अन्‍ना के यूपी आने की खबर मात्र ने ही माया सरकार की रातों की नींद उड़ा रखी थी

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डा. आशीष गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने देश की भ्रष्ट व्यवस्था और भ्रष्टाचारियों के विरूद्व जन आंदोलन चलाकर बरसों से सो रही देश की जनता को जगाने का महान काम किया है। अन्ना ने देश में भ्रष्टाचार के विरुद्व एक माहौल तैयार करने में अग्रणी भूमिका तो निभाई ही है, वहीं जन लोकपाल बिल के मसौदे पर सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल करवा कर सरकार को ये अहसास करा दिया कि अब उसकी मनमानी के दिन लद चुके हैं और जनहित से जुड़े मुद्दों पर जनता की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए और सरकारी काम-काज में पारदर्शिता बरतनी चाहिए।

आज अन्ना एक ब्रांड बन चुके हैं और देश की जनता उन्हें भ्रष्टाचार के विरूद्व लड़ने वाला मसीहा समझती है। अन्ना के अनशन ने जनता के मन में एक नया विश्‍वास और जोश पैदा करने के साथ असंगठित जनता को एक मंच और बैनर तले एकत्र करने का सराहनीय प्रयास किया है। गांधीवादी अन्ना देश की जनता को ये अहसास कराने में कामयाब रहे कि अहिसंक तरीके से भी दिल्ली के तख्त को हिलाया जा सकता है। लोकपाल बिल पर देश भर से समर्थन जुटाने के उद्देश्‍य से अन्ना और उनकी टीम को 29, 30 अप्रैल एवं 1 मई को क्रमश: वाराणसी, सुलतानपुर व राजधानी लखनऊ में विशाल रैलियां करनी थी, लेकिन कार्यक्रम के ऐन वक्त पर खराब स्वास्थ्य के कारण अन्ना यूपी की रैलियों में शिरकत नहीं कर पाए। अन्ना की टीम के सदस्यों स्वामी अग्निवेश, अरविंद केजरीवाल और जसपाल भट्टी ने रैलियों में भाग लिया लेकिन जनता के मन में अन्ना से मिलने, उन्हें देखने और सुनने की जो ललक थी वो उनके टीम सदस्यों के प्रति दिखाई नहीं दी। अन्ना का यूपी दौरा रद्द होने से प्रदेश की जनता को मायूसी तो हुई ही वहीं अन्ना का यूपी में न आना अपने पीछे कई अनुतरित सवाल भी छोड़ गया।

तमाम सवालों में से जो सवाल सबसे अहम है वो यह है कि अन्ना के यूपी न आने के पीछे कोई राजनीतिक दबाव या सियासी खेल तो नहीं है। मेरे अलावा ये सवाल प्रदेश की जनता, बुद्विजीवियों और युवाओं के मन में उमड़-घुमड़ रहा है कि हो न हो किसी पॉलिटिकल प्रेशर की वजह से ही सोच विचार कर अन्ना का यूपी दौरा रद्द हुआ है। मेरा या प्रदेश की जनता का संदेह कहां तक सही है ये तो स्वयं अन्ना या उनकी टीम मेम्बर जानते हैं क्यों कि जब अन्ना विमान से पुणे से दिल्ली लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी की मीटिंग में भाग लेने के लिए सकते थे, वो पुणे से वाराणसी या सुलतानपुर न ही सही राजधानी लखनऊ तो पहुंच ही सकते थे। वहीं जब आयोजकों को अन्ना के खराब स्वास्थ्य की खबर थी और वो यूपी आने में असमर्थ थे तो आयोजकों को वीडियों कांफ्रेसिंग का इंतजाम तो करना ही चाहिए था। वाराणसी और सुलतानपुर की रैलियों को अन्ना ने फोन से संबोधित किया लेकिन लखनऊ की रैली के लिए फोन से संबोधन का इंतजाम आयोजक नहीं करवा पाये। बहाने या कारण कोई भी गिनाएं जाएं,  लेकिन अन्ना का यूपी न आना और लखनऊ की जनसभा का फोन द्वारा संबोधित न करना अन्ना और उनकी टीम को संदेह के कटघरे में तो खड़ा करता ही है, वहीं इसके पीछे छिपी किसी सियासत से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

