लेट्स फाइंड आउट ए न्यू एनेमी फॉर एमेरिका…!

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मुकेश कुमारराष्ट्रपति बराक ओबामा इस उम्मीद से खुश थे कि ओसामा बिन लादेन  को निपटाने के बाद उनकी रेटिंग में सुधार होगा और अगले चुनाव में वे पूरे हौसले के साथ उतर सकेंगे।  खुशी में वे बल्लियों उछल रहे थे और तमाम अफसरों को बुला-बुलाकर बातें कर रहे थे। मगर कुछ अफसरों से मिलने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि वे बहुत खुश नहीं हैं, जितना होना चाहिए बल्कि तनाव में दिख रहे हैं।

पहले उन्होंने सोचा कि हो न हो एक अश्वेत राष्ट्रपति की सफलता उनसे देखी नहीं जा रही है। आख़िर गोरे अफसर कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि जो काम एक गोरा राष्ट्रपति नहीं कर सका वह एक अश्वेत कर दिखाए। फिर उन्हें खयाल आया कि कहीं ये अफसर जार्ज बुश के आदमी तो नहीं हैं जो रिपब्लिकन को सत्ता में वापस लौटता देखना चाहते हैं और उनकी बढ़ती रेटिंग से टेंसन में आ गए हों। रात भर चिंतन-मनन के बाद उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने सीआईए के चीफ को बुलाकर पूछ ही लिया कि बात क्या है।

सीआईए चीफ ने स्पष्ट किया कि बात वो नहीं है जो वे समझ रहे हैं। सचाई ये है कि अमेरिकी प्रशासन ने भी लादेन की मौत से राहत की साँस ली है मगर हाँ वह तनाव में भी है और तनाव की वजह ये है कि अब वह एक नई चिंता और चुनौती में फँस गया है। चीफ ने चेहरे पर चिंता के भाव लाते हुए कहा....अमेरिकी प्रशासन की नई चिंता ये है कि अमेरिकी नीति के मुताबिक अमेरिका का कोई न कोई दुश्मन ज़रूर होना चाहिए ताकि अमेरिकी ताक़त का इज़हार होता रहे और दुनिया भूलने न पाए कि दुनिया की अकेली महाशक्ति कौन है। थोड़ा सा विराम लेने के बाद चीफ़ ने आगे कहा......अमेरिकी नीति ये कहती है कि यदि दुश्मन न हो तो उसे पैदा करो और फिर उससे दुश्मनी निकालो।

पहले सद्दाम हुसैन के साथ उसने यही किया था और उसके बाद लादेन का नंबर आया था। लादेन के शिकार के बहाने वह कभी अफगानिस्तान तो कभी पाकिस्तान में घुसकर हमले करके जताता रहता था कि इन मुल्कों को तो वह कुछ समझता ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय जनमत वगैरा को भी ठेंगे पर रखता है। लेकिन अब लादेन नहीं है और उसके बिना ये नई चुनौती आ खड़ी हुई है लादेन के बाद कौन....। अमेरिकी प्रशासन इसीलिए तनाव में है।

सीआईए चीफ की पूरी बात सुनने के बाद ओबामा ने गहरी साँस भरी और हूँ की आवाज़ के साथ सोफे में बैठ गए। लादेन की मौत से रेटिंग में होने वाले इज़ाफ़े की खुशी में वे अमेरिकी नीति को भूल ही गए थे। ये सही है कि वे युद्ध नहीं चाहते, अमन चाहते हैं, मगर देश किसी व्यक्ति की इच्छा से बड़ा होता है इसलिए उन्हें वही करना होगा जो राष्ट्रहित में है यानी नया दुश्मन तय करना होगा। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने तमाम सुरक्षा सलाहकारों को तलब करते हुए पेंटागन का रूख़ किया।

पेंटागन की बैठक में ओबामा ने कहा......लेट्स फाइंड आउट अ न्यू एनेमी फॉर एमेरिका....एंड वी कैन। उनके आत्मविश्वास से भरे इस आव्हान पर कई तरह की राय सामने आईँ। किसी ने कहा कि लीबिया के राष्ट्रपति कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को नया टारगेट बनाया जाए, क्योंकि सद्दाम हुसैन की तरह वह भी अमेरिका को आँखें दिखाते रहते हैं। मगर फिर सबने ये महसूस किया कि ये निशाना छोटा होगा। गद्दाफी पहले से ही घिरे हुए हैं और उनको मारने में जल्दबाज़ी की गई तो पाँसा उलटा भी पड़ सकता है।

एक बंदा लादेन के मारे जाने से कुछ  ज़्यादा ही उत्साहित था।  उसने सलाह दे डाली कि चीन ने बड़ी आफ़त मचा रखी है, वह अपनी मुद्रा से डॉलर का बैंड बजा रहा है और अमेरिकी मंडियों को सस्ते माल से पाट रहा है, इसलिए क्यों न अब उसी को घेरा जाए। मगर जल्द ही सबने इससे असहमति ज़ाहिर कर दी क्योंकि चीन से पंगा लेने का जोखिम लेने के हक़ में कोई भी नहीं था। एक ने कहा कि ईरान बहुत ढिठाई दिखा रहा है और परमाणु बम बनाने के आरोप में उस पर चढ़ाई की जा सकती है।

