रामदेव के सत्याग्रह पर पत्रकारों की तीन त्वरित टिप्पणियां

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: अपरोक्ष सत्ता संघर्ष ही है बाबा रामदेव का आंदोलन : प्रकृति, मानवता, समाज, देश हित, ईमानदारी और सच्चाई की बातों का कौन समर्थन नहीं करना चाहेगा? सकारात्मक मानसिकता वालों की तो बात ही छोडिय़े, इन मुद्दों पर नकारात्मक सोच रखने वाले भी हां में हां करते नजर आते हैं, ऐसे में योग गुरू बाबा रामदेव की बातें किसी को भला क्यूं बुरी लगेंगी?

यही कारण है कि उनके आंदोलन को देश के सभी भागों से समर्थन मिल रहा है और लोग बड़ी संख्या में दिल्ली भी पहुंच रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का हिस्सा हैं और 26 जनवरी 1950 को लागू किये गये दुनिया के सबसे अच्छे संविधान के दायरे में रह रहे हैं, जिससे हट कर कुछ भी करना न्याय संगत कैसे हो सकता है?

हमारी अपनी व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है और वही रहनी चाहिए, लेकिन कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव उस व्यवस्था को तोडऩे का प्रयास करते नजर आते हैं, जो व्यक्तिवादी होने का सटीक उदाहरण कहा जा सकता है। संसद में कौन बैठे हैं या किस को बैठना चाहिए? यह किसी का व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता है। पूरी प्रक्रिया के बाद संसद के अंदर जो लोग पहुंचते हैं, वह जनता की ही पसंद के होते हैं, ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जो जनता अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के पीछे खड़ी नजर आती है, उसकी बुद्धि वोट देते समय कहां चली जाती है और जब जनता सही हाथों में सत्ता नहीं सौंप सकती, तो उसे सत्ता के बगैर परिवर्तन करने का अधिकार किसने दे दिया या ऐसा करना संभव कैसे है?

खैर, अहम् सवाल यही है कि बाबा रामदेव कांग्रेस या यूपीए सरकार को भ्रष्ट कह रहे हैं, तो उसी से सुधार क्यूं कराना चाहते हैं? धन शक्ति के साथ उनके पास जन शक्ति भी है, तो उसे वोट में क्यूं नहीं बदलवा लेते हैं, जिसके लिए समय का इंतजार करें और सत्ता अपने हाथों में लेकर सब कुछ अपने मन के जैसा ही करें? वह देश, समाज या व्यवस्था सुधारने में इतनी शीघ्रता क्यूं बरत रहे हैं? उन्हें चुनाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए, लेकिन वह नहीं करना चाहते, क्यों कि वह जनता को सपने ही दिखा रहे हैं। उनकी शीघ्रता से स्पष्ट है कि वह जो मांगे सरकार के सामने रख रहे हैं, वह मांगे उनके लिए सिर्फ मुद्दा ही हैं और किसी कीमत पर वह मुद्दा नहीं छोडऩा चाहते, क्यों कि इन मुद्दों की बैसाखी के सहारे ही उन्हें भी सत्ता की चाबी चाहिए और वो चाबी सिर्फ जनता ही दिला सकती है।

महंगाई, भ्रष्टाचार आदि के बढ़ते मामलों के  कारण जनता राजनीतिक दलों से आज कल घृणा करती नजर आ रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन के समय जनता का नेताओं के प्रति आक्रोश स्पष्ट नजर भी आया, तभी बाबा रामदेव राजनेता की जगह बाबा बन कर भक्त जनता से मतदाता का रिश्ता का कायम करना चाहते हैं, जो आसान नहीं कहा जा सकता, क्यों कि सत्ता के लिए जनता राजनेताओं पर ही विश्वास करती है, इसलिए बाबा रामदेव का आंदोलन या अभियान अपरोक्ष रूप से सत्ता संघर्ष ही नजर आ रहा है।

