अगर करोड़पति पत्रकार सही हैं तो आतंकवादी कैसे गलत है!

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विनोद विप्‍लव: पत्रकारों द्वारा सम्पत्ति घोषित करने के पाखंड पर सवाल : कई पत्रकार अपने को ईमानदार दिखाने के लिये अपनी सम्पत्ति घोषित कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिस मीडिया हाउस में 90 प्रतिशत पत्रकार एवं कर्मचारी का 12-12 घंटे खून-पसीना बहाने के बाद दो हजार-पांच हजार या अधिक से अधिक दस हजार रूपये का वेतन पाते हैं, उसी मीडिया हाउस में अगर कोई वातानुकूलित कमरे में बैठकर अपने मातहत सहयोगियों के साथ डांट-फटकार करने और गाली-गलौच करने के लिये दो लाख रूपये से लेकर दस लाख रूपये का वेतन हथिया कर अपने को भ्रष्टाचार से मुक्त बताता है तो क्या यह ईमानदारी है।

क्या ये लखपति और करोड़पति पत्रकार अपने दफ्तर के अन्य पत्रकारों के जायज हक को नहीं हथिया रहे हैं। क्या इन्हें उनकी योग्यता और कौशल के कारण उन्हें इतना अधिक वेतन मिलता है। क्या अगर उन्हें लाखों रूपये का वेतन मिलता है तो क्या वे उस भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हैं जो उनके मालिक की ओर से किया जा रहा है। क्या लाखों रूपये की सैलरी पाने वाले ये पत्रकार अपने ही संस्थान में काम करने वाले जूनियर और जुगाड़विहीन पत्रकारों का खून चूसे जाने की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन रहे हैं। अगर ये पत्रकार इतने ही ईमानदार और नैतिक हैं तो ये पत्रकार अपने मालिक से क्यों नहीं कहते कि उनके सहयोगियों को कम से कम उतना पैसे तो मिले जिससे उनकी न्यूनतम बुनियादी जरूरतें पूरी हो और वे भी इंसान की तरह जीवन बसर कर सकें। क्या अपने सहयोगियों के शोषण को शातिर हंसी के साथ देखना अथवा उनके शोषण में शामिल रहना भ्रष्‍टाचार नहीं है।

यह सवाल अखबारों में काम करने वाले संपादकों से भी है। मैं ऐसे एक बड़े मीडिया हाउस को जानता हूं, जिस की ओर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार के संपादक को ढाई लाख की सैलरी मिलती थी। इसके अलावा वहां के कुछ प्रमुख लोगों को भी 80 हजार रुपये से लेकर एक- लाख-दो लाख रुपये की सैलरी है। अभी कुछ समय पूर्व ही वहां से हट गये हैं या हटाये गये हैं। इस मीडिया हाउस की ओर से एक न्यूज चैनल भी चलाया जाता है और एक साप्ताहिक पत्रिका भी। यहां के अखबार में मेरे कुछ लेख छपे थे और मेरे परिचित लेखकों के भी। लेकिन लेख छपने के बाद पता चला कि वहां लिखने वालों को पैसे नहीं दिये जाते हैं।

सवाल यह है कि लेखकों को पैसे क्यों नहीं दिये जाते। अगर एक संपादक दो-ढाई लाख की सैलरी लेता है और वहां काम करने वाले कई लोगों की अच्छी खासी सैलरी मिलती है। वातानुकूलित और पांच सितारा किस्म का बड़ा सा कार्यालय है। तमाम तरह की सुविधायें उपलब्ध करायी गयी है। अखबार के लिये करोड़ों का बजट है तब फिर वहां लिखने वालों को एक भी पैसा क्यों नहीं मिलना चाहिये। अगर वह संपादक जो अपने को प्रगतिशील कहते हैं, तो क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि क्या तुम्हें इस कारण तो इतनी अधिक सैलरी नहीं मिलती है ताकि तुम लेखकों को पैसे बचा लेते हो। यहां किस तरह की ईमानदारी या प्रोफेशनल इथिक्स है।

