कमजोर पड़ते शब्द

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डा. सुभाष राय: सुनो भाई साधो - 2 : अक्सर यह तय करना हर किसी के लिए मुश्किल होता है कि जीवन में क्या करना है, क्यों करना है, किसके लिए करना है। सही निर्णय लेने की समझ बहुत कम लोगों में विकसित हो पाती है। हम जिन सामाजिक, पारिवारिक परिस्थितियों में जन्म लेते हैं, जिन संस्कारों के बीच बड़े होते है, बहुत कुछ उन्हीं पर निर्भर करता है। जीवन, समाज और राजनीति की गहरी समझ के बिना सही रास्ता समझ में नहीं आ सकता।

यह कहना गलत नहीं होगा कि बचपन का परिवेश ही बड़े कलाकार, साहित्यकार, राजनेता या सामाजिक नेता की रचना करता है। वही बड़े अपराधी भी रचता है। कुछ मामलों में जीवन की धारा में कोई असाधारण, अयाचित अवरोध, कोई बड़ी दुर्घटना भी चिंतन की दिशा बदल देती है। कभी किसी को बुद्धत्व की ओर ढकेल देती है तो किसी को अंगुलिमाल बना देती है। आरंभ के 25 वर्ष बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। यही समय जीवन के कैनवस पर व्यक्तित्व की झीनी रेखाएं खींचता है, उनके रंग तय करता है, यह प्रेरणा भी देता है कि अपनी समझ से वह कुछ रेखाएं मिटा सके, कुछ नयी रेखाएं खींच सके, कुछ रंग मिटा सके, कुछ नये रंग भर सके। परिवेश से उपजी समझ को नये सांचे में ढालने की सामर्थ्य भी यही समय देता है।

सबको एक अवसर मिलता है कि वह निश्चय करे, उसे क्या बनना है, क्या करना है, किस तरह करना है। ज्यादातर लोग इस अवसर को गंवा देते हैं, कुछ इसका उपयोग कर लेते हैं। जो कतिपय महत्वाकांक्षाओं के दबाव में बह जाते हैं, वे अपने लिए चाहे जितना भी कर लें, सुख-साधन और ऐश्वर्य के चाहे जितने साधन जुटा लें परंतु सामाजिक स्मृति से बाहर हो जाते हैं। वे मरे हुए लोग होते हैं। जिसे केवल अपने बारे में सोचना है, अपने लिए करना है, वह दूसरों की स्मृति का हिस्सा कैसे बन सकेगा? जो मर जाते हैं या जो जीते जी मरे हुए होते हैं, समय उनकी चिंता नहीं करता। लेकिन सभी ऐसे नहीं होते। कुछ लोग समय से टकराने का साहस करते हैं, अपना रास्ता स्वयं बनाते हैं, जिन रास्तों पर अमूमन लोग नहीं जाना चाहते, उन पर बढ़ जाते हैं। बिना इस बात की परवाह किये कि आगे कितनी बाधाएं होंगी, कितनी चट्टानों से राह छीननी पड़ेगी, कितनी नदियां लांघनी पड़ेंगी, कितने जंगल अतिक्रमित करने पड़ेंगे। जो अंधेरे को चीर देने या उसे सोख लेने की हिम्मत के साथ आगे कदम रखते हैं, जो सूरज उगाने का संकल्प पालकर क्षण-क्षण जलने के इरादे के साथ डग भरते हैं, केवल वही दूसरों के लिए उजाले की चादर तान सकते हैं, वही दूसरों में सुबह की उम्मीद जगा सकते हैं।

आज के समय में तो यह और भी कठिन काम है। संत, साहित्यकार और कलाकार एक तरह से सामाजिक नेतृत्व के हिस्से होते हैं। वे पाखंड, आडंबर, वंचना और छल से लोगों को सावधान भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर इन ताकतों से लड़ते भी हैं। वे अपने दायित्व और दूसरों के अधिकार के प्रति निरंतर सजग रहते हैं। वे बदलाव के हथियार गढ़ते हैं, उनका इस्तेमाल करते हैं और दूसरों को भी उनके उपयोग का प्रशिक्षण देते हैं। वे सोचते हैं, सपने देखते हैं। वे खतरे में पड़ी जिंदगियों के लिए धड़कते रहते हैं। वे शब्दों में नया समाज रचते हैं। वे दूसरों के लिए जीते हैं, इसीलिए उनकी रगों में बहते रहते हैं, उनकी स्मृति में बने रहते हैं। जो संकट में याद आये, ताकत दे, लड़ने का हौसला दे, वही सच्ची रचना है। ऐसी हर रचना जनतंत्र के लिए चल रहे संघर्ष में काम आती है। यह संघर्ष जितना तेज होता जायेगा, सजग शब्दों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती जायेगी, रचना और रचनाकार की जिम्मेदारी उतनी ही गहन एवं गंभीर होती जायेगी।

पर सवाल यह भी है कि शब्दों, रंगों और रेखाओं की गत्यात्मकता, उनकी शक्ति और सामर्थ्य को हथियार बनाने वाले लोगों की सामर्थ्य पर कितना भरोसा किया जाय? क्या वे भी किसी संकीर्णता या स्वार्थ के शिकार हैं? क्या वे अपना ज्यादा समय अपनी कीर्ति पताका फहराने की शतरंजी चालों में नहीं दे रहे हैं? अगर नहीं तो ऐसी रचनाएं क्यों नहीं दिखतीं, जो लोकस्मृति का हिस्सा बनें? जिस तरह संत कवियों की वाणी लोगों की स्मृति में है, जिस तरह कबीर, रविदास या गोरख लोगों की स्मृति में हैं, जिस तरह निराला, नागार्जुन, धूमिल या दुष्यंत लोगों की स्मृति में हैं, उस तरह क्या पिछले दो-तीन दशकों में उभरा कोई रचनाकार लोकस्मृति का हिस्सा बन सका? कहीं यशाकांक्षा, कहीं श्रेष्ठता का दर्प, कहीं विनम्रता का लोप, कहीं लोक से इतर विशिष्टलोक में बने रहने का लोभ तो हमें कमजोर नहीं कर रहा है? इन सवालों पर गंभीरता से बहस की जरूरत है। अब कवि, कहानीकार बन जाना सहज संभाव्य हो गया है, कुछ भी लिख लीजिए और किसी बड़े आलोचक या साहित्यकार से उसकी भूमिका लिखवा लीजिए। हो गया काम, पुस्तकालयों की आलमारियों में सजी पुरासामग्री का हिस्सा बनना बहुत आसान है। अब आपके पास गर्व करने का कारण है, क्योंकि आपके पास गिनाने के लिए कुछ किताबों के नाम हैं। कहीं अच्छी रचनाएं साधन और सुविधासंपन्न पुस्तककारों की इस भीड़ के दबाव में गुम तो नहीं हो रही हैं?

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.


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