बी.पी.गौतम

स्वतंत्र पत्रकार

09411222163


: बाबा का धमाल क्या दिखा पाएगा कमाल :  भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नाम पर बाबा रामदेव ने करोड़ो रुपये पंडाल पंखे और पकवान में ही फूक डाले। अब ये तो तय है कि बाबा के पंडाल में रइसों का भी तांता लगेगा। सुविधाएं जो फाइवस्टार की मिल रही हैं। बाबा ने तो आंदोलन का स्वरूप ही बदल डाला। अब तक आंदोलन का मतलब तकलीफों को आत्मसात कर न्याय की मांग पर अड़े रहना ही हुआ करता था लेकिन यहां तो खीर मालपुआ की भी व्यवस्था है।

यानि बाबा के पंडाल में आने वाले खूब दावत उड़ाएंगे। सरकार हिली तो हिली नहीं हिली तो पेट हिलाना तो सब सीख ही जाएंगे। मांगें पूरी हो या न पर यह तो तय है दो लोग जरूर फायदे में होंगे। एक बाबा रामदेव जिनके लिए यह मुहिम राजनैतिक प्रवेश द्वार साबित होगी दूसरे हमेशा की तरह अपनी डुगडुगी बजाने वाले दिग्यविजय सिंह। उनको बाबा के स्टंट पर ताना कसने का मौका जो मिल जाएगा। अब देखने लायक ये होगा की बाबा का धमाल कहा तक दिखा पाएगा कमाल।

पुष्पेन्द्र मिश्रा

नईदुनिया

जबलपुर


: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..!! : देश में आंदोलनों की बाढ़ है और पहली बार देश की जनता सचमुच इन आंदोलनों से जुडी हुई है या जुड़ना चाहती है और आन्दोलन करने वाले लोग किसी सियासी पार्टी के लोग न होकर जनता के बीच के लोग हैं जिन्हें आगे आकर अपनी आवाज को उठाना पड़ा है. यह बातें किस ओर संकेत करती हैं. कि एक लोकतान्त्रिक देश में जहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी सत्ता में है ओर दूसरी बड़ी पार्टी विपक्ष की भूमिका में है, से जनता का भरोसा उठ गया है. या अब पार्टियों की पहुँच आम जनता तक रह ही नहीं गई है. देश की दोनों बड़ी पार्टियाँ पिछले कुछ सालों में कहीं न कहीं जनता पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी हैं.

देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस का हाल ये है कि उसके पास तीन ही चेहरे बचे हुए हैं सोनिया, राहुल ओर मनमोहन सिंह. इसके अलावा जो बचे खुचे चेहरे हैं वो राहुल या सोनिया के पीछे खड़े हुए नजर आते हैं. लेकिन पार्टी की मज़बूरी ये है कि राहुल सोनिया की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता का विश्वास जीतने में पार्टी नाकाम रही है. दरअसल पार्टी के तमाम नेता चुनाव जीतने के बाद सीमित हो गए हैं. और पार्टी चेहरों की कमी से जूझने लगी है. हालत यह है कि राहुल और सोनिया के अलावा जनता के साथ खड़े होने को ओर कोई नेता नजर नहीं आता. इसे कांग्रेस की मज़बूरी कहें या गाँधी परिवार की खुद को राजनीति में जीवित रखने की कवायद क्यूँकि जनता के लिए संघर्ष करने के नाम पर यही दोनों नजर आते हैं. बात चाहे भट्टा पारसोल में किसानो के साथ खड़े राहुल की हो या जन कल्याणकारी योजनायें बांटती सोनिया गाँधी की.

इन दोनों के तमाम प्रयासों के बाद भी पार्टी का जनाधार लगातार गिर रहा है. क्यूंकि जिस राज्य में भी पार्टी की सरकार है वहां जमीनी स्तर पर पार्टी का कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिस पर जनता ऐतबार कर सके. इसके उलट गैर कांग्रेसी राज्यों में भी आम जनता से जुड़ने वाला कोई कांग्रेसी नेता नजर नहीं आता जो मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सके. नतीजा आम आदमी ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है. उदाहरण के तौर पर राहुल के तमाम प्रयासों और रात्रि प्रवासों के बावजूद भी उत्तर प्रदेश में पार्टी तीसरे नंबर पर आती है. वहां भी एक रीता बहुगुणा को छोड़ दें तो कोई बड़ा चेहरा जनता की आवाज उठाता नहीं दिखता. कुल मिलाकर यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है क्यूंकि आम आदमी की बात करने वाली पार्टी में अब जनता का भरोसा थोडा कम ही है.

