हे देवी मैय्या! कहां गये तुम्हारे शिव-सैनिक?

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संजीव चौहानपिछले दिनों सिडनी (आस्ट्रेलिया) में एक फैशन शो आयोजित किया गया। फैशन शो में परदे के पीछे, परदे के आगे क्या-क्या क्रिया-कर्म होते हैं, बताने की जरुरत नहीं है। हमारा देश तरक्की प्रधान देश है। बच्चा-बच्चा समझदार है। दादा-दादी, पापा-मम्मी की बात छोड़िये। सिडनी फैशन शो में भी वो सब-कुछ हुआ, जिसे देखने के लिए बूढ़े-जवान-बच्चे हर वक्त लार टपकाते रहते हैं।

इस लार-टपकाऊ लालच से मैं भी अछूता नहीं हूं। मुझे भी फैशन शो में दिखाया जाने वाला सब-कुछ वैसे ही अच्छा लगता है, जैसे तपती मई-जून में लंबी पैदल यात्रा करने के बाद घर पहुंचे मुसाफिर को पानी। फैशन शो क्यों आयोजित होते हैं? कौन लोग आयोजित करते हैं?  कैसे चरित्र वाले होते हैं यहां तमाशा करने और कराने वाले तमाशबीन? कैसी मानसिकता होती है नंगई (भारतीयों की नज़र से) के इन मेलों में जुटने वालों की? ये सब लिखकर बताने का मतलब आपका और अपना वक्त बर्बाद करना होगा?

छोड़िये। समय कीमती है। उसका सदुपयोग करते हैं। आते हैं मुद्दे पर। सिडनी में फैशन शो आयोजित हुआ। दुनिया भर के नंग... इकट्ठे हुए। हुस्न के इस मेले में शिरकत करने की तमन्ना हमारी भी थी, लेकिन हसरत अधूरी रह गयी। तंगहाली के चलते। न्यूज चैनल से मिलने वाली महीने की 'तन-खा (ख्वाह)' का कागज पर हिसाब-किताब लगाया। तो वो बेटियों की फीस, फ्लैट के लोन, कार की किश्त, घर की गैस, सब्जी, दूध वाले, परचून वाले लाला जी और दफ्तर के कुछ साथियों की उधारी में ही निपट गयी। ऐसे में भला किसी सिडनी यात्रा और किसका फैशन शो। दिल के अरमां दिल में ही घुटकर और सिकुड़-सिमट कर रह गये। ठीक वैसे ही जैसे पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा तिहाड़ जेल की 'सेल' (कोठरी) में।

सिडनी जाना हमारे नसीब में नहीं था। सो नहीं जा पाये। फालूत में कोफ्त करने से, हालात और जेब को कोसने से भला क्या मुनाफा होने वाला? हां जब इंटरनेट पर सिडनी में आयोजित फैशन शो की कलरफुल तस्वीरें देखीं, तो मन फिर ललचा उठा। उफ मैं क्यों नहीं जा पाया सिडनी में आयोजित नंगई के तमाशे में?  इंटरनेट पर एक-एक तस्वीर को क्लिक करते हुए आहें भर रहा था। मॉडल्स की हर तस्वीर अलग थी। हर तस्वीर जानलेवा थी। अचानक एक तस्वीर देखी.. तो तंद्रा भंग हो गयी। नंगी तस्वीरें देखने का भूत लम्हे भर में उतर गया। आंखों को मसलकर कम्प्यूटर स्क्रीन पर दुबारा नज़र डाली,  तो तस्वीर झूठ नहीं बोल रही थी। वो सच थी। उस एक तस्वीर ने बाकी नंगी तस्वीरों का रंग उतार दिया था। इस एक तस्वीर में थी.. 20-21 साल की खूबसूरत छरहरे बदन वाली पतली-दुबली मॉडल। सिर्फ बिकनी में। यहां तक तो सब-कुछ मेरे मतलब का था। मगर उसके बाद जो कुछ देखा उसने होश गायब कर दिये।

