अगर यही पत्रकारिता है

E-mail Print PDF

राजकिशोरकोई प्रोफेशनल व्यक्ति संपादक न बने, उसका स्थान पत्र स्वामी ले ले, इस पर सैद्धांतिक रूप से मुझे कोई आपत्ति नहीं है। बशर्ते वह सचमुच पत्रकारिता ही करे। यूरोप में जब पत्रकारिता का उदभव हुआ, तब यही होता था। मुनाफा कमाने या समाज में हैसियत बनाने के लिए अखबार नहीं निकाले जाते थे।

शोषण तथा अन्याय को उजागर करने के लिए और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करने के लिए अखबार निकलते थे और मालिक तथा संपादक एक ही व्यक्ति हुआ करता था। उसे अकसर सरकार का कोप भाजन होना पड़ता था और किसी भी दिन जेल जाने के लिए तैयार रहना पड़ता था। जब पत्रकारिता का विस्तार होने लगा और वह एक बड़ा व्यावसायिक उपक्रम हो गया, तब प्रोफेशनल संपादक की जरूरत सामने आई। तभी से यह नीति चली आ रही है कि अखबार का मालिक बुनियादी नीतियां तय करेगा और उनके दायरे में संपादक स्वतंत्र हो कर अपना काम करेगा।  इस तरह मालिकाना और संपादन दोनों के बीच स्पष्ट कार्य विभाजन था, जो अभी तक बना हुआ है।

भारत में ठीक उलटा हुआ है।  यद्यपि यहां भी कई महत्वाकांक्षी  पत्रकारों ने ऐसे अखबारों  की शुरुआत की जो बाद में  सफल और प्रतिष्ठित हुए, लेकिन  बड़े घरानों के अखबारों में यूरोप और अमेरिका जैसा विभाजन ही नियम था। इसके नतीजे अच्छे ही निकले, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अकसर ऐसे ही महानुभावों को संपादक बनाया जाता था जिनकी रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं होती थी। इसलिए वे सत्ता के केंद्र जरूर हो गए, पर उनकी पत्रकारिता को आज कोई याद नहीं करता।

अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है। अधिकतर मालिक ही संपादन का काम भी करते हैं या बैक सीट से अखबार का संचालन करते हैं। इसका एक गंभीर परिणाम यह हुआ है कि खबर माल बन गई है और पत्रकारिता आर्थिक और राजनीतिक अग्रगति का असरदार माध्यम। यह बात टीवी चैनलों में ज्यादा प्रत्यक्ष है, क्योंकि उनका प्रभाव क्षेत्र विस्तृत एवं सघन है।

पेड न्यूज के रूप में जो एक बड़ी समस्या सामने आई है, उसका उत्स यही है। ऐसा नहीं है कि यह परिघटना  पहले नहीं थी, लेकिन यह कुछ  खास संपादकों तथा रिपोर्टरों तक सीमित थी। अब यह प्रवृत्ति  व्यापक हो चुकी है, क्योंकि पूरा प्रतिष्ठान खुद इसमें कूद पड़ा है। यह एक बड़ी वजह है कि व्यावसायिक बढ़ी है और प्रतिबद्धता में कमी आई है। अखबार उद्योग में पूंजी निवेश कई गुना बढ़ गया है और फिल्म बनाने वालों की तरह कोई भी अखबार मालिक फ्लॉप होने का जोखिम नहीं लेना चाहता।

अतः जिस तरह फिल्म निर्माता ‘जनता यही चाहती है’ के नाम पर अश्लीलता और क्रूरता का फूहड़ घोल तैयार करता है, उसी तरह अखबार को भी चटनी और मुरब्बा बनाने का लालच मजबूत हो गया है। इस प्रक्रिया में हुआ यह है कि जैसे अधिकतर हिन्दी फिल्में एक जैसी होती हैं, वैसे ही अधिकतर अखबार एक जैसे होते जा रहे हैं। मौलिकता के लिए जगह नहीं रही।

