अन्ना हजारे, रामदेव और कांग्रेस - (एक)

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दिनेश चौधरी: जब धर्म धंधे से जुड़ता है तो उसे योग कहते हैं- हरिशंकर परसाई : इस समय देश की राजनीति में कुकरहाव जैसा मचा हुआ है। पता नहीं आपके किस बयान को किस रूप में ले लिया जाये और हमले करने के लिये आप पर किसी प्रवक्ता को छोड़ दिया जाये। इन प्रवक्ताओं ने और कुछ किया हो या न किया हो, कुछ बातों को अच्छी तरह से स्थापित कर दिया है।

जैसे यह कि जिस तरह घटिया लेखक आगे चलकर अच्छा आलोचक साबित होता है उसी तरह पिटे हुए नेता प्रवक्ता बनने के आदर्श पात्र होते हैं। इन्हीं प्रवक्ताओं का पुण्य स्मरण करते हुए और इनसे बख्श देने की अग्रिम याचना करते हुए मैं यह बात पहले ही साफ कर देना चाहता हूं कि मैं यह लेख किसी पत्रकार या टिप्पणीकार की हैसियत से नहीं, बल्कि एक आंदोलन के छोटे से कार्यकर्ता की हैसियत से लिख रहा हूं, जिसकी चिंता के केंद्र में सड़ी हुई राजनीति नहीं बल्कि जन-आंदोलन हैं और ये भय है कि कुछ लोगों की करतूतों की वजह से कहीं ये आंदोलन भी लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता न खो बैठें।

बाबा रामदेव जब व्यवस्था परिवर्तन के लिये हुंकार भर रहे थे और वीरों के अंदाज में सरकार को ललकार रहे थे तब मुझ समेत आंदोलन के अनेक साथी इस बात की सांस रोककर प्रतीक्षा कर रहे थे कि देखें, बाबा की पोल कब तक खुलती है? पोल खुलेगी यह बात सभी को मालूम थी पर इतनी जल्दी खुल जायेगी, ये किसी ने नहीं सोचा था। और अब तो जो बाबा कर रहे हैं वह सरेआम अपनी ही लंगोट खोलने जैसा है। लेकिन इस कहानी की तफसील में जाने से पहले जरा कांग्रेस के खेल को समझ लिया जाये।

बड़े-बड़ों से लेकर छुटभैयों तक, सारे कांग्रेसी नेताओं ने बाबा के खिलाफ हल्ला बोल दिया है और यह हल्ला बोल एक तरह से मैडम की निगाह में गुडबाय बनने का जरिया होकर रह गया है। कल तक बाबा की चरणों में लोटने वाले कांग्रेसी अलादीन के चिराग घिसकर नये-नये दस्तावेज जुगाड़ने में लगे हैं कि बाबा तो संघ का आदमी है। बाबा के संघ का आदमी होने की बात इन बेचारे भोले-भाले नेताओं को ब्रेकिंग न्यूज की तरह अभी-अभी मालूम हुई है, वरना इनके चार-चार बड़े नेता कल तक बाबा के चरणों में शीर्षासन कर रहे थे। क्या सचमुच ये कांग्रेसी इतने भोले-भाले हैं?

बाबा ने करोड़ों रूपयों का साम्राज्य क्या एक ही दिन में खड़ा कर लिया, रामदेव के गुरू शंकरदेव कथित रूप से लापता हैं, बाबा के "सहयोगी" राजीव दीक्षित को इतनी कम उम्र में हैरतअंगेज ढंग से दिल का दौरा क्यों पड़ा और बालकृष्ण की नागरिकता पर उठने वालों सवालों की जानकारी भी कांग्रेस को तभी हुई जब बाबा से उनकी "डील" विफल हो गयी। इस "डील" के विफल होने के बाद से ही बाबा व कांग्रेस में कुकरहाव मचा हुआ है और देश का पूरा माहौल गंधाने लगा है। बिल्ली के भाग से छींका टूटा और ताल ठोककर भाजपा भी मैदान में आ गयी है। काले धन का असल मुदृदा हाशिये पर चला गया और कांग्रेस चाहती भी यही थी। आखिर इतने दिनों से वे शासन कर रहे हैं तो क्या खाली देश की सेवा ही कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट की झाड़ खाने के बाद भी जो सरकार बेशर्मी के साथ निकम्मापन दिखाये तो चोर दाढ़ी में तिनका वाली बात तो समझ में आती ही है।