अर्ध-नग्न मॉडल जी की बिकनी के निचले हिस्से (कमर पर) पर थी एक देवी की मूर्ति। उस देवी की मूर्ति, जिसके आगे हिंदू धर्म नत-मस्तक होता है। वो देवी, जिसके आगे सिर झुकाकर हम खुद को धन्य समझते हैं। वो देवी जो हमारी हर मनोकामना को पूरा करती है। वो देवी, जो हमारे सब कष्टों का हरण करती हैं । भौंड़ेपन और नंगई की सनक पर देवी मैय्या की श्रद्धा भारी पड़नी थी। सो पड़ गयी। न मॉडल काम आयी, और न उसकी नंगई।

कुछ लम्हे बाद दिमाग ठिकाने आया, तो फैशन-शो की नंगई से हटकर याद आयी हमें, हमारी अपनी 'शिव-सेना'। शिव-सेना- मतलब शंकर जी की सेना नहीं। मुंबई में अपने आलीशान महल के भीतर दबे-छिपे बैठे बाबा बाला साहब ठाकरे की शिव-सेना। जो लड़ती है धर्म की लड़ाई। जो उतार सकती है, किसी की भी खाल। बिना वक्त गंवाये। बस मौका और मुद्दा होना चाहिए पब्लिकसिटी का। धर्म के कथित ठेकेदार ठाकरे की सेना को बताओ भला इससे बेहतर चमकने और चमकाने का मौका कब मिलेगा?  कि विदेश की सर-जमीं पर आधी नंगी-मॉडल के शरीर पर मौजूद रुमालनुमा कपड़ों पर हमारी देवी-मैय्या की तस्वीर।

घोर कलियुग की मिसाल। अरे बाबा...नरक है ये तो। महा-पाप है ये तो। ऐसे में तो देश-धर्म की ठेकेदार शिवसेना भला कैसे चुप रहेगी। ऐसा प्रदर्शन करने वाली मॉडल के शरीर पर मौजूद नाम-मात्र के अंग-वस्त्रों को फाड़कर अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए शिव-सेना को। खून खौल उठना चाहिए- शिव-सेना के शंकर जी (बाला साहब ठाकरे) का। हमारी पूज्नीय देवी-मैय्या की ऐसी-तैसी करने वाली, ऐसी-वैसी मॉडल को सबक सिखाने के लिए शिवसेना के ठेकेदारों को उतर आना चाहिए मुंबई की सड़कों पर। तुरंत पहुंच जाना चाहिए था.. विरोध का गदर मचाने के लिए सिडनी के फैशन शो में रैंप पर।

लगता है मैं फालतू में ही ऐसा-वैसा लिखकर शिवसेना को धिक्कार या उकसा रहा हूं। अपनी स्व-संतुष्टि के लिए। जैसा मै सोच रहा हूं, वैसा होगा कुछ नहीं। शायद इसलिए कि ये सब नंगई हुई है, परदेस में। किसी और देश की सर-जमीं पर। और वहां शिव-सेना या ठाकरे खानदान खुद को बे-बस मानता है। मुंबई तो अपनी है। जो चाहे कर लो, भला किसी की मजाल जो हमारी नंगई के आड़े आ जाये। आस्ट्रेलिया में फंस गये, तो मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे। घर के बाहर की बात है। क्यों शिवसेना फटे में टांग अड़ाए। घर की बात होती तो सोचते। और आस्ट्रेलिया अगर विरोध जताने शिव-सैनिक चले भी गये, तो इसकी क्या गारंटी की वहां की (आस्ट्रेलिया) मीडिया, शिव-सैनिकों के नंगे नाच को, हम-वतन (भारतीय मीडिया) मीडिया की तरह की दिन-भर 'ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव'  का रट्टा देकर रोये-गायेगी।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन दिनों न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एडिटर (क्राइम)  के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. इनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it   के जरिए किया जा सकता है.


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