भई जब अखबार मालिक सबको पैसे दे सकता है, तो लेखक को क्यों नहीं दे सकता है। क्या अपने को महान समझने वाले उन संपादक महोदय ने मालिक से कहा कि लेखकों को भी भुगतान होना चाहिये। जब छोटा सा छोटा अखबार अपने लेखकों को अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ भुगतान करते हैं तब उस अखबार के लेखकों को क्यों नहीं मिलना चाहिये। यही हाल कई चैनलों का है, जहां लोगों को विभिन्न कार्यक्रमों के लिये बुलाया जाता है, लेकिन उन्हें कोई भुगतान नहीं होता।

ये तो हुयी श्रम की कीमत की बात। लेकिन इससे भी बड़ा एक सवाल और है। क्या कोई यह कहकर ईमानदारी का तमगा बांध सकता है कि उसके पास वेतन के अलावा आमदनी का कोई और जरिया नहीं है। क्या उस चैनल में मिलने वाला लाखों का वेतन भ्रष्‍टाचार नहीं है जो समाज में अंधविश्‍वास, अश्‍लीलता और सनसनी फैला कर समाज को भ्रमित कर रहा हैं। क्या नकली दवाइयां बनाने वाली या मिलावटी समान बेचने वाली कंपनी में काम करने वाला व्यक्ति अपने को भ्रष्‍टाचार से मुक्त बता सकता है। अगर समाज में विवके और तर्क को समप्त करने में लगे चैनलों में काम करने वाले लखपति पत्रकार भ्रष्‍ट नहीं हैं तो हिंसा और आतंक फैलाने वाले संगठनों में काम करने वाले कार्यकर्ता कैसे भ्रष्‍ट और देश विरोधी हो गये।

एक आतंकवादी तो कुछ लोगों की हत्या करता है, वह अगर देशद्रोही है तो पूरे समाज के विवेक, लोगों की वैज्ञानिक चेतना और बुद्धि की हत्या करने वाले टेलीविजन चैनल में काम करने वाले करोड़पति पत्रकार क्या भ्रष्‍ट और देशद्रोही नहीं हैं। क्या इन्हें कोई सजा नहीं मिलनी चाहिये। क्या केवल यह कहने से काम चल जायेगा, ''मैं क्या कर सकता हूं। मैं तो केवल नौकरी करता हूं। अगर हमारे चैनल के कारण अंधविश्‍वास फैल रहा है या दंगे भड़क रहे हैं, लोग गुमराह हो रहे हैं, तो मैं क्या करूं। मुझे तो अंधविश्‍वास फैलाने और लोगों को मूर्ख बनाने के लिये सैलरी मिलती है।''

अगर यह तर्क मान्य है तब एक आतंकवादी यह क्यों नहीं कह सकता कि वह भी अपने और अपने परिवार की रोजी-रोटी के लिये ऐसा कर रहा है और वह भी तो केवल नौकरी कर रहा है, अगर उसकी गोलियों से कुछ लोग मर जाते हैं तो वह क्या करे। दाउद इब्राहिम और ओसामा बिन लादेन के संगठन में काम करने वाले आतंकवादियों को किस आधार पर समाज विरोधी कहा जा सकता है। वे भी तो पैसे के लिये काम कर रहे हैं।

केवल सम्पत्ति घोषित कर देने भर से कोई अन्ना हजारे नहीं हो जाता। कोई इस आधार पर गलत नहीं हो जाता कि उसने सम्पत्ति की घोषणा नहीं की। और वे लाखों पत्रकार क्या करें जिन्हें कुछ जुगाडु लखपति पत्रकारों ने इस लायक छोड़ा ही नहीं कि उनके पास कोई सम्पत्ति हो। कितने हजारों पत्रकार हैं जिनके पास न मकान है, न बैंक बैलेंस है, न गाड़ी है - और उनके पास जो है उसकी घोषणा करने का कुछ मतलब नहीं है - क्योंकि पाखंड और झूठ पर टिका इस भ्रष्‍ट और सड़े-गले समाज में उन चीजों की कोई कीमत नहीं है।

