इन लेखों को पढ़कर कुछ सोचिए, कुछ कहिए

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पुण्य प्रसून बाजपेयी और रवीश कुमार. ये दो ऐसे पत्रकार हैं जो मुद्दों के तह में जाकर सच को तलाशने की कोशिश करते हैं. इनके टीवी प्रोग्राम्स, लेखों के जरिए किसी मुद्दे के कई पक्ष जानने-समझने को मिलते हैं. आनंद प्रधान अपने लेखों के जरिए अपने समय के सबसे परेशानहाल लोगों की तरफ से आवाज उठाते हैं, सोचते हैं, लिखते हैं. तीनों का नाता मीडिया से है. पुण्य और रवीश टीवी जर्नलिज्म में सक्रिय हैं तो आनंद मीडिया शिक्षण में. इनके एक-एक लेख को उनके ब्लागों से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -एडिटर

मरते किसानों पर शोक या चकाचौंध अर्थवयवस्था पर जश्न, क्या करें... यह तय हमें ही करना है

पुण्य प्रसून बाजपेयी

दिल्ली से आगरा जाने के लिये राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 24 आजादी से पहले से बना हुआ है। इस रास्ते आगरा जाने का मतलब है पांच घंटे का सफर। वहीं दिल्ली से फरीदाबाद होते हुये आगरा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 2 को दस बरस पहले इतना चौड़ा कर दिया गया कि ढाई घंटे में आगरा पहुंचा जा सकता है। और मायावती एक तीसरा रास्ता यमुना एक्सप्रेस-वे ग्रेटर नोयडा से सीधे आगरा के लिये बनाने में जी जान से लगी है। अगर यह बन जायेगा तो सिर्फ पौने दो घंटे में दिल्ली से आगरा पहुंचा जा सकेगा। तो क्या यूपी सरकार की समूची आग सिर्फ 45 मिनट पहले आगरा पहुंचने की कवायद भर है। जाहिर है कोई बच्चा भी कह सकता है कि यह खेल गाडियों के रफ्तार का नहीं है। बल्कि जमीन पर कब्जा कर विकास की एक ऐसी लकीर खींचने का है जिसमें बिना लिखा-पढी अरबों का खेल भी हो जाये और चंद हथेलियों पर पूंजी की सत्ता भी रेंगने लगे। जो चुनावी मुश्किल में बेडा पार लगाने के लिये हमेशा गठरी में नोट बांधकर तैयार रहे। यानी सवाल यह नहीं है किसान को 850 से 950 रुपये प्रति वर्ग मीटर मुआवजा दिया जा रहा है और बाजार में 10 हजार से 16 हजार प्रति वर्ग मीटर जमीन बिक रही है। और किसान रुठा हुआ है। जबकि सरकार कह रही है कि किसान को लालच आ गया है। पहले सहमति दे दी। अब ज्यादा मांग रहा है।

सवाल यह है कि इसी ग्रेटर नोयडा का नक्शा बीते साढे तीन बरस में छह सौ फीसदी तक बढ गया। इसी ग्रेटर नोयडा व्यवसायिक उपयोग की जमीन की किमत एक लाख रुपये वर्ग मीटर तक जा पहुंचा। इसी ग्रेटर नोयडा में आठ बरस पहले जो जमीन उघोग लगाने के नाम पर दी गयी उसे डेढ बरस पहले एक रात में बदलकर बिल्डरों को बेच दी गयी। और नोयडा एक्सटेंशन का नाम देकर 300 करोड के मुआवजे की एवज में 20 हजार करोड के वारे-न्यारे कर लिये गये । सवाल है यह सबकुछ पीढियो से रहते ग्रेटर नोयडा के किसानों ने ना सिर्फ अपने गांव के चारो तरफ फलते फुलते देखा। बल्कि धारा-4 के तहत सरकार के नोटिफिकेशन से लेकर धारा-6 यानी आपत्ति और धारा-9 यानी सरकार की अधिग्रहित जमीन में अपने पुशतैनी घरों को समाते हुये भी देखा। यानी हर नियम दस्तावेज में रहा और एक रात पता चला कि जिस घर में ग्रामीण किसान रह रहा है उसकी कीमत बिना उसकी जानकारी तय कर दी गयी है। और कीमत लगाने वाला बिल्डर उसकी खेती की जमीन से लेकर घरो को रौंदने के लिये तैयार रोड-रोलर के पीछे खडे होकर ठहाका लगा रहा है।