दूसरी तरफ चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा अब अपना रास्ता खो चुकी है. न तो पार्टी के पास जन कल्याणकारी मुद्दों को उठाने की ताक़त रह गई है और न ही सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने की हिम्मत. और जो थोड़ी बहुत हिम्मत करके पार्टी कहीं पर किसी मुद्दे को उठाती भी है तो उसे जन समर्थन हासिल नहीं होता. महंगाई के मुद्दे को लेकर असम में पार्टी ने जनादेश माँगा तो जनता ने इसे नकारते हुए तरुण गोगोई को समर्थन दे दिया. इसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी जनता से दूर हो गई है. और अब पार्टी कि भाषा जनता को समझ नहीं आ रही है. हिंदुत्व का मुद्दा भी बीते ज़माने की बात हो चुका है. और नए ज़माने में भाजपा आधारहीन हो चुकी है. यहाँ तक कि जिनके दम पर पार्टी खड़ी हुई थी उसके दो मजबूत स्तम्भ विहिप और आरएसएस भी उससे दामन छुडाते हुए नजर आ रहे हैं.

आरएसएस का देश भर में बड़ा नेटवर्क है. और जनता के बीच जाकर काम करना उसका प्रमुख उद्देश्य इसीलिए अब तक भाजपा के पीछे खड़े होकर आरएसएस जनता के सवालों को सरकार तक पहुँचाती रही. लेकिन अब जब जनता ने भाजपा को लगभग नकार दिया है. आरएसएस भी अन्य विकल्प तलाशती नजर आ रही है. दरअसल देश में जो सवाल इस समय मुद्दा बने हुए हैं उनके घेरे में भाजपा भी है और इन सवालों पर भाजपा की चुप्पी उसके लिए घातक बन रही है. भ्रष्टाचार जैसे अहम् मुद्दे पर भी पार्टी  की कमजोर पहल आरएसएस और जनता दोनों को ही अखर रही है.

शायद यही वजह है की दोनों अब भाजपा से दूरी बना रहे हैं. संघ अब अपनी साख को कायम रखने की कवायद में अन्ना और राम देव को समर्थन दे रहा है. आरएसएस का इस तरह रामदेव और अन्ना को समर्थन देना कई सवाल खड़े करता है. जिनके जवाब खोजना इस पार्टी के लिए जरुरी हो चला है.  इन सारी बातों का मतलब यह निकलता है कि देश में सत्तारूढ़ पार्टी पर लोगो का विश्वास रह नहीं गया है और विपक्ष में बैठी पार्टी उसका विकल्प होने लायक नहीं है. मतलब पक्ष विपक्ष के बाद रह गई जनता जो अब कहीं न कहीं आंदोलनों कि भाषा समझने और बोलने लगी है.

प्रत्यूष मिश्र

मुख्य संपादक

"शाइनिंग वर्डस"

जयपुर


....बाबा रामदेव के सत्याग्रह के मुद्दे पर लिखे गए इन विश्लेषणों-लेखों को भी पढ़ सकते हैं....