एक मामले में निश्चय ही क्रांति हुई है। अब हमें ज्यादा समाचार पढ़ने को मिलते हैं। पहले समाचारों का दायरा बहुत सीमित हुआ करता था। अब न केवल यह दायरा बढ़ा है, बल्कि ब्यौरों की भी बाढ़-सी आ गई है। इतनी कि कई बार ऊब पैदा हो जाती है। दूसरी बात है सरकार की अक्षमता और घोटालों के पर्दाफाश में बढ़ती हुई दिलचस्पी। अखबार ऐसी खबरों से रंगे रहते हैं। वस्तुतः ऐसी खबरों की अधिकता से ही  वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनास्था बढ़ रही है।

लेकिन इसके लिए दोषी घोटालेबाज ही हैं– अखबार तो सिर्फ आईने का काम करता है। अपराध बढ़े हैं तो उनकी रिपोर्टिंग भी बढ़ेगी ही। यह जरूर चिंताजनक है कि अपराधों को किसी जासूसी उपन्यास जैसा रोचक बनाया जा रहा है और काल्पनिक ग्राफिक भी बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट का लाभ उठाते हुए कई बार काम की  और अकसर  विचित्र खबरों को जगह मिलने लग गई है। आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से आर्थिक समाचारों को प्रमुखता मिली है। रंगीनी बढ़ी है और उसके साथ-साथ ग्लैमर भी। फिल्म और टीवी कलाकारों के धांसू और अंग-दिखाऊ दृश्य देखने हों तो आप कोई भी अखबार हाथ में ले सकते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज की पत्रकारिता पहले की तुलना में ज्यादा पाठक-उन्मुख या पाठक-मित्र है। लेकिन कुछ ऐसे बुनियादी परिवर्तन भी हुए हैं, जिनकी वजह से पत्रकारिता का पेशा लगातार संदिग्ध होता जा रहा है। इस पेशे का ग्लैमर बढ़ा है, इसलिए पत्रकार का रुतबा भी आसमान छू रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ जो भयावह दुर्घटना हुई है, वह है पत्रकारों का सामाजिक सम्मान कम होते जाना। लोग उन्हें एक्टर के रूप में देखते हैं, न कि लोकतंत्र के रखवाले या जनता के प्रवक्ता के रूप में।

अगर सनसनी की खोज ही पत्रकारिता है, तो इसे सार्वजनिक स्थानों पर तरह-तरह के करतब दिखा कर भीड़ इकट्ठा करने वालों और अपना माल बेचने वालों से अलग नहीं किया जा सकता। जैसे टीआरपी की दौड़ में टीवी चैनल अपने को हलका और सतही करते जा रहे हैं, वैसे ही पाठक संख्या बढ़ाने की होड़ में अधिकांश अखबार पत्रकारिता की नैतिक संहिता की धज्जियां उड़ाने को उद्यत रहते हैं। नैतिकता और सफलता के बीच चुनना हो, तो सफलता को ही पहला स्थान मिलता है। लक्ष्मी ने सरस्वती को इस कदर दबोच लिया है कि अखबारों की भाषा एकदम बाजारू हो गई है। सबसे मजेदार घटना यह है कि कई अखबार अपने पाठकों को अंग्रेजी सिखाने लग गए हैं।

कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि यह पत्रकारिता के उत्थान और पतन, दोनों का समय है। पाठक संख्या बढ़ने से समाज में अखबारों की पैठ बढ़ी है, समाचार की दुनिया विस्तृत हुई है, तो पत्रकारिता का नैतिक दबदबा शून्य डिग्री से नीचे चला गया है। अब वह पेशा नहीं, बिजनेस है। इससे जो नौजवान एक सामाजिक और उत्तरदायी कर्म मान कर पत्रकारिता करने आए थे, उनका दम घुट रहा है। अन्य पत्रकार भी महसूस करते हैं कि वे सिर्फ दिन बिता रहे हैं। । पत्रकारिता की दुनिया के भीतर और बाहर के वातावरण में धुंध और धुआं है, जो कब कटेगा, यह कौन कह सकता है?