किसानों को तब लगा बेईमान बिल्डर है। सरकार तो ईमानदार है। इसलिये मायावती की विकास लकीर तले किसानों ने भागेदारी का सवाल उठाया। जिसमें 25 फीसदी जमीन सरकार विकसित करके किसान को लौटा दें और बाकि 75 फिसदी मुआवजे पर ले लें। चाहे तो 25 फीसदी को विकसित करने पर आये खर्चे को भी काट लें। लेकिन बीते डेढ बरस में जिस तेजी से सरकार ही बिल्डर में बदलती चली गयी उसमें भागेदारी का सवाल तो दूर उल्टे जो न्यूनतम जरूरत राज्य को पूरी करनी होती है उससे भी मुनाफा कमाने के चक्कर में सरकार ने हाथ खींच लिये। क्योकि सरकार ने इसी दौर में बिल्डरों के लिये नियम भी ढीले कर दिये। जिस जमीन पर कब्जे के लिये पहले तीस फीसदी कर देना होता था उसे दस फीसदी कर दिया गया और यह छूट भी दे दी कि जमीन पर अपने मुनाफे के मुताबिक बिल्डर योजना बनाये। उपभोक्ताओ से वसूली करें और फिर रकम लौटाये। और सिर्फ ग्रेटर नोयडा एथरिटी ही नहीं बल्कि आगरा तक के बीच में जो भी अथॉराटी है वह बिल्डर या कारपोरेट योजनाओ के लिये इन्फ्रास्ट्रचर बनाने में जुटे। यानी आम आदमी जो विकास की नयी लकीर तले बनने वाली योजनाओ से नहीं जुड़ेगा उसकी सुविधा की जिम्मेदारी राज्य की नहीं है। इसका असर यही हुआ है कि राष्ट्रीय राजमार्ग 24 के किनारे जो 6 बडे शहर और 39 गांव आते है वहा कोई इन्फ्रास्ट्रचर नही है। जबकि दिल्ली-आगरा एक्सप्रेस वे के दोनो तरफ माल, सिनेमाधर, एसआईजेड, नालेज पार्क से लेकर इजाजत की दरकार में फंसे एयरपोर्ट तक के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में अधिकारी जुटे हैं। यहा तक की बिजली -पानी भी रिहायशी इलाको के बदले चकाचौंघ में तब्दिल करने की योजना में डूबे इलाकों में शिफ्ट कर दिया गया है।

योजनाओं का लाभ चंद हाथो में रहे और यही चंद हाथ बतौर सरकार जमीन का खेल कुछ इस तरह करें जिससे सरकार कुछ गलत करती नजर ना आये। इसे भी पैनी दृष्टी सत्ता ने ही दी। ग्रेटर नोयडा से आगरा तक कुल 11 बिल्डरों को जनमीन बांटी गयी। जिसमें साढे चार हजार एकड से लेकर सवा आठ हजार एकड तक की अधिग्रहित जमीन एक एक व्यक्ति के हवाले कर दी गयी और जिन्हें जमीन दी गयी उन्हे यह अधिकार भी दे दिया गया कि वह पेटी बिल्डरों को जमीन बेच दें। और पेटी बिल्डर अपने से छोटे बिल्डरो को जमीन बेचकर मुनाफा बनाने के खेल में शरीक करें। इसका असर यही हुआ कि शहर से लेकर गांव तक के बीच छोटे-बडे बिल्डरों की एक सत्ता बन चुकी है। जो जमीन अधिग्रहित करने में भी मदद करती है और अधिग्रहित जमीन के खिलाफ आक्रोष उबल पडे तो उसे दबाने में भी लग जाती है। यानी सियायत की एक ऐसी लकीर मायावती के दौर में खडी हुई है जिसमें विकास व्यवस्था की नीति बनी और व्यवस्था जमीन कब्जा की योजना। लेकिन सवाल है मायावती अकेले कहा है, और गलत कहा है।

