आलोक तोमर को यह सच्ची श्रद्धांजलि नहीं है

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यशवंतजी, आलोक तोमर की याद में आयोजित प्रोग्राम ''यादों में आलोक'' काबिले तारीफ था. हॉल तक मुझे ले जाने में आप के अनुरोध से अधिक आलोक तोमर के नाम-काम ने प्रेरित किया. बोलना मैं भी चाहता था लेकिन सिर्फ एक वजह से रुक गया. वजह थी आलोक भाई की एक नसीहत जो  उन्होंने मुझे दी थी. कर नहीं सकते तो बोलो मत. लोग गंभीरता से नहीं लेंगे.

लोगों ने तरह-तरह से आलोकजी को याद किया. उनकी याद में जम कर कसीदे पढ़े और कारों में बैठ घर चले गए. मेरी नज़र में आलोक भाई को यह सच्ची श्रद्धांजलि नहीं है. आलोक तोमर बेबाक और ठोक कर लिखते थे. आज उस तरह लिखने वाले कितने पत्रकार हैं. यदि उनकी तरह लिख भी दिया जाय तो उसे छापने वाले कितने एडिटर हैं. शायद यही वजह है की जनसत्ता से नौकरी छूटने के बाद आलोक तोमर ने कहीं नौकरी नहीं की या उन्हें नौकरी नहीं मिली. आलोक भाई को पूरी तरह पता था कि तेवर के साथ आज मीडिया में नौकरी नहीं की जा सकती है.

आज मीडिया में नौकरी पाने के लिये लिखना-पढ़ना नहीं बल्कि चापलूसी-दलाली आना जरूरी है. उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी उनके जैसी निर्भीक लेखनी, बेबाक अंदाज. आलोक भाई के अन्दर जो सादगी थी, वह कितने पत्रकरों के पास है. आज एक संपादक से मिलना किसी प्रधानमंत्री से मिलने से कम कठिन काम नहीं है. सही मायने में पत्रकारिता करने वाले लोग तो रोड पर भटक रहे हैं या फिर इस पेशे को टाटा-बाय बाय कर रहे हैं. आलोक भाई भी उन्हीं में से एक थे. कथित मेनस्ट्रीम जर्नलिज्म को उन्हें भी बाय बाय करना पड़ा. लिखने के प्रति उनकी दीवानगी की क्या कीमत उनके परिवार ने चुकाई, यह तो वही जानता होगा. इक्का दुक्का को नहीं गिना जाय तो आज की मीडिया में मौजूद शेष के बारे में यही कहा जा सकता है कि...

कुहनी पर टिके हुए लोग
सुविधा पर बिके हुए लोग
बरगद की करते हैं बात
गमले में उगे हुए लोग

बरगद बनना हर किसी के बूते की बात नहीं है.

संदीप ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली


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