यह रास्ता माओवाद की तरफ ले जाता है

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राजकिशोरपश्चिम बंगाल के वामपंथियों को अपने लिए एक नई जनता खोज लेनी चाहिए। राज्य की वर्तमान जनता अब उनके काम की नहीं रही। यह वही जनता है, जिसका राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व राज्य का वामपंथ चौंतीस सालों से करता आ रहा था। यह वही जनता है जो वामपंथी उम्मीदवारों को वोट भी देता रहा है।

जब तक ऐसा होता रहा, यह दावा किया जाता रहा कि पश्चिम बंगाल की जनता राजनीतिक रूप से बहुत परिपक्व है। अब जब कि वामपंथी दल चुनाव मैदान की धूल चाट रहे हैं, इस स्थापना का समर्थन एक भी वामपंथी विचारक या टिप्पणीकार नहीं कर रहा है। शायद वे यह कहना चाह रहे होंगे, पर कह नहीं पा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की जनता ‘पागल हो गई है।’ उसने ममता बनर्जी को वोट दे कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही उसे डराया जा रहा है कि ममता बनर्जी का शासन कैसा होगा यह भी बताया जा रहा है कि वाम मोर्चा की उपलब्धियां कितनी अहम रही हैं। अचरज की बात यह है कि जो बात छोटे-मोटे बुद्धिजीवियों तक की समझ में आ रही है, वह पश्चिम बंगाल के करोड़ों लोगों की समझ में नहीं आ सकी। जबकि वाम मोर्चा के नेताओं को अपनी उपलब्धियों के बारे में बताने के लिए  महीनों नहीं, वर्षों नहीं, दशकों का मौका मिला था।

अखबारों के पन्नों और ब्लॉगों पर मुझे एक भी ऐसी टिप्पणी दिखाई  नहीं पड़ी जो इस भारी हार  को समझने की वस्तुपरक कोशिश  करती हो। फेसबुक तथा इंटरनेट की अन्य साइटों पर सन्नाटा छाया हुआ है, जैसे किसी प्रियजन का निधन हो गया हो। जो टिप्पणियां दिखाई पड़ीं, उनका सार यह है कि पश्चिम बंगाल में सच की हार हुई है और झूठ जीता है। मानो सच और झूठ को परिभाषित करने का टेंडर एक खास समूह को मिल हुआ हो। एक ओर कहा जाता है कि जनता ही इतिहास बनाती है, दूसरी ओर बताया जा रहा है कि जनता प्रतिक्रियावादी भी हो सकती है। दूसरी बात एकदम गलत नहीं है, क्योंकि जनता भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना को भी वोट देती रही है। आज छह राज्यों में भाजपा की या उसके नेतृत्व में बने गठबंधनों की सरकार है, जब कि सिर्फ एक छोटे-से राज्य में वामपंथियों की सरकार है। लेकिन इसका क्या किया जाए कि त्रिपुरा की जनता भी समय-समय पर गुमराह होती रही है और कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका देती रही है। असली सवाल यह है कि जनता को प्रतिक्रियावाद की ओर बढ़ने का मौका कौन देता है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने यह मौका प्रदान किया है। स्थिति को इतना बिगाड़ दिया गया कि कथित प्रतिक्रियावादी ही जनता को प्रगतिशील नजर आने लगा।

सबसे मजेदार कमेंट मार्क्सवादी  कम्युनिस्ट पार्टी के एक शिखर नेता का है। उनका कहना है, हमने गलतियां की हैं। इस बयान को आए कई दिन हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने या उनके दल के किसी अन्य वरिष्ठ नेता ने अपनी गलतियों की सूची पेश नहीं की है। पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद यही वक्तव्य जारी होने की संभावना है कि हम अपनी उपल्ब्धियों का विवरण जनता तक पहुंचा नहीं सके। शायद वे ऐसा समझते हैं कि जनता के सिर्फ कान होते हैं, आंखें नहीं होतीं। आंख के मुकाबले कान को ज्यादा महत्व देना कोई नया शरीरविज्ञान होगा। वे भूल रहे हैं कि इन सबका मास्टर दिमाग नाम की एक चीज है, जो काम और आंख, दोनों इंद्रियों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करता है और अपना फैसला सुनाता है। गलत दिशाओं में प्रतिबद्ध समूहों के अलावा  प्रत्येक दिमाग स्वतंत्र ढंग से सोचता है। यही वह चीज है, जिससे वाम और दक्षिण समान रूप से डरते हैं।

विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अपनी ही सीट पर पराजित बुद्धदेव भट्टाचार्य ने स्वीकार किया था कि हम जनता से कट गए थे। मेरा आरोप यह है कि वाम मोर्चा के लोग जनता से कट नहीं गए थे, बल्कि बहुत ज्यादा जुड़ गए थे – जैसे जोंक शरीर के किसी हिस्से से चिपक जाती है और खून पीती रहती है। जनता से यह शोषक लगाव कई रूपों में व्यक्त होता रहा। जिस पंचायत व्यवस्था का इतना गुणगान किया जाता है, उसका पूरी तरह से सीपीएमीकरण हो गया था। इनमें वही होता था जो सीपीएम चाहती थी। इसी तरह, शहरी इलाकों में स्थानीय समितियां बनाई गई थीं जो जनता के लिए राज्य सरकार, राज्य न्यायपालिका और राज्य पुलिस की स्थानीय शाखा के रूप में करती थीं। एफआईआर लिखाने के लिए अमीर से गरीब तक, सभी को थाने में जाने के बजाय सीपीएम की स्थानीय शाखा में जाना होता था। जनता से जुड़ाव इतना सघन था कि राज्य में कहीं भी कोई नया कारखाना लगता, कोई नई दुकान खुलती, कोई नया मकान बनता या किसी बने-बनाए मकान पर एक और तल्ला बनाया जाता, तो पैसा देने के लिए लोग थाने बाद में जाते थे, सीपीएम की लोकल कमेटी के दफ्तर में पहले। लोकल कमेटी के खुश होने पर कई बार थाना जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। लोकतांत्रिक केंद्रीकरण के समर्थकों ने अलोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई और यह मानते रहे कि लोग हमारे साथ हैं। व्यक्ति की तरह, लोग भी वास्तव में किसी के साथ नहीं होते। वे अपने साथ होते हैं। चीन में चुनाव कराने की जिम्मेदारी हमारे निर्वाचन आयोग को दे दी जाए, तो वहां का सच भी सामने आ जाएगा।

खैर, यह सब तो छोटी-मोटी बातें हैं। गिरे हुए घोड़े पर चाबुक फटकारना बुद्धिमानी नहीं है। इन चुनाव परिणामों के ज्यादा महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर विचार करना चाहिए, क्योंकि ये भविष्य की राजनीति को प्रभावित करने जा रहे हैं। दादाओं और दीदियों के फर्क की विवेचना करने का कोई फायदा इसलिए नहीं है कि ज्योति बसु ने अपने 23 वर्षों के और बुद्धदेव ने अपने दस वर्षों के शासन काल में पश्चिम बंगाल का इतना कबाड़ा कर दिया है कि उसका फिर से निर्माण करने के लिए टैलेंट की नहीं, जीनियस की जरूरत है। यही बात बिहार और अब उत्तर प्रदेश पर भी लागू होती है। नीतीश कुमार और मायावती पर मोहित लोग अब अपने आंसू पोंछने के लिए अपनी-अपनी जेब से रूमाल निकाल रहे हैं।  कहते हैं, रोम एक दिन में नहीं बना था। इसका दूसरा पहलू यह है कि उसका विनाश भी एक दिन में नहीं हुआ था। रोम के एक बार गिर जाने के बाद उसे दुबारा उठाया नहीं जा सका। डर यह है कि कहीं हमारा भी हश्र वही न हो। सुरंग अब कुछ और लंबी हो गई है।

इस घटना के बाद जो सबसे बड़ी बात हुई है, वह है लाल झंडे की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाना।  यह वैसी ही बड़ी घटना है, जिसकी  ओर संकेत करने के लिए ‘इतिहास का अंत’ जैसा धूर्त मुहावरा गढ़ा गया था। सुदर्शन की अमर कहानी ‘हार की जीत’ में बाबा भारती ने डाकू खड्ग सिंह से कहा था, ‘लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।’ उसी तरह अब भय यह है कि लोग अब लाल झंडे पर विश्वास करना छोड़ देंगे। लाल झंडे की रंगत वैसे तो दशकों से फीकी होती चली आ रही थी, फिर भी आम जनता में, खासकर पश्चिम बंगाल के बाहर, यह यकीन जिंदा था कि लाल झंडा अन्याय से संघर्ष का प्रतीक है। पश्चिम बंगाल में वामपंथ की, खासकर सीपीएम की, हार इतनी जबरदस्त न होती, तो यह भ्रम कुछ और वर्षों तक बना रह सकता था। अब बादल छंट गए हैं। भविष्य में संघर्ष के लिए कोई लाल झंडे का हवाला देगा, तो लोग हंसने लगेंगे। यह उम्मीद के साथ ऐसा विश्वासघात है जिसके लिए लाल झंडे के स्वत्वाधिकारियों को माफ करना उचित नहीं होगा।

