आईआईएमसी आने का जुगाड़

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अमितमैं एटीएम में था। देखा अकाउंट में पैसे नहीं आए थे। महीने का आखिरी समय था, पैसों की कड़की थी। घरवालों को पैसे भेजने को कहा था पर अकाउंट में पैसे नहीं थे। एटीएम से बाहर आने पर एक व्यक्ति मेरे पास आया और कहने लगा- 'सर आपको पेनड्राइव लेना है क्या? मेरे पास 32 जीबी की नई पेनड्राइव है। आपको बाजार से बहुत कम दाम में दे दूंगा।' मेरा तो वैसे ही दिमाग का दही था।

2 दिन बाद 23 जून आईआईएमसी में एडमिशन के लिए इंटरव्यू में जाना था और पास में पैसे नहीं थे। जले पे नमक छिड़कने ये पेनड्राइव बेचने आ गया है। इस पेनड्राइव बेचने वाले ने पुराने जख्म को भी हरा कर दिया। ये पेनड्राइव नकली तो होते ही हैं, काम भी नहीं करते हैं। खरीदने के बाद ये कचरा बन जाते हैं। करीब एक साल पहले ऐसे ही एक ने मुझे नकली पेनड्राइव बेच कर ठग लिया था। हजार रुपए का वो पुराना जख्म हरा हो गया। और ज्यादा दिमाग खराब हो गया। मैंने इस पेनड्राइव वाले से अपना पुराना हिसाब बराबर करने का सोचा। कुछ ही देर पहले उसने एक लड़के को ठगा था। मेरे अंदर की पत्रकारिता हरकत में आई। मैंने अपने एक साथी को वहां उसके साथ छोड़ दिया और उससे कहा कि मैं घर से पैसे लेकर आ रहा हूं।

अपन को थाने जाने में हिचक वगैरह तो होती नहीं है। स्कूल के समय में पत्रकारिता करते हुए पुलिस थाने ही अपने प्राइमरी न्यूज सोर्स होते थे। मैं सीधे पुलिस थाने पहुंचा। वहां के थाना प्रभारी से कहा- मैं पत्रिका न्यूज़ पेपर से हूं। वहां चौराहे पर एटीएम के पास एक व्यक्ति नकली पेनड्राइव बेच रहा है। चल कर कार्रवाई कीजिए। बिना वर्दी के दो पुलिस वालों को साथ में लेकर वहां पहुंच गया। पुलिस ने इसे रंगे हाथों पकड़ा। पुलिस के पूछने पर उसने कहा- 'साहब एक ही पीस था।' उसकी तलाशी लेने पर उसके पास कई पेनड्राइव बरामद हु्ई। पुलिस उसे थाने ले गई। मैंने थाना प्रभारी को कहा- सर इसे छोड़ना मत, इसकी खबर बनेगी। मैं फील्ड में अपनी रिपोर्टिंग करने चला गया।

शाम को जब रूम पहुंचा तो याद आया थाना जाना था। थाना पहुंचा तो पुलिस उससे पूछताछ करने लगी। आरोपी ने बताया वो हरियाणा के किसी गांव से है। दिल्ली से नकली पेनड्राइव 125 रुपए में खरीद कर। सड़क पर घूमकर ग्राहकों को मनचाहे दामों पर बेच देता था...। वो मेरे सामने माफी मांगने लगा। मैंने कहा मुझसे तो माफी मांग लेगा। उससे माफी कौन मांगेगा जिसे तूने सुबह ये बेच कर ठगा है।

मेरे दिमाग में आईआईएमसी जाने के लिए पैसों की चिंता थी ही। मैंने सोचा और कहा मैं तुझे छुड़वा देता हूं। पास में पैसे कितने है? उसने पैसे निकाले और मेरे हाथ में दे दिए। मैंने पैसे अपने जेब में रख लिए। उससे कहा- यहां तेरे कोई जान-पहचान के कोई होंगे ना, उनको फोन करके पैसे लेकर बुला ले। मैं थाना प्रभारी के पास पहुंचा और कहा- 'सर उसको छोड़ दो, रोना-गाना कर रहा है। बाहर का भी है उसे छुड़वाने कौन आएगा।' थाना प्रभारी ने सिपाही को आवाज लगाई। वो सुबह के पेनड्राइव वाले को छोड़ दो।

