जागरण के जयचंद ही इसका बेड़ा गर्क कर रहे

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सोमदत्‍तयशवंत भाई जी नमस्कार, दैनिक जागरण आगरा में अपने जीवन के करीब 24 साल देने वाले श्रीमान विनोद भारद्वाज द्वारा लिखी गई व्यथा कथा पढ़ कर दिल तड़प कर रह गया। मात्र कलम के सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं उनकी मदद करने के लिए क्योंकि मैं जिस दौर से आज गुज़र रहा हूं, किसी की आर्थिक रूप से मदद भी नहीं कर सकता।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि नंगा नहाएगा क्या और निचोडे़गा का क्या? भाई जी यह जो प्रेस के मालिक लोग होते हैं न, किसी के सगे नहीं होते। जो इनके....  उठाए रखे अथवा चापलूसी करता रहे तथा अंदर ही अंदर लूटता रहे वही लोग शायद इन बेईमानों को पसंद होते हैं। मैं भी आज से कुछ वर्ष पहले दैनिक जागरण, जम्मू के विजयपुर से काम करता था और उस वक्त के जम्मू ब्यूरो ने मुझे कई साल तक बिना वेतन के काम करवाया, फिर मैं अमर उजाला में चला गया। वहां पर ईमानदारी से एक समाचार को सच्चाई से प्रकाशित करने की सजा छुट्टी के रूप में मिली। बाद में उजाला के मालिक को उस वक्त के चीफ तिवारी की करतूत का पता चलने पर निकाल दिया गया। और मैं जम्मू के स्थानीय चैनल जेके में आ गया।

वहां पर करीब आठ साल तक काम किया। कुछ समय पहले जेके की तरफ से एक अंग्रेजी डेली अखबार लांच की गई और चैनल के मालिक, जो एक समय में चरित्रहीन रह चुका है और दो नंबर के धंधे, अवैध जमीनों पर कब्जे कर आज वह बादशाह बन गया है, अपनी करतूतें छिपाने के लिए मीडिया का सहारा लेकर आज यह शख्‍स दादा बना हुआ है। जम्मू में अंग्रेजी के अखबार डेली एक्सेलसियर का एक बड़ा मुकाम है और जेके चैनल का मालिक हमसे हर वक्त यह कहता रहा कि उसका अखबार भी उसके बराबर होनी चाहिए। जबकि उसे ऐसा अखबार चलाने को कोई अनुभव नहीं है। आंशिक शिक्षा प्राप्त अनपढ़-गंवार पैसे के जोर पर अपने अखबार को चैनल के संवाददाताओं के भरोसे चलाना चाहता था। उसने नादिरशाही फरमान जारी कर चैनल वालों से विज्ञापन जुटाने और अखबार बेचने का दबाव बनाता रहता था। अब आप ही बताओ कि एक संवाददाता का काम खबरें लगाना होता है या अखबार बेचना?

हालांकि उनको मैं अपनी पहचान पर लाखों के विज्ञापन दिलवाता रहा फिर भी उस चैनल ने मेरी कीमत नहीं जानी। खुद तो मालिक गंवार उपर से सलाहकार भी ऐसे पाल रखे हैं जो अनपढ़ के बराबर हैं, सो उनका अखबार न बेचने के बदले नौकरी से बाहर कर दिया गया। उसके बाद जनवरी महीने में जागरण के जम्मू ब्यूरो अभिमन्यु शर्मा व अवधेश चौहान का फोन आया कि आप जागरण के पुराने बंदे हो विजयपुर से काम करो, जो आदमी पहले जागरण में काम करता था जागरण के लाखों रूपए लेने के साथ- साथ अन्य लोगों से भी जागरण के नाम पर लाखों की लूट की थी।

मैं जागरण में खबरें भेजता रहा और लगती भी रहीं। आज चार महीने हो गए हैं पगार का कोई नाम ही नहीं। क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकार को यह लोग बहुत परेशान करते हैं। अपनी मर्जी की खबरें मांगते हैं, आम लोगों से जुडऩे की बातें करते हैं और जब खबरें भेजो तो लगती नहीं हैं। दबाब इतना डालते हैं कि पूछो मत। पिछले कुछ दिनों से मैंने जागरण में समाचार भेजना बंद कर दिया हैं तथा पता चला है कि एक बार फिर जागरण के नाम पर लूटने वाले को ही रखने की कवायद चल रही है। कहने का भाव यह है कि जागरण एक अच्छा अखबार था परन्तु कुछ जयचंद ही इस अखबार का बेड़ा गर्क करने पर तुले हुए हैं।

तीन महीने से मुझे वेतन नहीं मिला और श्री विनोद जी को तीन महीने को एडवांस वेतन देकर घर भेज दिया गया,  इससे तो यही लगता है कि जागरण के पतन की शुरुआत हो रही है और पूरे देश में कुछ भडुए किस्म के पत्रकारों की वजह से बदनाम हो रही है। एक श्रमजीवी पत्रकार का खून चूसने वालों उस भगवान से तो डरो,  फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों के कारण ही तो किसी अखबार का नाम होता है,  अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में पत्रकारिता के क्षेत्र में लोग आने से कतराने लगेंगे। विनोद जी मेरी सहानुभूति आप के साथ है और तमाम पत्रकार बिरादरी से अपील भी करता हूं कि चापलूसी छोड़ कर पत्रकारिता के मूल्य को पहचाने,  न कि अपने माथे पर कलंक का टीका लगाएं -सोचों साथ क्या जाएगा- नंगे आए थे और नंगे ही जाओगे। कम से कम मरने के बाद तो कोई यह न कहे कि फलाना पत्रकार यार बहुत कमीना तथा बेईमान था और बच्चे भी घृणा के पात्र बनेंगे।

आज हमने खुद सुना है कि कितने ही पत्रकारों को जब वह किसी दफ्तर से पैसे लेकर निलते हैं तो बाद में वह अधिकारी किस किस्म की मां बहन एक करता है। सुनने के लिए कान इजाज़त नहीं देते। ऐसे में क्या औकात है पैसे की खातिर अपना ज़मीर बेचने वाले हरामी पत्रकारों की। बदनाम कर दिया है ऐसे लोगों ने आर्दश पत्रकातिरता को। यशवंत जी पूरे भारत में एक मुहीम चलाई जाए उन पत्रकारों के खिलाफ जिनका इस पेशे से कुछ लेना देना नहीं है और जो भ्रष्ट हैं। उनकी भी निशानदेही कर उन्हें सरेआम जलील किया जाए ताकि आने वाली पत्रकार नस्ल को सही दिशा मिले और एक बार फिर से आत्म सम्मान के साथ पत्रकार बिरादरी अपनी कलम चला सके।

सोम दत्‍त

सांबा, जम्‍मू


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