वजीर के प्यादे की 'घर' यात्रा

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अभी हाल ही में मुझे एक शोक की खबर मिलने पर ससुराल पक्ष रायपुर जाना पड़ा। खबर अचानक आई थी, इसलिए अचानक ही चल पड़ा। भला हो रेलवे में मिलने वाले डीआरएम कोटे से रिजर्वेशन का जो रिजर्वेशन मिल गया और सफर कुछ आसान हो गया। ग्वालियर से रायपुर तक की यात्रा तो कुछ चिंता में बीती पर लौटते वक्त अकेला था। इसलिए कुछ सोचने और काफी कुछ देखने को मिला। यह भी देखने को मिला कि जब मध्यप्रदेश के वजीरों के प्यादे इतनी ठसक से रेल से सफर करते हैं तो फिर वजीरों के क्या ठाठ होतें होंगे।

दरअसल छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस छह जून की सुबह भोपाल के मुख्य रेलवे स्टेशन पर आकर थमी। मेरी ऊपरी बर्थ थी, इसलिए ऊपर ही पसरा हुआ था। लेकिन यह देखने के लिए नींद टूट चुकी थी कि अब भोपाल से लेकर ग्वालियर तक किन मुसाफिरों का साथ मिलने वाला है। यह इंतजार जल्द ही खत्म हो गया। एक दंपति कोच में दाखिल हुए। हावभाव से ही दिख रहा था कि वे उत्तराखंड में कहीं के रहने वाले हैं क्योंकि बोली भी मध्यप्रदेश की बोली से कुछ अलग थी और चेहरा-मोहरा भी। बाद में उन्होंने बता भी दिया कि वे अपने घर उत्तराखंड जा रहे हैं।

पूरी रात ऊपरी बर्थ पर कटी थी, इसलिए भोपाल से रेल के सरकते ही मैं निचली बर्थ पर आ गया और बैठ गया छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में भोपाल से सवार हुए दंपति के बाजू में। रेल में चढऩे से लेकर रेल के चलने तक पुरुष के कान से एक मोबाइल हटता तो दूसरे कान पर दूसरा मोबाइल चिपक जाता। किसी को वह फोन कर रहे थे तो कोई उन्हें टेलीफोन कर रहा था। बातचीत के तरीके से साफ दिख रहा था कि पड़ोस में बैठा मुसाफिर कोई आम मुसाफिर नहीं है।

खैर, विदिशा पहुंचते-पहुंचते उन्हें जिसे दिशा निर्देश देना था, दे दिए और जिससे दिशा निर्देश लेना था उससे दिशा निर्देश ले लिया। किसी को बता दिया कि तुम्हारी काफी शिकायतें आई हैं तो किसी को भरोसा दे दिया कि तुम्हारा नाम लिस्ट में नहीं है। डरने की कोई बात नहीं है। यहां बता दें कि इन दिनों मध्यप्रदेश में तबादला सीजन चल रहा है। इन सब से जब साहब फारिग हुए तो बातचीत की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने किसी को मोबाइल कर कहा कि जोराल-एम-2 दवा तो मैं ला ही नहीं पाया। तुम लाकर दे देना। चूंकि मैं भी डायबिटिक हूं इसलिए जोराल-एम-2 दवा के बारे में तुरंत समझ गया और अपने बैग से यह दवा निकालते हुए उन्हें देते हुए पूछा क्या आप भी डायबिटिक हैं। जवाब हां में मिला पर साथ ही यह भी जोड़ दिया कि डॉक्टर तो डायबिटीज से दूर रहने के लिए तमाम सलाह देते हैं पर क्या करूं? काम का दबाव इतना है कि डॉक्टर की सलाह पर अमल कर ही नहीं पाता। इसलिए दवाओं के सहारे हूं।

खैर यहां से बात शुरू हो गई और परिचय भी हो गया। मुझे यह भी पता चल गया कि हमारे पड़ोस में बैठे सज्जन का नाम क्या है और जब काम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कुछ ठसक के साथ बताया फलां मंत्री का पीए हूं। अब मेरा चुप रहना ही उचित था, वरना मैं बताता कि मैं पत्रकार हूं तो शायद यह पता ही नहीं चल पाता कि प्रदेश सरकार के एक वजीर का पीए किस तरह लोगों का दोहन करते हुए अपने घर की यात्रा पर निकला है। गंजबासौदा आते-आते तक उन्हें याद आया कि उनकी धर्मपत्नी तो घर से खाना लेकर ही नहीं आई हैं (शायद यह पहले से तय था कि जब रास्ते भर सेवक खड़े मिलने हैं तो फिर घर में चूल्हे पर खटने से क्या फायदा)। तुरंत साहब ने नंबर डायल किया। दूसरी तरफ से क्या जवाब मिला, नहीं सुन पाया पर जो बात यहां से की जा रही थी उससे पता चला कि ऑर्डर किसी ठेकेदार को दिया गया है। जिसका नाम अंशुल था और वह टीकमगढ़ का रहने वाला है। उसे तुरंत आदेश दिया गया कि तुम्हारी भाभी को दाल मखानी और बटर नॉन पसंद है और हां मुझे भी सिगरेट की तलब लगती है।