बीते एक बरस में मनमोहन सरकार ने 49 पावर प्रोजेक्ट और 8 रीवर वैली हाईड्रो प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी। जिसके दायरे में देश की पौने तीन लाख एकड़ खेती की जमीन आ रही है। इसी दौर में 63 से ज्यादा स्टील और सिमेंट प्लाट को हरी झंडी मिली जिसके दायरे में 90 हजार एकड जमीन आ रही है। और इन सारी योजनाओ के जो कोयला और लोहा चाहिये उसके लिये खनन की जो इजाजत मनमोहन सरकार दे रही है उसके दायरे में तो किसान, आदिवासी से लेकर टाइगर प्रोजेक्ट और बापू कुटिया तक आ रही है। लेकिन विकास के नाम पर या कहे मुनाफा बनाने कमाने के नाम पर हर राजनीतिक दर खामोश है। क्योकि इस वक्त कोयला मंत्रालय के पास 148 जगहो के खादान बेचने के लिये पडे हैं। और इस पर हर राजनीतिक दल के किसी ना किसी करीबी की नजर है। लेकिन इसके घेरे में क्या क्या आ रहा है यह भी गौर करना जरुरी है। इसमें मध्यप्रदेश के पेंच कन्हान का वह इलाका भी है जहा टाइगर रिजर्व है। पेंच कन्हान के मंडला, रावणवारा, सियाल घोघोरी और ब्रह्मपुरी का करीब 42 वर्ग किलोमिटर में कोयला खादान निर्धारित किया गया है। इस पर कौन रोक लगायेगा यह दूर की गोटी है।

गांधी को लेकर संवेदनशील राजनीति मुनाफा तले कैसे बापू कुटिया को भी धवस्त करने को तैयार है यह वर्धा में कोयला खादानो के बिक्री से पता चलेगा। वर्धा के 14 क्षेत्रों में कोयला खादान खोजी गयी है। यानी कुल छह हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का क्षेत्र कोयला खादान के घेरे में आ जायेगा। जिसमें आधे से ज्यादा जमीन पर फिलहाल खेती होती है। और खादान की परते विनोबा केन्द्र और बापू कुटिया तले भी है। फिर ग्रामीण किसान तो दूर सरकार तो आदिवासियो के नाम पर उड़ीसा में खादान की इजाजत सरकार नहीं देती है लेकिन कोयला खदानों की नयी सूची में झरखंड के संथालपरगना इलाके में 23 ब्लाक कोयला खादान के चुने गये हैं। जिसमें तीन खादान तो उस क्षेत्र में हैं जहां आदिवासियों की लुप्त होती प्रजाति पहाडिया रहती है। राजमहल क्षेत्र के पचवाडा और करनपुरा के पाकरी व चीरु में नब्बे फीसदी आदिवासी हैं। लेकिन सरकार अब यहा भी कोयला खादान की इजाजत देने को तैयार है। वही बंगाल में कास्ता क्षेत्र में बोरेजोरो और गंगारामाचक दो ऐसे इलाके हैं जहां 75 फीसदी से ज्यादा आदिवासी हैं। जिन्हें जमीन छोडने का नोटिस थमाया जा चुका है।

असल में मुश्किल यह नहीं है कि सरकार जमीन हथियाकर विकास की लकीर अपनी जरुरत के मुताबिक खींचना चाहती है। मुश्किल यह है कि सरकार भी जमीन हथियाकर उन्ही किसान-गांववालो को धोखा देने में लग जाती है जिन्हे बहला-फुसला कर या फिर जिनसे जबरदस्ती जमीन ली गयी। नागपुर में मिहान-सेज परियोजना के घेरे में खेती की 6397 हेक्टेयर खेती की जमीन आयी। तीन साल पहले डेढ लाख रुपये एकड जमीन के हिसाब से मुआवजा दिया गया। लेकिन पिछले साल उसी जमीन का विज्ञापन महाराष्ट्र महाराष्ट्र एयरपोर्ट डवलमेंट कंपनी ने दिल्ली-मुबंई के अखबारो में निकाला। और रियल इस्टेट वालो के लिये प्रति एकड जमीन का न्यूनतम मूल्य एक करोड रखा। और फार्म भरने की रकम एक लाख रुपये रखी गयी। जो लौटायी नहीं जायेगी। यानी जमीन का मुआवजा जितना किसानो को दिया गया उससे ज्यादा की वसूली तो फार्म [डाक्यूमेंट की कीमत] बेचकर कर लिये गये। और अब वहां हरे लहलहाते खेत या किसानो की झौपडिया नहीं बल्कि शानदार फ्लैट्स खडे होंगे। और जिस जमीन पर खेती कर पुश्तो से जो डेढ लाख लोग रह रहे थे वही लोग अब इन इमारतो में नौकर का काम करेंगे। इसलिये सवाल सिर्फ मायावती या यूपी या ग्रेटर नोयडा में बहते खून का नहीं है।