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Comments (10)Add Comment
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written by surendra gayki/aurangabad, June 05, 2011
Bato ka bazar! Ek baat me kahun to Neta Shatir hain, voter bevkuf hai, media wale muhjor, karobaari matlabparast, ........aur hum & aap... nithalle. Desh ki to maa-bhain honi hi hai.
Baba Ramdev! aap humare liye, desh ke liye...chadhh jao suli par, hum tamasha dekhenge.
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written by Ankur Lamaniya, June 05, 2011
दरअसल हमारे देश की ये परंपरा हो चली है, घोटाला करो ओर इस्तीफ़ा देदो, इस तरह की केंद्र सरकार क्या सत्ता मै अपनी जेबें भरने बैठी है, क्यू कतरा रही है सरकार कला धन वापस लाने से, क्यू कतरा रही है सरकार भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून लाने से, शायद इसलिए की उन्हे पता है की अगर उनकी कमान से यह तीर निकला तो ये सबसे पहले उन्ही की छाति को भेदेगा, कल जो निर्दोष लोगों क साथ सुलूक रामलीला मैदान पर हुआ वह बहुत ही शर्मनाक था जहाँ निहत्थे लोगों पर इस कदर क्रूर व्यवहार किया गया, क्या इस देश मै सत्यगृह करना क़ानूनन अपराध हो चला है,मेरी समझ से परे तो यह बात है की दिग्विजय सिंह का मानसिक इलाज अभी तक हुआ क्यूँ नही,मध्य प्रदेश से बुरी तरह चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी ने दिग्विजय को अपना महासचिव क्या सिर्फ़ हर बात पर बे मतलब की बहस बाजी के लिए बनाया है,,शायद ये वही आपातकाल की स्थिति है जो सन ७५ मै हुई थी,निश्चित ही देश को क्रांति ओर रामदेव बाबा जैसे क्रांतिकारियों की ज़रूरत है!
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written by Kuldeep gupta, kanpur, saral sahara, June 05, 2011
Jha tk dekha jye to baba such ki ladai ke liye lad rhe the lekin eka ek kya hua jiske karan baba ko anshan chor ke kyu jana pda, akhir us letter me kya likha gya tha jis pr 5 gante ki meeting hui or use kapil sibal or subodh kant sahay ke shamne hi letter likha gya tha.
Dusri baat yha hai ki kyu kha ja rha hai ki baba un muddo pr anshan kr rhe hai jinki unhe samaj nhi hai.
Ab jo bi ho aye din ek k 7 me ek naya ghotala sunne ko mil hi jata hai jb sarkar ke hi log aye din ghotala krne me aage hai to aam janta kb tk kisi ka 7 dete hue dikhe gi hr roj petrol ke daam high ho jate hai to kuch din me 1 se 1.50 rs. Kam kr diye jate hai.
Agr desh ko bachna hai to phele brasht sarkar ko rokna hoga tbi hamari jeet hogi.
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written by RAJESH STHAPAK, June 05, 2011
baba ramdev ke andolan ko kuchlne ke taeeke se spast ho gya h ki kendr sarkar nhi chahti ki kala dhan desh me wapas aye - rajesh sthapak 09329766651
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written by ishu, June 05, 2011
Pratush Mishr ji,
Sadhuwad, itna saaf, suljha hua, bebaki selikhne ke liye. BP Gautam ji ke kuchh sawalon ke jawab aapke lekhan se mil gaye honge.
Jo bhi satta main aa raha hai woh janta ki ummeedon par kharanahinutar raha. Ek naagnaath to doosra saanp naath. Isiliye babaon, annaon ko aage ana pada hai. Chahe inke maksad/irade theek na hon par janta phir bhi inke peeche hai kyonki usko unpar bharosa nahin raha jo chunav ladte hain aur chun kar jate hain. Election main chunne ke baad woh dagabaaji karte rahe hain.