सोवियत संघ के पराभव ने दुनिया भर में साम्यवाद की भद पिटवा  दी थी। यहां तक कहा जाने लगा कि अब साम्यवाद का कोई भविष्य नहीं है। जिन्हें साम्यवाद या समाजवाद में अगाध विश्वास है, वे इस बात को न माने हैं, न मानेंगे। लेकिन आस्था से तर्क को काटा नहीं जा सकता। अब जब कि साम्यवादी व्यवस्थाओं ने अपना खोटापन साबित कर दिया है, साम्यवादियों द्वारा अपने लिए नया स्वर्ग बना पाना लगभग असंभव हो चुका है। दुर्भाग्य से भारत में भी वही स्थिति पैदा हो चुकी है। सीपीएम के पराभव ने भारत में साम्यवाद को बदनाम कर दिया है। सीपीएम के नेता केंद्र सरकार की या ममता सरकार की वैध आलोचना भी करेंगे, तो उसे ‘खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे’ की श्रेणी में डाल दिया जाएगा। सबसे अधिक नुकसान पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी का हुआ है। लाल झंडे की इज्जत गरीब-गुरबा में थी, तो सीपीएम की राजनीति युवाओं में यह विश्वास पैदा करती थी कि राजनीति में नैतिकता के लिए कोई कोना बचा हुआ है। अब यह बात झिझक के साथ भी नहीं कही जा सकती। कहा जाता है कि बुद्धदेव व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं, लेकिन यह ‘उम्मीद का दूसरा नाम’ नहीं है, क्योंकि मनमोहन सिंह के बारे में भी यही कहा जा सकता है। कुशल ड्राइवर व्यक्तिगत रूप से बहुत ईमानदार न हो तब भी चलेगा, मगर उस ड्राइवर की गाड़ी में बैठने की हिम्मत कौन करेगा जो ईमानदार बहुत है, पर जिसे गाड़ी चलाना नहीं आता?

भारत के मार्क्सवादियों की एक आलोचना यह की जाती रही है कि उन्होंने संसदीय राजनीति को मंजूर  कर लिया है, जिसने उनके क्रांतिकारी  जज्बे पर पानी फेर दिया है। स्वयं सीपीएम के लोग संसदीय राजनीति को पूंजीवादी लोकतंत्र करार दे कर उसकी आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने अपना फौरी लक्ष्य समाजवादी क्रांति को नहीं, जनवादी गणतंत्र स्थापित करने को बनाया हुआ है। अगर इस दिशा में थोड़ी भी कोशिश होती, तो भारत का संसदीय लोकतंत्र कुछ हद तक शुद्ध हो सकता था। लेकिन वे जनवादी लोकतंत्र तो नहीं ही ला सके, उलटे उन्होंने मौजूदा संसदीय प्रणाली की बुराइयों को बढ़-चढ़ कर अपना लिया। यह विश्वास दूर-दूर तक फैल चुका है कि सब चोर हैं। अण्णा हजारे के आंदोलन को इस विश्वास ने ही हवा दी थी। वामपंथियों के बारे में माना जाता था कि वे चोर नहीं हैं। अब जब कोई यह कहेगा कि सब चोर हैं, तो उसे क्या कह कर टोका जा सकेगा?

दुर्भाग्य यह है कि इसका सबसे ज्यादा लाभ  माओवादियों को मिलने जा रहा  है। सच तो यह है कि माओवाद के पूर्व संस्करण नक्सलवाद का उद्भव सीपीएम के  ‘विपथगामी’ हो जाने से ही हुआ था। जब 1967 में सीपीएम ने संसदीय राजनीति में प्रवेश किया और उसने अपना कोई रेडिकल अजेंडा पेश नहीं किया, तो उसके एक तबके को बहुत असंतोष हुआ। इसी तबके ने नक्सलवाद को जन्म दिया। तब से सबसे धारदार बहस नक्सलवादियों और सीपीएम में ही चली आ रही है। अब माओवादी अपने समर्थकों के बीच यह दावा करते घूमेंगे कि देखो, संसदीय रास्ता जन मुक्ति की ओर जा ही नहीं सकता। इसलिए असली लड़ाई के लिए हथियार उठाना जरूरी है। ओम यानी ऑफिशियल मार्क्सवाद ने यदि संसदीय राजनीति का  सकारात्मक उपयोग किया होता, तो  इसकी मिसाल पेश कर माओवादियों का खंडन किया जा सकता था कि संसद और विधान सभा के माध्यम से भी कुछ किया जा सकता है। अब माओवाद का सैद्धांतिक विरोध क्या कह कर किया जा सकेगा?

लेखक राजकिशोर वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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