कुछ बेहद अंदरूनी सूत्रों की बात पर यकीन किया जाये तो समझा जाता है कि बाबा की फाइल कांग्रेस ने तभी तैयार कर ली थी जब से उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षायें जोर मारने लगी थीं। कहा जाता है कि सोनिया के नजदीकी व कांग्रेस के एक खासमखास नेता ने बाबा को यह फाइल पहले ही दिखा थी और उनसे कहा गया था कि या तो वे चुपचाप योग ही करते रहें या राजनीति का शौक चर्रा रहा है तो अपनी नयी पार्टी खड़ी कर लें। कांग्रेस को न तो बाबा के योग से आपत्ति थी और न ही नयी पार्टी बनाने से। उल्टे कांग्रेस चाहती थी कि बाबा नयी पार्टी खड़ी कर लें तो उन्हें भाजपा को निपटाने में आसानी रहेगी क्योंकि विचारधारा के आधार पर वोट तो आखिर उन्हीं के कटने हैं।

सूत्रों के अनुसार व्यावसायिक बुद्धि के बाबा ने कांग्रेस की इस धमकी को भी एक अवसर के रूप में लिया और वे कांग्रेस और भाजपा दोनों को "डबलक्रास" करते रहे। कांग्रेस को जताते रहे कि वे एक नयी पार्टी खड़ी कर रहे हैं और यह जताते हुए सरकार से तमाम सुविधायें लेते रहे और उधर भाजपा को यह संकेत देते रहे कि अपनी विचारधारा तो एक ही है, इसलिए जब भी पककर टपकेंगे उनकी ही झोली में गिरेंगे। रिश्ते तो उनके मायावती से भी खराब नहीं रहे और शायद कल ही कह रहे थे कि चंद्राबाबू नायडू ने भी उन्हें फोन किया है। वे सबसे मैनेज करके चलने वाले योगगुरू हैं, जो इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि देशभक्ति भी एक ब्रांड है, जो बाजार में हाथों-हाथ बिकता है।

इस कहानी में ट्विस्ट तब आया जब बीच में अन्ना हजारे ने एंट्री मार दी। अन्ना गांधीवादी हैं और बरसों से ईमानदारी के साथ अपने काम में लगे हुए हैं। उन्हें मिले मीडिया के प्रचार से बाबा को लगा कि उनका मुद्दा हाईजैक हो गया। साथ ही किंगमेकर बनने की उनकी दबी हुई महत्वाकांक्षाओं ने फिर से जन्म लिया और उन्हें लगा कि बदले हुए हालात में कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आसानी से घेरा जा सकता है, इसलिये वे लाव-लश्कर लेकर दिल्ली पहुंच गये। दिल्ली में हुए उनके स्वागत ने उनके अहंकार को और बढ़ा दिया कि वे लाखों लोगों के दिलों में राज करने वाले स्वामी हैं और अब उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

बाबा ने तो उस समय - हालांकि इसका अवसर भी नहीं मिला होगा- सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ये सरकार उन पर डंडे भी चला सकती है। उधर कांग्रेस ने जब देखा कि अन्ना हजारे की ड्राफ्टिंग कमेटी को बदनाम करने की पुरजोर कोशिशें नाकाम हो गयीं हैं तो उसने यह अंदाजा लगा लिया था का अन्ना को सीधे तो नहीं घेरा जा सकता इसलिये बेहतर है कि रामदेव को ही हवा देकर उनका कद कुछ कम किया जाये, बाबा को गुब्बारे की तरह फुलाया जाए और मौका लगते ही पिन खोंस दी जाये। गड़बड़ ये हुई की अभूतपूर्व स्वागत व भीड़ से बाबा को और बालकृष्ण की चिट्ठी से सिब्बल को कुछ ज्यादा ही जोश आ गया और जो "लड़ाई" सौहाद्रपूर्ण माहौल में चल रही थी वह आर-पार की लड़ाई में तब्दील हो गयी। अन्यथा न तो बाबा कांग्रेस से सीधा टकराव चाहते थे और न ही कांग्रेस चाहती थी कि वे भाजपा की झोली में जा टपकें।

हे भड़ासी भाइयो, ठीक इसी बिंदु पर आकर मुझे क्षमा करें क्योंकि मैं इस कहानी को कोई आठ-दस बरस पीछे की ओर ले जाना चाहता हूं जो कि बाबा के चरित्र को समझने के लिये आवश्यक है। यह कहानी बाबा के "सहयोगी" और एक समय आजादी बचाओ आंदोलन के फायर ब्रांड नेता रहे राजीव दीक्षित की है। इसे जानना इसलिये भी जरूरी है क्योंकि गांधीवादी आंदोलनों में नैतिक शक्ति, चारित्रिक बल, शील, सत्य, शुचिता जैसे तत्वों का बोलबाला रहता है व अन्ना के आंदोलन व रामदेव के आंदोलन में बुनियादी अंतर को भी इन्हीं के संदर्भों में समझा जा सकता है।

-जारी-

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. दिनेश चौधरी के भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित अन्य लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


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