दरअसल जनलोकपाल बिल के लिए देश भर से समर्थन जुटाने के लिए अन्ना ने देश भर में दौरे करने का कार्यक्रम है। इसी कड़ी में सर्वप्रथम अन्ना और उनकी टीम ने उत्तर प्रदेश में आना था। तय कार्यक्रम के अनुसार 29, 30 अप्रैल और 1 मई को क्रमश:  वाराणसी, सुलतानपुर और राजधानी लखनऊ में इंडिया अंगेस्ट करप्शन की रैलियों का आयोजन किया गया था। लेकिन अस्वस्थता के चलते अन्ना तीनों रैलियों में भाग नहीं ले पाए। अन्ना के टीम के सदस्यों स्वामी अग्निवेश, अरविंद केजरीवाल और जसपाल भट्टी ने रैलियों में हिस्सा लिया और प्रदेश की जनता को भ्रष्टाचार के विरूद्व लड़ने एवं जनलोकपाल बिल के लिए समर्थन जुटाने का काम बखूबी किया। अन्ना ने वाराणसी के कंटिग मेमोरियल कालेज और सुलतान के तिकोनिया पार्क में आयोजित सभाओं को टेलीफोन के माध्यम से संबोधित कर देश की जनता खासकर युवाओं को भ्रष्टाचार के विरूद्व जारी संघर्ष में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया, लेकिन राजधानी लखनऊ की रैली को अन्ना ने फोन से संबोधित नहीं किया।

अन्ना की टीम सदस्यों के अनुसार अन्ना को 2 मई को ड्राफ्टिंग कमेटी की दूसरी बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुंचना था, इसलिए विमान में होने के कारण अन्ना मीटिंग को फोन से संबोधित नहीं कर सके। जब अन्ना और उनकी टीम देश भर में घूम-घूमकर जन समर्थन जुटाने में लगी हुई है, तो फिर ऐसा कार्यक्रम ही तय क्यों किया गया, जिसमें नेता सुनने आई जनता को भाषण ही न सुना पाएं। इनफार्मेशन टेक्नालजी के युग में जनता से रूबरू होने के लिए वीडियो कांफ्रेसिंग से बेहतर विकल्प भला और क्या हो सकता था, लेकिन वाराणसी, सुलतानपुर और लखनऊ की व्यवस्था से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आयोजक खानापूर्ति में लगे हैं। जिस तरह से सरकार और नेताओं के खिलाफ देश भर में अन्ना ने माहौल बना दिया है, उससे नेताओं और राजनीतिक दलों के हाथ-पांव फूले हुए हैं। ऐसे में अंदर ही अंदर यूपी ही क्या कोई भी प्रदेश सरकार ये नहीं चाहेगी कि अन्ना उनके राज्य में आकर भ्रष्टाचार के विरूद्व जनजागरण का अलख जगाए। ऐसे में अन्ना का यूपी दौरा रद्द होने के पीछे कोई सियासत या राजनीतिक दबाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। वहीं अन्ना के कार्यक्रमों की वीडियो कांफ्रेसिंग न होना, लखनऊ की सभा को अन्ना द्वारा फोन से संबोधित न करना, ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों का लखनऊ राजभवन में टी-पार्टी में शामिल होना आदि वो अहम संकेत हैं जो अन्ना के न आने के पीछे किसी सियासत की ओर इशारा करते हैं।

अन्ना के यूपी आने की खबर मात्र ने ही माया सरकार की रातों की नींद उड़ा रखी थी। माया अपनी सरकार के मंत्रियों, विधायकों और अफसरों की कारस्तानियों और कारनामों से अनजान नहीं हैं। विपक्ष वैसे भी लगातार माया सरकार पर भ्रष्टाचार और सरकारी खजाने में खुली लूट का आरोप लगा रहा है ऐसे में अन्ना का यूपी दौरा आग में घी डालने का काम ही करता। यूपी सरकार शुरू से ही अंदर ही अंदर अन्ना की रैलियों को फ्लाप करने में लगी थी। सुल्‍तानपुर में स्थल खुर्शीद बाग में जनसभा का होना तय हुआ था। क्लब से कार्यक्रम की अनुमति भी मिल चुकी थी किंतु बाद में अनुमति निरस्त कर दी गई। खुर्शीद बाग में कार्यक्रम निरस्त होने के बाद स्थानीय आयोजकों ने सभा स्थल के लिए तिकोनिया पार्क का चयन किया। कार्यक्रम की अनुमति के लिए जिले के जिम्मेदार प्रशासानिक अफसरों का पत्र भी भेजा। लेकिन रैली के दो दिन पहले तक रैली स्थल को लेकर असंमजस की स्थित बनी रही और आयोजक रैली के प्रचार प्रसार की जगह जनसभा के लिए तीसरे स्थल को खोज में परेशान रहे।