गाड़ी एक बजे के आसपास झांसी पहुंचेगी, और हां एक सब इंजीनियर का नाम लेते हुए पीए बोले उसे भी ले आना। वो भी मिलने की कह रहा था। दूसरी तरफ वाला कम ही बोल पा रहा था शायद क्योंकि पीए साहब की ज्यादा बोल रहे थे। इससे मुझे लगा कि ठेकेदार जी, जी, जी के अलावा कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था। खैर रेल झांसी पहुंची पर ठेकेदार का मोबाइल आउटरेंज हो गया। अब पीए साहब पसीना-पसीना। दोनों मोबाइल पर नंबर डायल कर मोबाइल कान पर लगाते पर पिप-पिप-पिप के बाद डायलिंग बंद हो जाती। वो तो भला हो ठेकेदार जो हांफता और पसीने से तरबतर हाल में कोच में दाखिल हुआ और माफी मांगते हुए बोला, क्या करूं, जाम में फंस गया था।

खैर उसने भोजन के दो बड़े पैकेट साहब को पेश किए। थोड़ी देर बैठकर हमारे सामने ही दोनों बतराए और पीए साहब बोले चलूं, शू-शू करके आते हैं। शू-शू आई साहब को चल पड़ा ठेकेदार उनके पीछे-पीछे। थोड़ी देर बाद रेल चल पड़ी। ठेकेदार उतर गया। पीए अपनी बर्थ पर आ गए। उनकी जेब चुगली कर रही थी कि जेब भारी हो गई। रेल के झांसी से सरकते ही पीए अपनी बीवी के साथ बैठ गए भोजन फटकारने। जितना खाते बना, उतना खाया। शेष रख लिया। बोले सफर लंबा है। गाजियाबाद पहुंचते-पहुंचते रात हो जाएगी। डिनर के काम आ जाएगा। लेकिन संतोष इतने पर भी नहीं था। फिर मोबाइल कान पर लगाया और दूसरी तरफ से मोबाइल रिसीव करने वाले को कुछ आर्डर कर दिया। फिर मुझसे पूछा, ग्वालियर रेल कब पहुंचेगी। मैंने कहा लगभग ढाई बजे। अब पीए साहब का इंतजार शुरू हो गया ग्वालियर रेलवे स्टेशन आने का।

हालांकि वे रास्ते भर मुझे बता रहे थे कि बैकपेन रहता है। जब तक कमर सीधी न कर लूं। आराम नहीं मिलता। आराम का जिक्र आने पर मैंने उन्हें सुझाव दिया कि वे ऊपरी बर्थ पर जाकर पांव सीधे कर लें तो उन्होंने जो जवाब दिया, वह काफी चकरा देने वाला था। बोले, ग्वालियर स्टेशन पर कुछ छर्रे मिलने आने वाले हैं। मैं सो गया तो मुलाकात नहीं हो पाएगी। बातों-बातों में झांसी से ग्वालियर आ गया। मैं कोच से नीचे उतरा तो देखा दो लोग (दोनों इंजीनियर थे, मैं इसलिए इन्हें पहचान गया क्योंकि एक मेरा परिचित था) दोनों हाथों में दो-दो पैकेट लिए खड़े थे। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि पीए साहब को किन छर्रों का इंतजार है। मैंने उन्हें बताया कि जिसके लिए वे यह पैकेट लेकर खड़े हैं, वे बर्थ नंबर 33 पर विराजमान हैं। वे तुरंत मुस्कराते हुए कोच के भीतर लपके और मैं बढ़ गया तपती दोपहरी में अपने घर की ओर यह सोचते हुए जब प्रदेश की सड़कों का रखरखाव के लिए जिम्मेदार वजीर के पीए की घर यात्रा इतनी सुखदायी रहती है तो फिर......।

लेखक प्रफुल्‍ल नायक मध्‍य प्रदेश में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.


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