आरोपी बाहर आ गया। उसके पिताजी वहां पहुंच गए, मैंने उनसे दो सौ रुपए लिए। थाना प्रभारी के पास धीरे से गया और उन्हें दो सौ रूपए दे दिए। थाना प्रभारी ने छुपा के ले लिए। मैंने आरोपी को समझाइस देकर जाने को कह दिया। इस तरह मैंने आईआईएमसी आने के लिए पैसों का जुगा़ड़ किया। अगले दिन ट्रेन की टिकट कटवाई और दिल्ली पहुंच गया। मुझे नहीं लगता है मैंने कुछ गलत किया। मैंने एक ठग से हिसाब बराबर किया। मुझे एक ठग ने ठगा था, मैंने ठग को ही ठगा। इसमें गलत क्या किया। कभी-कभी हमारे कुछ काम बिना जुगाड़ के पूरे नहीं होते ना!

लेखक अमित पाठे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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Comments (16)Add Comment
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written by अमित पाठे, June 29, 2011
ये आर्टिकल मेरे ब्लॉग से उठाया गया है. मैंने कह दिया और सबको बताया. ये अच्छे है. बाकी सारी बातें बेकार की 'भड़ास' है. फिर भी कमेंट्स के लिए थैंक्स. पर इन कमेंट्स के सन्दर्भ में खुद में भी झाँक ले.
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written by ziaur rahman Aligarh, May 11, 2011
amit g . aap thagi ka dhandha achha karoge.
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written by anilsingh, May 11, 2011
ptrakarita jagat pahle hi aap jaise patrkarona se bhara pada hai. chalo desh ki janata aapko bhi bardast kar legi.
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written by ऋषभ, May 11, 2011
अरे कहीं आपको आई आई एम सी में एडमिशन मिल तो नहीं गया. आप जैसे "प्रतिभाशाली" पहले ही पत्रकारिता को बदनाम कर रहे है. हाँ... आप उनसे अलग हैं क्योंकि आप चोरी और सीनाज़ोरी को चरितार्थ कर रहे हैं. पत्रिका तो सम्मानित अखबार है. उसमें आप जैसे चिरकुटों की भर्ती भी होती है या खुद को पत्रकार साबित करने के लिए ज़बरिया उसका नाम जोड़ लिया है अपने साथ. धन्य हैं आप... वैसे पत्रकारिता मत कीजिये... दलालों के लिए तो और भी पेशे हैं.
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written by sapna, May 11, 2011
स्वागत है आप का अमित जी इस क्षेत्र में...आप तो गज़ब के पत्रकार है ,जो बड़ी ही शान से अपने इस घटिया पने को बता रहे है .....भाई साहब सुधर जाओ ...वरना बरखा दत्त बन जाओगे ....आप अभी उम्र में छोटे है इसलिए आपको बता रहा हूँ ...यह पत्रकारिता का ओछा पन है दोस्त...जिसे आपने अभी से अपना लिया है
वैसे ही इस फिल्ड में बहुत कूड़ा है दोस्त ...और तुम ?????
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written by राजीव, May 10, 2011
अमित जी,

जो आपने किया, उसके बारे में आपके मन में कहीं न कहीं अपराध भावना थी। चुंकि आपकी उम्र अभी छोटी है, इसलिए जब भी आप कुछ ऐसा करेंगे जिससे आपके अन्दर का इँसान आहत होगा तो आपके अन्दर ये सवाल उठेगा कि ये काम गलत था या सही।

धीरे-धीरे आप भी अपने इन कामों को सही ठहराने के लिए तर्क गढ़ना शुरु कर देंगे। जैसे, सारी दुनिया धोखेबाज है तो फिर धोखेबाज को धोखा देने में क्या बुराई है। और, आप पाएंगे कि आप भी दुनिया में उन लोगों की तरह हो गए जिसे दुनिया ने बुरा बना डाला।