BP Gautam ji:
Immaturiy, nasamjhi aur tark heenta najar aati hai aapki baaon se. Naraj hone ki bajay seekhiyega isse to aage behtar, dhaardar likh payenge.
Aapke kuch tarkheen tarkon par ek najar:
Aapne likha:
26 जनवरी 1950 को लागू किये गये दुनिया के सबसे अच्छे संविधान के दायरे में रह रहे हैं, जिससे हट कर कुछ भी करना न्याय संगत कैसे हो सकता है?
Paristhitiyon ke mutabik kuchh bhi achha ya bura hota hai. Samvidhan main aapke hisab se sanshodhan ki jaroorat hi nahin thi kyonki woh to duniya ka sabse achha samvidhan tha. Jo likha gaya woh suite nahin kar paya hamari taaseer ko aur usmen kamjoriyan thi isliye parivartan karne pade. Kitne sanshodhan ho chuke hain jankaari le lijiyega.
Jarrorat pade to saara samvidhan bhi badalna padta hai aur naya lana padta hai isliye aapka yeh tark sarasar galat hai ki ek baar jo likha ja chuka hai usse hatke kuchh ho hi nahin sakta.
Aage aapne likha:
हमारी अपनी व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है और वही रहनी चाहिए.
Aisa kadapi nahin hai. Agar aisa hota to hum hamesha angrejon ke banaye kanon, vyavastha ke gulam hi rah jate. Us samay to declared tha hi ki woh sab hamare liye best aur sabko sweekarya vyawastha thi par logon ko pasand nahin aayi aur logon le uska virodh kiya. Gaandhi bhi unmen se ek tha aur Subhash bhi.
Aap ek kaam kijiye, ek matki main paani bhar lijiye aur jindagi bhar usi paani ko peete rahiye chahe paani sad jaye aur matki main keede pad jayen. Kyonki matki sarvshreshtha di thi aapki bujurgon ne.
Acharya Manu ne ek apne hisab se sarvshrestha vyavastha di thi jo unke jamane main aur uske baad hajaron saal chali aur seekarya thi par ab aap usi ko nahi chala sakte aur woh na to nyay sangat hai na tark sangat.
Jantako aapne uske chunav e liye galat thahraya hai. Janta kare kya kabhi naag ko to kabhi saamp ko chun chuki hai par yeh sansad rupi mandir main jakar jahreele jeev ban jate hain aur usko hi daste hain to ab janta ne sadak par utarna shuru kar diya hai aur babaon jogiyon ke peeche chalna shuru kar diya hai.

Main aapki ek baat ka phir bhi samarthan karta hoon:
Yeh ek loktantra ke liye shubh sanket nahin hai. Yeh theek nahin hai ki vyakti vishesh apni hath ke samne sarkaron ko jhukayen aur apni koi bhi maang manwayen. Babaon aur dharm guruon ka satta aur rajneeti main dakhal ho. Is tarah to yeh desh sampradayik akhada ban jayega aage jakar. Arajakta ho sakti hai.
Par karen kya. baba, aana log abhi koi galat mudda nahin utha rahe warna public unke peeche jati na aur sarkar unse baat karti na. Sarkar ko bhi pata hai ki agar woh in andolanon ko galat manti hai aur in logon ko jail main daalti hai to log uske saath nahin. Egypt wagairah type ka kaand ho sakta hai.
Satta aur uska vipaksh koi vikalp hi nahin.
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written by adarsh bhalla, June 05, 2011
भाई गौतम जी, बड़ी सीधी सी बात है, जो आपने चासनी में लपेट कर कह दी. मैंने जब से राजनीती के बारे में सोचना शुरू किया तभी से यही देख रहा हूँ की हर एक दो दशक बाद एक समाज सुधारक आ जाता है. और वह ऐसे बर्ताव करने लगता है जैसे वह आज भी अंग्रेज के खिलाफ लड़ रहा है. संविधान की बात तो बहुत दूर वह सत्ता के लालच में अपनी कथनी और करनी में खुद भी अंतर नहीं कर पता. न जाने क्यूँ ये सभी सुधारक कांग्रेस के शासन काल में ही क्यूँ पैदा हो जाते है. जब में कालेज में था तो जय प्रकाश जी का आन्दोलन देखा, ओर अब उनके प्रोडक्टस जैसे लालू, मुलायम शरद आदि आदि देख रहा हूँ. कुछ छोटा मोटा काम करने लगा, तो श्री वी पी सिंह ने मंडल दे दिया, जिसकी बानगी आप रोजमर्रा की जिंदगी में देख रहे हैं जो व्यक्ति जंतर मंतर पर खड़ा हो कर ५४२ सांसदों को फांसी पर चढाने की बात करता हो वह व्यक्तिवादी नहीं उसके लिए तालिबानी शब्द उपुक्त रहेगा. गलती सिर्फ ओर सिर्फ हमारी है, ओर में रामदेव जी की तर्ज पर यह कहना चाहता हूँ की कमोबेश हम सभी भरष्ट हैं. इन सभी समाज सुधारको का अतीत मैंने अच्छी तरह से पढ़ा है नतीजा किस्सा कुर्सी का. रामलीला मैंदान में जो हुआ उससे कम से कम सत्तालोल्लुप तथाकथित समाज सुधारकों को के सबक लेकर कुछ सालों के लिये देश की १८ प्रतिशत विकास दर को निर्बाध गति से बढ़ने देना चाहिए . देश में आज अंग्रेज का नहीं संविधान का शासन है.
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written by kuldeep, June 04, 2011
.haa ye patrkaar mati mand ho gaye hain,,,,dheerendra ji
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written by kuldeep, June 04, 2011
एक आम आदमी की बुद्धि कहा जायेगी भाई साहब,,जब दोनों तरफ ही मरना हो,,,वोटर को किसी को तो चुनना होगा .ये ठीक वैसा ही है,जैसे तुम से कोई कहे भूखे भेडिये के सामने जाओगे या भूखे शेर के ? जनता को तो बस वोट डालना होता है,,,अब वो चाहे किसी अपराधी को चुन ले या किसी हत्यारे को ...क्यों की राजनीती मैं कोई सज्जन आदमी तो जाता नहीं है,,,ऐसा कोई नेता नहीं होगा जो साफ दामन का हो..सारे दागी प्रवृत्ति के होंगे ,सब के सब भ्रष्ट होंगे,,,,