लेखक विनोद विप्लव पत्रकार, कहानीकार एवं व्यंग्यकार हैं। वह संवाद समिति ''यूनीवार्ता''  में विशेष संवाददाता हैं। समाजिक विषयों के अलावा विज्ञान, स्वास्थ्य एवं सिनेमा जैसे विषयों पर वह लिखते रहते हैं। उन्होंने ''मेरी आवाज सुनो''  के नाम से महान गायक मोहम्मद रफी की जीवनी लिखी है जो काफी चर्चित हुई। उनसे संपर्क के लिये 09868793203 पर फोन कर सकते हैं या This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it   का सहारा ले सकते हैं।


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Comments (8)Add Comment
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written by Pankaj, April 28, 2011
Vinod ji,
Aapka lekh padha, Pahle mughe lagta tha ki mehnati, Imandar, yogy, Pratibhavan logo ki poochh hoti hai. Par mai shayad galat tha mai ek cartoonist hoo 13 sal se freelace kar raha hoo, 4sal se Rashtriya Sahara patna me kaam kar raha hoo, ............. officer ki nazer me ab bhi mai ayogy hoo. ghakh mar kar din kat raha hoo, Maa-Pitaji ne kaha tha sarkari naukari par dhayan do par mughe to is daldal me aana tha so aa gaya is daldal me.
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written by Indian citizen, April 27, 2011
ye bhi bhrastachaar ka hi roop hai..
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written by Surya prakash, April 27, 2011
Vinod,aapne sahi likha hai. Patrakaron ko iss par dhyan dena chahiye.
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written by Rohit Nage, April 27, 2011
vinod g Aapne un Chote shahron k reporters ki baat keh di, jo majboori me kuch keh nhi paate hai.
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written by AMIT GANDHI , April 27, 2011
विनोद जी आपने सही लिखा है ...जो भी लोग अपनी सम्पती का ब्यूरो दे रहे है ...सब जुगाड़बाज लोग है ...सब को बता है ये कैसे है और कौन लोग है ......ज्याद बताने की जरूरत नही .....
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written by dipendra chauhan, April 27, 2011
bahut accha likhe hain abhi aisa hi ho raha hai
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written by sanjay mishra, April 27, 2011
akhilesh bhai karorpati patrakaaron par kafee kaam kar chuke hain......pooree list na sahee....kuchh baangee pesh karne kaa sahee samay to hai hee....
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written by Amarjeet Singh , April 27, 2011
एक आतंकवादी तो कुछ लोगों की हत्या करता है, वह अगर देशद्रोही है तो पूरे समाज के विवेक, लोगों की वैज्ञानिक चेतना और बुद्धि की हत्या करने वाले टेलीविजन चैनल में काम करने वाले करोड़पति पत्रकार क्या भ्रष्‍ट और देशद्रोही नहीं हैं। क्या इन्हें कोई सजा नहीं मिलनी चाहिये। क्या केवल यह कहने से काम चल जायेगा, ''मैं क्या कर सकता हूं। मैं तो केवल नौकरी करता हूं। अगर हमारे चैनल के कारण अंधविश्‍वास फैल रहा है या दंगे भड़क रहे हैं, लोग गुमराह हो रहे हैं, तो मैं क्या करूं। मुझे तो अंधविश्‍वास फैलाने और लोगों को मूर्ख बनाने के लिये सैलरी मिलती है।'' - Bilkul Sahi likha hai, aise so called journalists ko saja milani chahiye, agar kanun nahi dega tab janata degi.

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