रामदेव के सत्याग्रह पर पत्रकारों की तीन त्वरित टिप्पणियां

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: अपरोक्ष सत्ता संघर्ष ही है बाबा रामदेव का आंदोलन : प्रकृति, मानवता, समाज, देश हित, ईमानदारी और सच्चाई की बातों का कौन समर्थन नहीं करना चाहेगा? सकारात्मक मानसिकता वालों की तो बात ही छोडिय़े, इन मुद्दों पर नकारात्मक सोच रखने वाले भी हां में हां करते नजर आते हैं, ऐसे में योग गुरू बाबा रामदेव की बातें किसी को भला क्यूं बुरी लगेंगी?

यही कारण है कि उनके आंदोलन को देश के सभी भागों से समर्थन मिल रहा है और लोग बड़ी संख्या में दिल्ली भी पहुंच रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का हिस्सा हैं और 26 जनवरी 1950 को लागू किये गये दुनिया के सबसे अच्छे संविधान के दायरे में रह रहे हैं, जिससे हट कर कुछ भी करना न्याय संगत कैसे हो सकता है?

हमारी अपनी व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है और वही रहनी चाहिए, लेकिन कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव उस व्यवस्था को तोडऩे का प्रयास करते नजर आते हैं, जो व्यक्तिवादी होने का सटीक उदाहरण कहा जा सकता है। संसद में कौन बैठे हैं या किस को बैठना चाहिए? यह किसी का व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता है। पूरी प्रक्रिया के बाद संसद के अंदर जो लोग पहुंचते हैं, वह जनता की ही पसंद के होते हैं, ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जो जनता अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के पीछे खड़ी नजर आती है, उसकी बुद्धि वोट देते समय कहां चली जाती है और जब जनता सही हाथों में सत्ता नहीं सौंप सकती, तो उसे सत्ता के बगैर परिवर्तन करने का अधिकार किसने दे दिया या ऐसा करना संभव कैसे है?

खैर, अहम् सवाल यही है कि बाबा रामदेव कांग्रेस या यूपीए सरकार को भ्रष्ट कह रहे हैं, तो उसी से सुधार क्यूं कराना चाहते हैं? धन शक्ति के साथ उनके पास जन शक्ति भी है, तो उसे वोट में क्यूं नहीं बदलवा लेते हैं, जिसके लिए समय का इंतजार करें और सत्ता अपने हाथों में लेकर सब कुछ अपने मन के जैसा ही करें? वह देश, समाज या व्यवस्था सुधारने में इतनी शीघ्रता क्यूं बरत रहे हैं? उन्हें चुनाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए, लेकिन वह नहीं करना चाहते, क्यों कि वह जनता को सपने ही दिखा रहे हैं। उनकी शीघ्रता से स्पष्ट है कि वह जो मांगे सरकार के सामने रख रहे हैं, वह मांगे उनके लिए सिर्फ मुद्दा ही हैं और किसी कीमत पर वह मुद्दा नहीं छोडऩा चाहते, क्यों कि इन मुद्दों की बैसाखी के सहारे ही उन्हें भी सत्ता की चाबी चाहिए और वो चाबी सिर्फ जनता ही दिला सकती है।

महंगाई, भ्रष्टाचार आदि के बढ़ते मामलों के  कारण जनता राजनीतिक दलों से आज कल घृणा करती नजर आ रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन के समय जनता का नेताओं के प्रति आक्रोश स्पष्ट नजर भी आया, तभी बाबा रामदेव राजनेता की जगह बाबा बन कर भक्त जनता से मतदाता का रिश्ता का कायम करना चाहते हैं, जो आसान नहीं कहा जा सकता, क्यों कि सत्ता के लिए जनता राजनेताओं पर ही विश्वास करती है, इसलिए बाबा रामदेव का आंदोलन या अभियान अपरोक्ष रूप से सत्ता संघर्ष ही नजर आ रहा है।

बी.पी.गौतम

स्वतंत्र पत्रकार

09411222163


: बाबा का धमाल क्या दिखा पाएगा कमाल :  भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नाम पर बाबा रामदेव ने करोड़ो रुपये पंडाल पंखे और पकवान में ही फूक डाले। अब ये तो तय है कि बाबा के पंडाल में रइसों का भी तांता लगेगा। सुविधाएं जो फाइवस्टार की मिल रही हैं। बाबा ने तो आंदोलन का स्वरूप ही बदल डाला। अब तक आंदोलन का मतलब तकलीफों को आत्मसात कर न्याय की मांग पर अड़े रहना ही हुआ करता था लेकिन यहां तो खीर मालपुआ की भी व्यवस्था है।

यानि बाबा के पंडाल में आने वाले खूब दावत उड़ाएंगे। सरकार हिली तो हिली नहीं हिली तो पेट हिलाना तो सब सीख ही जाएंगे। मांगें पूरी हो या न पर यह तो तय है दो लोग जरूर फायदे में होंगे। एक बाबा रामदेव जिनके लिए यह मुहिम राजनैतिक प्रवेश द्वार साबित होगी दूसरे हमेशा की तरह अपनी डुगडुगी बजाने वाले दिग्यविजय सिंह। उनको बाबा के स्टंट पर ताना कसने का मौका जो मिल जाएगा। अब देखने लायक ये होगा की बाबा का धमाल कहा तक दिखा पाएगा कमाल।

पुष्पेन्द्र मिश्रा

नईदुनिया

जबलपुर


: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..!! : देश में आंदोलनों की बाढ़ है और पहली बार देश की जनता सचमुच इन आंदोलनों से जुडी हुई है या जुड़ना चाहती है और आन्दोलन करने वाले लोग किसी सियासी पार्टी के लोग न होकर जनता के बीच के लोग हैं जिन्हें आगे आकर अपनी आवाज को उठाना पड़ा है. यह बातें किस ओर संकेत करती हैं. कि एक लोकतान्त्रिक देश में जहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी सत्ता में है ओर दूसरी बड़ी पार्टी विपक्ष की भूमिका में है, से जनता का भरोसा उठ गया है. या अब पार्टियों की पहुँच आम जनता तक रह ही नहीं गई है. देश की दोनों बड़ी पार्टियाँ पिछले कुछ सालों में कहीं न कहीं जनता पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी हैं.

देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस का हाल ये है कि उसके पास तीन ही चेहरे बचे हुए हैं सोनिया, राहुल ओर मनमोहन सिंह. इसके अलावा जो बचे खुचे चेहरे हैं वो राहुल या सोनिया के पीछे खड़े हुए नजर आते हैं. लेकिन पार्टी की मज़बूरी ये है कि राहुल सोनिया की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता का विश्वास जीतने में पार्टी नाकाम रही है. दरअसल पार्टी के तमाम नेता चुनाव जीतने के बाद सीमित हो गए हैं. और पार्टी चेहरों की कमी से जूझने लगी है. हालत यह है कि राहुल और सोनिया के अलावा जनता के साथ खड़े होने को ओर कोई नेता नजर नहीं आता. इसे कांग्रेस की मज़बूरी कहें या गाँधी परिवार की खुद को राजनीति में जीवित रखने की कवायद क्यूँकि जनता के लिए संघर्ष करने के नाम पर यही दोनों नजर आते हैं. बात चाहे भट्टा पारसोल में किसानो के साथ खड़े राहुल की हो या जन कल्याणकारी योजनायें बांटती सोनिया गाँधी की.

इन दोनों के तमाम प्रयासों के बाद भी पार्टी का जनाधार लगातार गिर रहा है. क्यूंकि जिस राज्य में भी पार्टी की सरकार है वहां जमीनी स्तर पर पार्टी का कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिस पर जनता ऐतबार कर सके. इसके उलट गैर कांग्रेसी राज्यों में भी आम जनता से जुड़ने वाला कोई कांग्रेसी नेता नजर नहीं आता जो मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सके. नतीजा आम आदमी ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है. उदाहरण के तौर पर राहुल के तमाम प्रयासों और रात्रि प्रवासों के बावजूद भी उत्तर प्रदेश में पार्टी तीसरे नंबर पर आती है. वहां भी एक रीता बहुगुणा को छोड़ दें तो कोई बड़ा चेहरा जनता की आवाज उठाता नहीं दिखता. कुल मिलाकर यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है क्यूंकि आम आदमी की बात करने वाली पार्टी में अब जनता का भरोसा थोडा कम ही है.

दूसरी तरफ चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा अब अपना रास्ता खो चुकी है. न तो पार्टी के पास जन कल्याणकारी मुद्दों को उठाने की ताक़त रह गई है और न ही सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने की हिम्मत. और जो थोड़ी बहुत हिम्मत करके पार्टी कहीं पर किसी मुद्दे को उठाती भी है तो उसे जन समर्थन हासिल नहीं होता. महंगाई के मुद्दे को लेकर असम में पार्टी ने जनादेश माँगा तो जनता ने इसे नकारते हुए तरुण गोगोई को समर्थन दे दिया. इसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी जनता से दूर हो गई है. और अब पार्टी कि भाषा जनता को समझ नहीं आ रही है. हिंदुत्व का मुद्दा भी बीते ज़माने की बात हो चुका है. और नए ज़माने में भाजपा आधारहीन हो चुकी है. यहाँ तक कि जिनके दम पर पार्टी खड़ी हुई थी उसके दो मजबूत स्तम्भ विहिप और आरएसएस भी उससे दामन छुडाते हुए नजर आ रहे हैं.

आरएसएस का देश भर में बड़ा नेटवर्क है. और जनता के बीच जाकर काम करना उसका प्रमुख उद्देश्य इसीलिए अब तक भाजपा के पीछे खड़े होकर आरएसएस जनता के सवालों को सरकार तक पहुँचाती रही. लेकिन अब जब जनता ने भाजपा को लगभग नकार दिया है. आरएसएस भी अन्य विकल्प तलाशती नजर आ रही है. दरअसल देश में जो सवाल इस समय मुद्दा बने हुए हैं उनके घेरे में भाजपा भी है और इन सवालों पर भाजपा की चुप्पी उसके लिए घातक बन रही है. भ्रष्टाचार जैसे अहम् मुद्दे पर भी पार्टी  की कमजोर पहल आरएसएस और जनता दोनों को ही अखर रही है.

शायद यही वजह है की दोनों अब भाजपा से दूरी बना रहे हैं. संघ अब अपनी साख को कायम रखने की कवायद में अन्ना और राम देव को समर्थन दे रहा है. आरएसएस का इस तरह रामदेव और अन्ना को समर्थन देना कई सवाल खड़े करता है. जिनके जवाब खोजना इस पार्टी के लिए जरुरी हो चला है.  इन सारी बातों का मतलब यह निकलता है कि देश में सत्तारूढ़ पार्टी पर लोगो का विश्वास रह नहीं गया है और विपक्ष में बैठी पार्टी उसका विकल्प होने लायक नहीं है. मतलब पक्ष विपक्ष के बाद रह गई जनता जो अब कहीं न कहीं आंदोलनों कि भाषा समझने और बोलने लगी है.

प्रत्यूष मिश्र

मुख्य संपादक

"शाइनिंग वर्डस"

जयपुर


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