और एक यह दूसरा उदाहरण है, जहां हर कुछ बिलकुल नापा-तुला होना चाहिए-

लोकपाल बिल में बिलौटा

शुरुआत इसकी उस समय,
जब बात आई स्टैम्प की,
कि एक करोड़ फीस के,
बदले दिया क्यों कुछ रुपये

यह बात सीडी की यहाँ,
चर्चा है जिसकी चल रही,
चार करोड़ दे कर किसी
जज से पीआईएल कर देने की

उस पर जब अन्ना ये कहें,
भ्रम है कोई भरमा रहा,
अच्छा ये होता, वो कहते,
लो जांच जो भी आ रहा.

यह कार्य जो ये कर रहे,
विश्वास का और मूल्य का,
शंका और जिद के बोझ से,
वह टूट जाए ना कहीं

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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