कमोवेश यही हालत लखनऊ की भी थी। पहले रैली चौक स्थित ज्योतिबा फूले पार्क का चयन किया गया था, लेकिन प्रशासन ने यह कहकर पार्क साइज में छोटा है और इसमें ज्यादा भीड़ एकत्र नहीं हो सकती है, का बहाना बनाकर अनुमति देने में आनाकानी की। बाद में झूलेलाल पार्क को जनसभा के लिए चयनित किया गया और अन्ना के न आने की स्थिति में आनन-फानन प्रशासन ने खुशी-खुशी अनुमति भी प्रदान कर दी। ऐसा नहीं है कि लखनऊ में अन्ना के कार्यक्रम और रैली स्थल को लेकर कोई राजनीति नहीं हुई बल्कि लखनऊ विश्‍वविद्यालय के कुलपति ने लखनऊ विश्‍वविद्यालय शिक्षक संघ द्वारा अन्ना और उनकी टीम के आयोजित कार्यक्रम की अनुमति तो रद्द की ही, वहीं अन्ना और उनके सहयोगियों के लिए विश्‍वविद्यालय के गेस्ट हाउस में रूकने के लिए नो एंट्री का बोर्ड भी टांग कर अखबार की सुर्खियों में जगह बनाई। लखनऊ विश्‍वविद्यालय शिक्षक संघ (लुआक्टा) ने कुलपति के इस कदम पर खूब हो हल्ला मचाया,  लेकिन कुलपति और विश्‍वविद्यालय प्रशासन ने उलूल-जलूल बहाने बनाकर अन्ना के लिए विश्‍वविद्यालय के दरवाजे बंद कर दिए। वहीं एक कदम आगे बढ़ते हुए यूपी सरकार ने 27 अप्रैल की रात को ही प्रदेश में धरना, प्रदर्शन, रैली और आंदोलन करने के लिए लंबा चौड़ा शासनादेश तत्काल प्रभाव से लागू कर अपने इरादे जता दिए कि वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कितनी गंभीर है।

ऐसा नहीं है कि अपने गावं में बैठे अन्ना को यूपी की सियासत की पल-पल की खबर न हो। वहीं यूपी में वाराणसी, लखनऊ के साथ सुलतानपुर के चयन पर भी सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म था कि कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले सुलतानपुर में अन्ना की रैली का आखिरकर कोई पॉलिटिकल एजेंडा तो नहीं है। पत्रकारों ने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए स्थानीय समन्वयक आरके अग्रवाल से पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसे सवाल और चर्चाएं 'बिटविन दि लाइंस' के बीच कुछ चटपटा ढूंढने वालों के दिमाग की उपज हैं। अन्ना की रैली का कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है। बताते चले कि कांग्रेस महासचिव और अपने उल्‍टे-सीधे बयानों के लिए मशहूर दिग्विजय सिंह ने अन्ना और उनकी टीम को जब वो दिल्ली में जंतर-मंतर पर बैठकर केन्द्र सरकार को भ्रष्टाचार के मसले पर घेरे हुए थे तो दिग्विजय सिंह ने अन्ना को चैलेंज किया था कि अगर अन्ना में दम है तो वो अपनी टीम के साथ यूपी जाकर दिखाएं,  इस नाते इन रैलियों को एक चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा था।

इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है, दिल्ली के तख्त का रास्ता यूपी से ही होकर निकलता है, जिस राज्य ने अब तक सबसे अधिक प्रधानमंत्री देश को दिए हों, जहां से देश की राजनीति दशा और दिशा तय करती हो, जिस राज्य से सबसे अधिक सांसद चुने जाते हों और जहां कदम-कदम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला हों, वहां अन्ना जैसी शख्सियत की रैलियां सरकार को आसानी से कहां पच पाती। अगर अन्ना यूपी में आते तो यूपी सरकार के साथ ही साथ कांग्रेस अध्यक्ष और रायबरेली की सांसद सोनिया गांधी और कांग्रेस के युवराज और अमेठी के सांसद राहुल गांधी की भी जो छीछालेदार होती वो कांग्रेस और बसपा का चुनावी बेला में अच्छा खासा खेल बिगाड़ कर रख देती। ऐसे में किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्ना के न आने के पीछे कोई राजनीतिक दबाव या कारण रहा हो।

ऐसे माहौल में अगर अन्ना यूपी में आते तो सियासी रंग और सियासत कई रंग दिखाती लेकिन जैसे ही सरकार और प्रशासन को अन्ना के खराब तबीयत और यूपी का दौरा रद्द होने का पुख्ता समाचार मिला, वैसे ही आनन-फानन में प्रशासन ने वाराणसी, सुलतानपुर और लखनऊ में होने वाली जनसभाओं की अनुमति हंसते-हंसते दे दी और प्रशासनिक अमला स्वयं हर तरह की देखभाल और आदर सत्कार में लग गया। वहीं राज्यपाल और लखनऊ विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति बीएल जोषी ने भी लखनऊ विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज मिश्र को विश्‍वविद्यालय में अन्ना के लिए आयोजित कार्यक्रम रद्द करने के लिए तगड़ी डांट पिलाई। डैमेज कंट्रोल में यूपी सरकार के साथ ही साथ राजभवन भी जुटा था। डैमेज कंट्रोल की कड़ी में ही लखनऊ विश्‍व विद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज मिश्र ने भी अन्ना के टीम के सदस्यों का विश्‍वविद्यालय गेट के बाहर स्वागत किया और राज्यपाल ने अन्ना के टीम के सदस्यों को राजभवन में टी पार्टी के लिए आमंत्रित किया था। असलियत में अन्ना के न आने की खबर ने सरकारी चम्मचों और पालतू अफसरों के हौंसले बढ़ा दिए थे, और अपने राजनीतिक आकाओं का इशारा मिलते ही वो अन्ना की टीम के आगे-पीछे दुम हिलाकर भ्रष्टाचार की लड़ाई में उनके साथी बनने का नाटक करने में मशगूल रहे।

प्रशासन और स्थानीय आयोजकों को उम्मीद थी कि राजधानी और राजनीतिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र होने के नाते लखनऊ की रैली में अच्छी खासी भीड़ जुटेगी। लेकिन लखनऊ की रैली का रंग सबसे फीका साबित हुआ। डेढ घंटा देर से शुरू होने वाली जनसभा में अन्ना की आवाज सुनने के लिए लोग रात साढ़े आठ बजे तक बैठे रहे। अन्ना की फोन कॉल में देरी के साथ लोगों की मायूसी बढ़ती गई। मंच पर बैठे लोगों को जब पता चला कि अन्ना की आवाज सुनने को नहीं मिलेगी तो वहीं से विवादों के सुर सुनाई देने लगे। अरविंद केजरीवाल सहित स्थानीय नेतृत्व को सुनने के बाद मायूसी को विवाद के स्वर लखनऊ विश्‍वविद्यालय शिक्षक संघ के महामंत्री डॉ. आरबी सिंह ने दिए। उन्होंने सलाह दी कि भ्रष्टचार के खिलाफ मुहिम चला रहे शीर्ष नेतृत्व को राजकीय आतिथ्य से बचना चाहिए था। राज्यपाल की चाय पीने के बजाय उन्हें सुनने आए लोगों के बीच आना चाहिए था। अचानक उठे इस मुद्दे से मंच पर सन्नाटा छा गया। डॉ. सिंह के विचारों से आहत स्वामी अग्निवेश ने सफाई दी-राज्यपाल मेरे पुराने मित्र हैं। एक दिन पहले ही उन्होंने साथ चाय पीने की इच्छा जाहिर की थी। अगर गलती हुई तो मैं माफी मांगता हूं। इसके बाद उन्होंने बिना दूसरी बात कहे सूचना दी कि विमान लेट होने के कारण अन्ना पुणे से दिल्ली नहीं पहुंचे हैं। रास्ते में होने के कारण वह फोन से भी जनसभा को संबोधित नहीं कर पाएंगे।