सवाल है कि अर्थव्यवस्था को बडा बनाने का जो हुनर देश में अपनाया जा रहा है उसमें किसान या आम आदमी फिट होता कहां है। और बिना खून बहे भी दस हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 35 लाख घर-बार छोड चुके हैं। जबकि किसानों की जमीन पर फिलहाल नब्बे लाख सत्तर हजार करोड का मुनाफा रियल इस्टेट और कारपोरेट के लिये खड़ा हो रहा है। जिसमें यमुना एक्सप्रेस-वे की हिस्सेदारी महज 40 हजार करोड़ की है। तो मरते किसानो के नाम पर शोक मनाये या फलती-फूलती अर्थव्यवस्था पर जश्न, यह तय हमें ही करना है।

अन्ना से अमर ‘क्रांति’ तक :  एक अति से दूसरी अति के बीच झूलते भारतीय न्यूज चैनल

आनंद प्रधान

कहते हैं कि कई बार क्रांतियां अपने ही संतानों को खा जाती हैं. उसमें भी अगर वह ‘क्रांति’ मीडिया खासकर न्यूज चैनलों और न्यू मीडिया के कन्धों पर चढकर आई हो तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है. आखिर मीडिया एक दुधारी तलवार है. वह दोनों ओर से घाव करती है. ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी ‘क्रांति’ के साथ भी यही हो रहा है. न्यूज चैनलों और समाचार मीडिया ने जिस उत्साह के साथ अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी ‘क्रांति’ को गढा और आसमान पर चढ़ाया, अब वे ही उसकी संतानों के पीछे पड़ गए हैं.

नतीजा यह कि चैनलों और अख़बारों में अब अन्ना हजारे से अधिक अमर सिंह दिख रहे हैं. लोकपाल से अधिक चर्चा उस रहस्यमय सी.डी उर्फ पप्पू की हो रही है जिसके ‘पापा का पता नहीं है.’ यही नहीं, समाचार मीडिया का एक हिस्सा जोरशोर से सिविल सोसायटी के सदस्यों की जन्मपत्री खंगालने में जुटा है. गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं. कीचड उछालने का खेल शुरू हो चुका है. हैरानी की बात यह है कि चैनलों के कठघरे में अब भ्रष्ट नेता और मंत्री नहीं बल्कि जन लोकपाल कानून का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के गैर सरकारी सदस्य खासकर शांति और प्रशांत भूषण खड़े हैं.

जाहिर है कि अमर सिंह रातों-रात ‘न्यूजमेकर आफ द डे’ बन चुके हैं. चैनलों पर अन्ना वाणी की जगह अमर वाणी ने ले ली है. चैनलों पर बहुत दिनों बाड़ प्राइम टाइम में अमर सिंह छाए हुए हैं. उनका अहर्निश प्रलाप चल रहा है. कल तक जंतर-मंतर से ‘क्रांति’ की लाइव रिपोर्ट कर रहे न्यूज चैनलों पर अमर सिंह बैठे हैं और एंकर पूछ रहे हैं कि गंभीर आरोपों को देखते हुए क्या भूषण पिता-पुत्र को जन लोकपाल समिति से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?

मजा यह कि सूप तो सूप, चलनी भी यह सवाल पूछ रही है जिसमें सैकड़ों छेद हैं. आश्चर्य नहीं कि ‘बक स्टाप्स हियर’ में बरखा दत्त ने जब यह सवाल स्वामी अग्निवेश से पूछा तो उन्होंने पलटकर पूछा कि बरखा जी, अगर एक बड़े चैनल के एंकर पर भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगता है तो क्या उस एंकर को खुद को पूरी तरह से पाक-साफ़ होने से पहले भ्रष्टाचार पर बहस करने की इजाजत होनी चाहिए? लेकिन मीडिया के पास ऐसे सवाल सुनने और उनका जवाब देने का साहस कहां है?