अक्सर सवाल किया जाता है कि समाधान क्या है। क्या कोई समाधान है भी? मैं नहीं जानता, क्योंकि समस्या सिर्फ पत्रकारिता या मीडिया की नहीं है, समस्या पूंजीवादी उत्पादन पद्धति और उपभोक्तावाद से जुड़ी हुई है। वास्तव में दोनों एक ही चीज हैं। जब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकलता, प्रेस के चरित्र में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आ सकता। फिर भी, कुछ चीजें ऐसी हैं जो थोड़ा संयम ला सकती हैं। एक, प्रेस काउंसिल को यह अधिकार दिया जाए कि वह अखबारों के लिए एक नैतिक संहिता बना सके और उस पर अमल कर करवा सके, जैसे सेबी शेअर बाजार को और सेंसर बोर्ड फिल्मों को नियंत्रित करता है।

इस संहिता के लिए सुप्रीम कोर्ट का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक है, क्योंकि संविधान की रक्षा का दायित्व उस पर ही है। जो अखबार इस संहिता का पालन न करे, उसका पंजीयन रद्द कर दिया जाए। दो, देश और शहर के बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता संपादकों और मालिकों से भेंट कर यह दबाव डालते रहें कि जन माध्यमों की कुछ मर्यादा होनी चाहिए। तीन, पाठक लगातार संपादक के नाम पत्र लिख कर अपनी पसंदगी और नापसंदगी बताते रहें। इस सबसे उन पत्रकारों को भी बल मिलेगा जो पत्रकारिता को सिर्फ रोटी-बोटी का जरिया नहीं मानते। इस तरह के और भी प्रयोग किए जा सकते हैं, पर पहले इच्छाशक्ति तो पैदा हो।

लेखक राजकिशोर जाने-माने पत्रकार, स्तंभकार और विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


AddThis
Comments (4)Add Comment
...
written by प्रा. प्रकाश रामकृष्ण खाडिलकर. , June 06, 2011
आपके लेख ने मेरे बचपन की याद ताजा कर दी। उस समय मेरे पिताजी बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक "आज" के प्रमुख संपादक थे। आदरणीय सत्येन्द्रकुमार गुप्त मालिक थे। संपादक के दायित्व के रूप में मेरे पिताजी अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग करते हुये, कुछ संपादकीय लिखे तो उन्हे न प्रकाशित करने के लिये मालिक का उनपर दबाव बढता गया। तब से वे जेब मे त्यागपत्र लेकर ही कार्यालय जाया करते थे। अन्त मे जो होना था, वही हुआ। उन्होने त्यागपत्र दिया लेकिन अपने संपादकीय स्वतंत्रता के साथ कोई समझौता नही किया। उनका यही आचरण हमारे लिये जीवन-मूल्य बन गया।
...
written by अभिषेक, June 02, 2011
क्या बकवास है... शायद राजकिशोर जी को मालूम नहीं है कि युरोप में निष्पक्ष पत्रकारिता जैसी कोई चीज न कभी थी न है.. वहां तो पत्रकारिता की शुरुआत ही अपनी विचारधारा को प्रचारित करने के लिए हुई थी.. और आज भी वहां जो सैकड़ों पन्नों वाले अखबार छपते हैं उनका मूल उद्देश्य कुछ और है, यह किसी से छुपा नहीं है। हमको मालूम है जन्नत कि हक़ीकत लेकिन...
...
written by Sunil Amar journalist 09235728753, June 02, 2011
बढ़िया विवेचन किया है आपने और सुझाव भी बिल्कुल सरल औए व्यवहार योग्य हैं. इन सुझावों पर बहस आगे बढाकर जनमत बनाया जाना चाहिए.
...
written by धीरेन्द्र, June 01, 2011
अब गणेश शंकर विद्यार्थी बनने में किसका भला है..

Write comment

busy