जब अन्ना की टीम के अन्य सहयोगी जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो लोगों के जहन में एक ही सवाल था, अन्ना का फोन कब आएगा?  मंच से स्पष्ट नहीं किया जा रहा था। लोग बेसब्र हो रहे थे। कोई पूछ रहा था कॉल प्री रिकॉर्डेड है या सीधे आएगी तो कुछ कयास लगाने लगे कि ऐसा जान-बूझकर किया जा रहा है कि लोग बैठे रहें। सबका अनुमान था कि अन्ना को सुनने के बाद लोग जनसभा से चले जाएंगे। दरअसल लखनऊ में रैली का निर्धारित समय 5 बजे था, लेकिन बाद में पता चला कि यूपी के गर्वनर बीएल जोशी ने अन्ना की टीम के सदस्यों का टी पार्टी के लिए राजभवन आमंत्रित किया है,  इसलिए रैली का समय एक घंटा लेट अर्थात सायं 6 बजे कर दिया गया। और रैली शुरू होते-होते डेढ़ घंटे की देरी हो चुकी थी। यहां मुद्दा राजभवन जाने या टी पार्टी में शामिल होने का नहीं है,  असल बात तो यह है कि जब कोई टीम जनसमर्थन जुटाने के लिए निकली हो तो ऐसे वक्त में लाट साहब की चाय पार्टी का लुत्फ उठाना क्या इशारा करता है। मौका और नजाकत देखकर ही सारे काम किये जाते हैं। अन्ना के न आने की खबर के कारण वैसे ही प्रदेश की जनता में मायूसी छायी हुई थी, ऐसे में अन्ना के टीम के सदस्यों को सुनने के लिए जो थोड़ी-बहुत भीड़ जुटी भी थी उसे भी डेढ़ घंटा केवल इसलिए इंतजार करना पड़ा, क्योंकि ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य लाट साहब की टी-पार्टी में मशगूल थे। स्थानीय आयोजक के बड़े-बड़े दावों और प्रशासन की गिनती के उलट रैली में सात-आठ सौ की भीड़ ही बामुश्‍किल इकट्ठी हो पाई। इस संख्या में मीडियाकर्मियों और पुलिस-प्रशासन की अच्छी खासी तादाद भी शामिल थी।

असलियत यह है कि अन्ना के यूपी आने की खबर मात्र से ही यूपी की सरकार के हाथ पांव फूल गए थे। भ्रष्टाचार में गले तक डूबी माया सरकार को खतरा था कि अन्ना के आने से प्रदेश सरकार की फजीहत तो होगी ही, वहीं विपक्षी दलों को भी बैठे-ठाले सरकार को घेरने का मुद्दा मिल जाएगा। 29 अप्रैल को वाराणसी से रैलियों का शुभारंभ होना था, अन्ना के आने की धमक से घबराई यूपी सरकार ने आनन-फानन में धरना-प्रदर्शन नियमावली का तत्काल प्रभाव से लागू कर अन्ना के कार्यक्रम में विघ्न डालने का प्रयास किया, लेकिन अन्ना के न आने की खबर के आते ही यूपी सरकार की सांस में आई और वाहवाही लूटने के लिए तुरत-फुरत कार्यक्रमों की अनुमति दे डाली। यूपी सरकार की घबराहट से ये साफतौर पर जाहिर था कि यूपी में अन्ना के आने से प्रदेश सरकार की छीछालेदार होने से कोई बचा नहीं पाएगा। ऐसे वक्त में जब प्रदेश सरकार विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी हो और निकाय चुनाव सिर पर खड़े हों,  सरकार का चिंतित होना लाजिमी है। मायावती का इस समय सारा ध्यान विधानसभा चुनावों में लगा हुआ है और वो ये कभी नहीं चाहती हैं कि कोई उनके बने-बनाए खेल का खराब कर दे। ये बात तो पक्की है कि अगर अन्ना यूपी के दौरे पर आते तो प्रदेश सरकार के दामन पर कीचड़ जरूर उछलता। बसपा सरकार के साथ ही साथ सुल्‍तानपुर में अन्ना की रैली के मद्देनजर सियासी गलियारों में सप्रंग की चेयरपर्सन और रायबरेली की सांसद सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव और अमेठी के सांसद राहुल गांधी को भी घेरने की बातें की जा रही थी। ऐसे में अन्ना के आने से प्रदेश सरकार के साथ ही साथ सप्रंग की मुखिया सोनिया गांधी और कांग्रेस युवराज भी अन्ना की मुहिम की आंच से न बच पाते। वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का अन्ना और उनकी टीम के प्रति नरम रूख भी कोई राजनीतिक इशारा करता है।