वहां तो सिर्फ फैसला होता है और वह फैसला हो चुका है. भूषण पिता-पुत्र पर कालिख पोती जा चुकी है. वैसे भी न्यूज चैनल तुरता न्याय में विश्वास करते हैं. वे अतियों के बीच जीने के आदी हो चुके हैं. ऐसे में, उन्हें किसी को आसमान पर चढ़ाने या पाताल में धकेलने में समय नहीं लगता है. इसकी वजह यह भी है कि इस मामले में अधिकांश न्यूज चैनल एक खास तरह के दृष्टि दोष के शिकार हैं. उन्हें काले और सफ़ेद के अलावा और कुछ नहीं दिखता है. संतुलन और अनुपात जैसे शब्द उनकी न्यूज डिक्शनरी से पहले ही गायब हो चुके हैं.

आश्चर्य नहीं कि भूषण पिता-पुत्र के मामले में भी न्यूज चैनल न सिर्फ जल्दबाजी में हैं बल्कि उन्हें इस मामले में काले-सफ़ेद के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा है. इस मामले में चैनलों की सक्रियता देखते ही बनती है. वे एक अति से दूसरी अति पर पहुंच चुके हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि जंतर-मंतर पर अन्ना के अनशन की 24x7 कवरेज और उसे ‘क्रांति’ घोषित करना भी एक अति थी. लेकिन अब उसे प्रतिक्रांति घोषित करने में भी वैसी ही जल्दबाजी दिखाई जा रही है.

इससे ऐसा लगता है कि समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनल अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उसके सिविल सोसायटी सदस्यों को रातों-रात आसमान पर चढ़ाने की अति का पश्चाताप करने में लग गए हैं. लेकिन पश्चाताप का यह तरीका जल्दबाजी में पुरानी गलती को दोहराने की तरह है और अगले पश्चाताप की जमीन तैयार कर रहा है. क्या चैनल जल्दबाजी में एक अति से दूसरी अति तक की पेंडुलम यात्रा से बच नहीं सकते हैं? न्यूज चैनलों के लिए संतुलन, अनुपात, तथ्य-पूर्णता और वस्तुनिष्ठता को बरतना इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?

क्या चैनलों के लिए भूषण पिता-पुत्र पर लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच-पड़ताल करना और सच्चाई को सामने लाने की कोशिश करना इतना मुश्किल था कि वे ‘हिज मास्टर्स वायस’ की तरह सुबह से शाम तक उन आरोपों को दोहराते रहे? यह सोचने की बात है कि इतने संसाधनों के बावजूद चैनल किसी विवादस्पद मामले में अपनी ओर से छानबीन और क्रास चेक करने और तथ्य जुटाने के बजाय क्यों आरोप-प्रत्यारोप को दोहराने वाले साउंड बाईट और प्राइम टाइम तू-तू,मैं-मैं पर ज्यादा भरोसा करते हैं? जांच-पड़ताल और खबर की तह तक जाने का जिम्मा अभी भी मुख्यतः अखबारों पर है.

लेकिन इस साउंड बाईट और तू-तू, मैं-मैं पत्रकारिता में परपीडक सुख और सड़क छाप कौतूहल चाहे जितना हो पर दर्शकों की जानकारी और समझ में शायद ही कोई विस्तार होता हो. यही नहीं, न्यूज चैनलों की यह तू-तू, मैं-मैं पत्रकारिता उन्हें जाने-अनजाने एक अति से दूसरी अति की ओर भी धकेलती रहती है. इस अति का फायदा कभी-कभार अन्ना और उनके मुद्दों को जरूर मिल जाता है लेकिन ज्यादातर मौकों पर इसका फायदा अमर सिंह जैसों को ही होता है. वजह यह कि चैनलों के ‘लोकतंत्र’ में  शांति-प्रशांत भूषण और अमर सिंह में कोई फर्क नहीं है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों पर अमर ‘क्रांति’, अन्ना ‘क्रांति’ को निपटाने में जुट गई है.

लूटो किसानों को, विकास तुम्हें बचाएगा उर्फ विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू

रवीश कुमार

खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए।

इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं।

दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए।

इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है।

आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर (अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।

दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है।

मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए।

भाई साहब, किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।


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