पत्रकारिता और दलाली को बराबर का आसन!

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SN Vinodविचलित हूँ! ग्लानि से भरा है मन-मस्तिष्क! शर्म भी आ रही है, गुस्सा भी। पिछले दिनों मेरे तीन सच्चे हितैषी इस बात को लेकर विचारमग्न थे कि 'विनोदजी ने अखबार निकालने का जोखिम भरा तनाव क्यों मोल ले लिया? ... अखबार निकालना तो अब दलाली का काम हो गया है।' क्या सचमुच! क्या अखबार निकालने वाले दलाल हैं,.. दलाली कर रहे हैं?

चूंकि ये तीनों हितैषी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी विधाओं के शीर्ष पुरुष हैं, ज्ञानी हैं, इनके शब्दों को एकबारगी खारिज करना अनुचित होगा, न्यायसंगत तो कदापि नहीं। मंथन जरूर है। उस कोण की पहचान करनी होगी, जिसके कारण तीन जिम्मेदार, अनुभवी, परिपक्व मस्तिष्क अखबार अर्थात् पत्रकारिता और दलाली को बराबरी का आसन प्रदान कर रहे हैं। आरोप के घेरे में चूंकि संपूर्ण अखबारी दुनिया है, बेशर्म बन वे निद्रा का स्वांग न भरें। घातक साबित हो सकती है ऐसी व्यवस्था।

संघर्ष और अनुभव की कथित 'पूँजी' के साथ 1984 में राँची (झारखण्ड) से दैनिक 'प्रभात ख़बर' का प्रकाशन शुरू किया था। वह प्रसंग अब इतिहास के पन्नों में कैद है। गड़े मुर्दे न उखाड़ते हुए सिर्फ यही दोहराऊँगा कि तब संघर्ष-अनुभव की पूँजी पराजित हुई थी, 'व्यवहार की पूँजी' की जीत हुई थी। संघर्ष यात्रा ने नागपुर पहुँचाया। तीन साल दिल्ली और फिर नागपुर। कुछ थपेड़ों के बाद अक्टूबर 2009 में एक विशेष तेवर के साथ 'दैनिक 1857' का प्रकाशन शुरू किया - शत-प्रतिशत मित्रों, शुभचिंतकों के सहयोग से।

अखबार अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब रहा, लेकिन आर्थिक पहलू ने 'याचक' और अगर साफ-साफ कहें तो 'भिखारी' की अवस्था में ला खड़ा कर दिया। स्पष्टवादी, तेजतर्रार, न झुकने वाला विनोद कहीं खो गया। संतोष कि वह अभी मरा नहीं- लुप्त भर है। शायद इसी अवस्था ने तीनों शुभचिंतकों को बेचैन कर डाला। फिर भी, टिप्पणी में निहित 'सत्य' तो कायम है ही। हाँ, यह सच है कि आज पत्र और पत्रकारिता ने स्वयं को संदिग्ध बना डाला है। नीरा राडिया प्रसंग में बेनकाब पत्रकारिता हमेशा पत्रकारीय मूल्य और विश्वसनीयता को मुँह चिढ़ाते रहेगी। नैतिकता किसी अंधेरे कोने में सिसकती-बिलखती रहेगी। ऐसे में अपवाद स्वरूप मौजूद प्रतिबद्ध, समर्पित पत्र-पत्रकार कैसे करेंगे अपना बचाव?

एक विदेशी पत्रकार ने एक बार कहा था 'मुझे गर्व है कि मैं एक पत्रकार हूँ। मुझे अपने कार्यों में पूरा संतोष मिलता है। मैं किसी देश का राष्ट्रपति बनना पसंद नहीं करूँगा। मैं धन का नहीं, शब्दों का कोश तलाशता हूँ।' लेकिन हमारे अपने देसी पत्रकार कौन-सा 'कोष' तलाश रहे हैं। एक उदाहरण काफी होगा। तत्कालीन सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी के लंदन स्थित एक पूर्व 'स्टेशन चीफ' ओलेग गोर्डावस्की लिखित पुस्तक 'केजीबी : द इनसाइड स्टोरी ऑफ इट्स फॉरेन ऑपरेशन' में भारत से खुफिया सूचना एकत्रित करने की 'सुलभता' की चर्चा करते हुए गोर्डावस्की अपने पाठकों को बताते हैं- 'भारत में अंग्रेजी प्रेस और बहुदलीय जनतंत्र के कारण खुफिया जानकारी हासिल करना बहुत ही आसान है... भारत में पैसा लेने को तैयार पत्रकार और राजनेताओं की कमी नहीं है।' क्या यही है हमारी असलियत? अगर यह झूठ है तो इसका पुष्ट खंडन अभी तक क्यों नहीं आया? साफ है कि बरखा दत्त, वीर सांघवी, प्रभु चावला जैसे नामचीन किन्तु अब बदनाम पत्रकारों के कारण खंडन का नैतिक आधार गायब हो चुका है।

हवाला से लेकर तहलका, दुर्योधन, चक्रव्यूह, कैश फॉर वोट और पेड न्यूज तक जैसे शर्मनाक काण्ड उद्घाटित होने के पश्चात् पत्रकारों की भूमिका के आलोक में लगता भी नहीं कि कोई आश्वस्तिदायक स्पष्टीकरण आ पाएगा। अनेक गुटों व वर्गों में बंट चुके पत्रकारों का बड़ा वर्ग स पूर्ण पत्रकारिता को ही टुकड़ों में खंडित कर देना चाहता है। निज स्वार्थपूर्ति हेतु परहित साधन में व्यस्त यह वर्ग राष्ट्र व राष्ट्रीय अस्मिता की चिंता कर भी पाएगा?  चिंतन की ताजा परिवर्तित धारा के साथ एकमार्गी होती जा रही पत्रकारिता के भविष्य पर गंभीर चिंतन समय की माँग है।

खुल्लमखुल्ला लिखने का और कहने का साहस आज भी आज भी सिर्फ पत्रकार ही दिखा सकते हैं। लेकिन इसके लिए स्वच्छ मनोवृत्ति की अक्षुण्णता को प्रश्न के घेरे से बाहर रखना होगा। क्या यह दोहराने की आवश्यकता है कि जिन लेखकों व संपादकों का दार्शनिक दृष्टिकोण नहीं होता, वे चूँ-चूँ का मुरब्बा ही तैयार कर सकते हैं। पाठक और समाज का उचित पथ निर्देशन नहीं कर सकते। मैं इस मान्यता पर आज भी कायम हूँ कि पत्रकारिता एक उद्योग से ज्यादा सेवा है। पूँजी लगाने वाले उद्योगपति को मुनाफा तो मिलना चाहिए परंतु माध्यम गोर्डावस्की के आकलन से नहीं गुजरना चाहिए। यह तभी संभव है जब हम सामाजिक विसंगतियों को समझने की हैसियत रखते हों। साफ-साफ बोलना और साफ-साफ लिखना हमारा अधिकार भी है और कर्तव्य भी। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए यह काम हमें शिष्टता और संयंम की मर्यादा में रहकर करना है। खासकर हिंदी पत्रकारिता को, तभी उसे असली रीढ़ मिल पाएगी। और शायद तभी 'शुभचिंतक' भी मेरे व मेरे समान अकिंचन के लिए चिंता के बोझ से मुक्त हो पाएँगे।

लेखक एसएन विनोद देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे नागपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक '1857' के प्रधान संपादक हैं.


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