अन्ना और उनकी टीम के सदस्यों की नीयत और नीति पर मेरे साथ देश की पूरी जनता को भरोसा है। लेकिन जिस तरह का माहौल एकाएक भ्रष्टाचार और कांग्रेस नीत सरकार के खिलाफ पूरे देश में बना है वो शायद आजादी की लड़ाई के बाद एक बड़ा आंदोलन है, जिसमें पूरे देश की जनता सड़कों पर उतर आई। अन्ना को मिले जनसमर्थन से घबराई केंद्र सरकार ने ड्राफ्टिंग कमेटी में सिविल सोसायटी के सदस्यों को शामिल तो कर लिया लेकिन सिविल सोसायटी के सदस्यों पर लगातार जारी राजनीतिक दलों और नेताओं के हमलों से ये बात साफ हो जाती है कि सिविल सोसायटी का प्रतिनिधित्व किसी भी राजनीतिक दल को पसंद नहीं हैं। दिखावे के लिए लगभग सभी राजनीतिक दल अन्ना के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन हमाम में सभी नंगे हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है। और राजनीतिक दल और नेता अपनी बची-खुची इज्जत को बचाने के लिए कोई भी ओछी हरकत को अंजाम दे सकते हैं। आज पूरे देश की जनता अन्ना और उनकी टीम की ओर बड़ी आशा और उम्मीद की नजर से देख रही है, ऐसे में अन्ना और उनकी टीम को इन चालबाज, दगाबाज, भ्रष्ट और मौकापरस्त तथाकथित नेताओं से बचना होगा और फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।

ऐसे वातावरण में जहां कदम-कदम पर कुछ भी हो जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता हो, वहां यूपी जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश में जहां से देश की संसद के लिए सबसे अधिक सांसद चुन कर जाते हों, वहां अन्ना का केवल स्वास्थ्य कारणों से न आना प्रदेश के आम आदमी के जहन में ये प्रश्‍न जरूर उठाता है कि सीधे-सादे अन्ना को षडयंत्रकारी नेताओं ने कहीं दबाव बनाकर यूपी आने से रोका तो नहीं था। क्योंकि जब अन्ना जहाज से दिल्ली जा सकते थे तो वो लखनऊ भी आ सकते थे। कारण चाहे जो भी रहा लेकिन अन्ना के न आने से जहां भ्रष्ट नेताओं को बल मिला वहीं आम आदमी की आषाओं को झटका लगा है। अन्ना और उनकी टीम की नीयत पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे कोई शक नहीं है और भ्रष्टाचार के इस बड़ी लड़ाई में मैं भी एक अदने से सिपाही की तरह शामिल हूं, लेकिन जिस तरह से अन्ना और उनकी टीम को घेरने की कोशिश राजनीतिक दल और नेता कर रहे हैं ऐसे में किसी भी षडयंत्र या सियासत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। अन्ना के यूपी न आने के कारण प्रदेश की जनता को काफी मायूसी हुई। बरसों से भ्रष्टाचार की चक्की में पिस रही देश की जनता को अन्ना और उनकी टीम से बहुत उम्मीदें हैं। आशा है अन्ना भ्रष्ट, मौकापरस्त, चालबाज, और नैतिकता को त्याग चुके तथाकथित नेताओं के फेर और जाल में न फंसकर देश को भ्रष्टाचार के दानव से मुक्ति दिलाएंगे।

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार तथा लखनऊ के निवासी हैं.


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