अमित जी, दुनिया एक ऐसी अमानवीय मशीन है, जो लोगों की इंसानियत को धीरे-धीरे मारकर उसे बुरा बना देती है। दुनिया में शक्ति, पैसा और फरेब का खेल चलता है। एक इंसान अनेक मुखौटे लगाए रहता है। लेकिन, असली मुखौटा इतना गंदा होता है कि इंसान उसे ना देखने के लिए उपर से अच्छाई के कई मुखौटे ओढ़ता है।

आपने एक कमजोर के साथ ऐसा व्यवहार किया है। ऐसा व्यवहार किसी ताकतवर के साथ करने का साहस आप कभी न कर पाएंगे। आप कमजोर कड़ी पर वार कर खुद अपनी वाह-वाही कर रहे है। और, तुरंत आपने अपने लिए एक मुखौटा बना लिया।

अभी तो आपके आई आई एम सी में इँटरव्यू देने के लिए पैसे के लाले पड़े हैं। आई आई एम सी से पढने के बाद जब मीडिया में जाएंगे तो हो सकता है कि वहां खाने के भी लाले पड़े, लेकिन मीडिया में आपको पेनड्राइव बेचने वाले जैसा कमजोर नहीं मिलेगा। यहां तो ऐसे-ऐसे लोग पड़े हैं जो देखने में शाकाहारी नजर आएंगे, लेकिन मौका मिलते ही वो आपकी बोटी-बोटी नोंच लेंगे।

आपके अच्छे भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।
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written by ajai, May 10, 2011
Bahut acche beta tum IIMC ke bilkul layak ho. wahan yahi kam bade paimane par sikhaya jata hai
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written by NaamGum Naam Hain, May 10, 2011
Lagata Hain Patrkarita me aane se pahale hi chamgunge ho gaye ho... abhi to bahut papad belane padenge IIMC admission se kuch nahi hone wala hain dear.
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written by chakresh , May 10, 2011
kya aap jaise log hi des badlenge???????????
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written by mahesh, May 10, 2011
आगे भी बहुत ठग मिलेंगे उन्हें भी ठग लेना कुछ पुलिस को देना और कुछ अपने जेब में रखना ! शायद यही है नई पत्रकारिता
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written by mahesh, May 10, 2011
tumne usse hisab barabar kiya ab woh kisi aur se kargega chutiye, Patrkar bante ho, mujhe lagta hai zindagi mein tumne pehali dalali khayi hai. iska additction mat palna nahi to barbadi jayda dur nahi hai tumse.
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written by Harishankar Shahi, May 10, 2011
आपका स्वागत है पत्रकारिता में आप इस समय के घूस कांड में छाए बड़े पत्रकारों के नामो की नई पीढ़ी बनके उभरेंगे. वसूली ही पत्रकारिता का लक्ष्य बनकर रह गयी है. इसके बावजूद आपने सत्य को खुलकर कहा यह भी एक अच्छी बात है यानी कम से कम आप पकडे जाने पर सच तो बोल ही देंगे.
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written by santosh, May 10, 2011
tabhe to log patrkar ko pachkar kahata hain.
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written by prem kant singh, May 10, 2011
bahut khub.... desh k sabse bade media institute tak jane ka achha rasta apnaya? ek thug ko thug kar jutaye gaye in paiso ki wajah se aap IIMC to pahuch gaye lekin ye baat ab bhi apka picha nahi chhod rahi hai. akhir kyu.. actually ye sahi kaam k liye galat tarika ajmane ki duvidha se juda hua mamla hai.
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written by abhishek kumar singh, May 10, 2011
आपने बिल्कुल ठीक काम किया है ,इसे कहतें हैं जैसे को तैसा.....!!!
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written by मनीष, May 10, 2011
पत्रकारिता में आने की अच्‍छी शुरुआत है, वैसे आप जैसे लोगों की कमी नहीं है पत्रकारिता में। क्‍यों और कचडा करने आ रहे हैं।

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