मगर ओबामा को लगा कि लादेन को मारने के बाद अगर ईरान को छेड़ा गया तो हो सकता है कि अमेरिका के ख़िलाफ़ मुसलमानों का गुस्सा और भी बढ़ जाए, लिहाज़ा बेहतर होगा कि अभी कोई और दुश्मन तलाशा जाए। इस पर एक विशेषज्ञ ने राय दी कि क्यों न कुछ समय के लिए मोर्चा लेटिन अमेरिका शिफ्ट कर दिया जाए क्योंकि यहां के एक दो मुल्क खासकर वेनेजुएला और ब्राज़ील कुछ ज़्यादा ही अमेरिका विरोधी रवैया अपनाए हुए हैं और उन्हें पाठ पढ़ाना ज़रूरी है। लेकिन ओबामा नहीं चाहते थे कि अमेरिका के ऐन पास कोई ऐसी बड़ी झंझट मोल ली जाए, जो चुनावी मौसम में भारी साबित हो। कुछ की राय उत्तरी कोरिया को सुधारने के पक्ष में थी, मगर फिर महसूस किया गया कि चीन इसे बर्दाश्त नहीं करेगा और लेने के देने पड़ सकते हैं।

कुल मिलाकर किसे नया दुश्मन बनाया  जाए इस सवाल को लेकर मीटिंग में गतिरोध पैदा हो गया। ओबामा  को लगा क्यों न इसमें  मीडिया की मदद ली जाए, क्योंकि  अंतत तो मीडिया की मदद से ही दुश्मन बनाया जाएगा और उसे मारकर वाहवाही लूटने के लिए भी मीडिया ही मददगार साबित होगा। लिहाज़ा उन्होंने सीएनएन के चैनल हेड को फोन लगा दिया। लगभग आधे घंटे तक ओबामा उससे बातें करते रहे और बैठक में मौजूद लोग उन्हें मुँह बाए देखते रहे।

बातचीत  ख़त्म करने के बाद ओबामा  ने ब्योरा देना शुरू किया- देखिए  सीएनएन के हेड का कहना है कि अमेरिका एक बड़ा मुल्क  है इसलिए उसका दुश्मन भी बड़ा होना चाहिए। दुश्मन बड़ा होगा तो उसे पकड़ने या मारने का ऑपरेशन भी उतना ही स्पेक्टेकुलर होगा और टीवी के लिए बड़ी घटना बनेगा। इसलिए हम छोटे-मोटे टारगेट के बारे में न ही सोचें तो ठीक होगा। दूसरे, अमेरिका और यूरोप को इस सबसे दूर रखना चाहिए ताकि इनकी तरक्की में कोई बाधा न पड़े। तीसरे, सबसे ज्यादा आर्थिक हलचलें एशिया में हैं और पेट्रोलियम रिच एरिया भी वहीं है इसलिए दुश्मन वहीं का हो तो बेहतर होगा। इससे एशियाई देश हड़केंगे और अमेरिकी कंपनियों को कारोबार फैलाने में मदद भी मिलेगी।

अब आप लोग इन गाइड लाइन पर काम कीजिए और हाँ अगर ज़रूरत हो तो जार्ज बुश से भी राय ली जा सकती है, क्योंकि उनको इसका अच्छा तज़ुर्बा है। उन्हें ऐसे कामों में विशेष आनंद भी आता है और वैसे भी राष्ट्रीय हित के मामलों में वे कभी पीछे नहीं रहते। लेकिन ध्यान रहे ये बात लीक नहीं होनी चाहिए, वर्ना रिपब्लिकन इसका श्रेय लेने लगेंगे। और हाँ, टाइम कम है। चुनाव को ध्यान में रखते हुए काम कीजिए ताकि सही समय पर दुश्मन को तलाश लिया जाए और हो सके तो उसको निपटाने का श्रेय भी लिया जा सके।

ओबामा इस बात को पचा गए कि उन्होंने सीएनएन के हेड को एक टीवी कांटेस्ट करवाने के लिए कहा  है जिसमें अमेरिका के दुश्मन नंबर एक का खेल खेला जाएगा  और जीतने वाले को एक करोड़  डॉलर इनाम में दिए जाएंगे।  उन्हें उम्मीद है कि इस प्रतियोगिता से उन्हें दुश्मन तय करने में मदद मिल सकती है और अमरीकियों में भी राष्ट्रभक्ति की भावना कायम रखी जा सकेगी। उन्हें लग रहा था कि दूसरे देश के न्यूज़ चैनल भी देखादेखी ऐसा प्रोग्राम करेंगे और वहाँ की अवाम पैसा जीतने के लिए पागल होकर दौड़ पड़ेगी। इससे अंतत अमेरिका का ही फ़ायदा होगा, क्योंकि पूरी दुनिया में जंग का माहौल बनेगा और उसके हथियारों की माँग बढेगी।

इतना कहकर ओबामा ने मीटिंग ख़त्म  की और हिलेरी क्लिंटन को बुलाकर ब्रीफ किया कि वे फौरन नाटो देशों के नेताओं को इस बारे में सूचित कर दें। इसके बाद उन्होंने अपने सेक्रेटरी  से अपनी ताज़ रेटिंग पता करने को कहा और फिर पत्नी तथा  बेटी के साथ छुट्टी मनाने  निकल गए।

वैधानिक चेतावनी- इस व्यंग्य कथा के काल पात्र और स्थान सभी काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक हैं। सुधी पाठक जानते ही हैं कि इस घोर टीवी-युग में सचाई और कल्पनाएं गड्डमड्ड हो गई हैं। ऐसे में इस काल्पनिक व्यंग्य-कथा का रसास्वादन सत्यकथा की तरह करना ही समयोचित एवं जनहितकारी होगा। धन्यवाद।

लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'न्यूज एक्सप्रेस' के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.


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