"हमारी अपनी व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है और वही रहनी चाहिए" ये हमारी व्यवस्था के अनुसार नहीं नेताओं और उन लोगों की व्यवस्थाओं के अनुसार है, जिन्हें इस व्यवस्था से खाने को मिल रहा है,,जो इस देश को पी गए गए है,

कभी किसिस आम आदमी को पूछना के हमारे देश की व्यवस्था कैसी है,जहा शरद पवार और कलमाड़ी जैसे लोग इतना पैसा खा जाते है,,,,जिस की वजह से महंगाई बढ़ जाती है,,,,उन लोगो क बच्चों से पूछो ,,जो मुंबई हमले में मारे गए और उनका हत्यारे को आज तक सजा नहीं हुई है,,और जिस को "अतिथि : देवो भव : " कह के पांच सितारा होटलों की सुविधाओं मैं रखा जाता है,,,,क्यों क सारा सिस्टम भ्रस्त है,,,हमारे देश के नेता देश को बेचने में लगे है,,,ऐसी व्यवस्था तो टूट ही जाननी चाह्हिये,


ऐसी व्यवस्था को तोड़ने से तुम्हे क्यों तकलीफ होती है,,,,शायद इसी लिए के उस के टूटने से काले कारनामे उजागर हो जयींगे या खाने को नहीं मिलेगा

याद रहे ,, _बाबा जो कर रहे हैं वो नव-भारत निर्माण की नीव है.ये क्रांति है जिस का सूत्रपात हो चूका है,,,इस को कोई नहीं रोक सकता तुम्हारा ये लेख भी नहीं,अब हर भ्रष्टकी परतें उखड के रहेंगी ,,,,,विदेशों मैं जमा कला धन आ के रहेगा ,और दोषियों को सजा मिल के रहेगी,,,,लगा लो पाती लगा सको तो....

तुम्हारे इस लेख में मुझे दर की बू आ रही है ,,के अब तो बाबा दूध का दूध और पानी का पानी कर के रहेगा ,सब के काले कारनामे उजागर कर के रहेगा,,सब के विदेशी बेंकों के अकाउंट खाली करवा के जेल भेज के रहेगा,,,,

पर तुम क्यू दरोगे तुमने तो कोई ......>?
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written by dinesh prajapati, June 04, 2011
mera manna hai ki janta ke pass yogya ko chunanne ka koi vikalp nahi hai.ese mai yah kahna ki janta vote dete samay kya karti hai, thik nahi hai. taklifo mai andolan karna netikta ho sakti majboory nahi. yadi andolan karne walo ko suvida mil rahi hai to andolan jyada tikau hoga. kisi bhee parti ne yah nahi kha ki uske kisi neta ka khata swis bank mai nhi hai.
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written by धीरेन्द्र, June 04, 2011
पत्रकार भी जनता को मतिमंद समझ रहे हैं क्या.....

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