अन्ना हजारे, रामदेव व कांग्रेस- (दो)

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दिनेश चौधरी: बाबा यदि अन्ना की शरण लें तो कैसा हो? : राजीव दीक्षित के संबंध में मैं फिलहाल उन्हीं प्रसंगों की चर्चा करना चाहता हूं, जिनका संबंध बाबा रामदेव से है। इसे आप काव्यात्मक न्याय या "पोयेटिक जस्टिस" कह सकते हैं कि सब कुछ होते हुए भी अहंकार के जिस दुर्गुण के कारण राजीव को बाबा की शरण में जाना पड़ा, आज बाबा भी उसी वजह से दुर्दशा के दिन देख रहे हैं।

काले धन का मुद्दा सबसे पहले किसने उठाया इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी मेरे पास नहीं है। लेकिन जहां तक मेरा अपना प्रश्न है, मैं इस मुद्दे से राजीव के जरिये ही अवगत हुआ था। यह 2001-02 की बात है। काला धन वापस लाने के संबंध तब आजादी बचाओ आंदोलन ने बाकायदा पोस्टर भी प्रकाशित किये थे। राजीव विलक्षण प्रतिभा के धनी थे और उनके व्याख्यान प्रभावशाली होने के साथ साथ बेहद रोचक भी होते थे। यह उनके ही बूते की बात थी कि वे छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के गांवों में भी पढ़े-बेपढ़े लोगों के बीच गैट संधि, पेटेंट कानून, विश्व व्यापार संगठन, नयी आर्थिक नीति जैसे विषयों पर अधिकारपूर्वक व्याख्यान करते थे और उनकी बात न सिर्फ लोगों के जेहन तक बल्कि दिलों तक पहुंचती थी।

काला धन वापस लाने समेत, स्वदेशी कृषि से लेकर स्वदेशी वस्तुओं व व्यस्थाओं की जितनी बात आज बाबा कर रहे हैं, वे सब बाबा ने राजीव के व्याख्यानों से उड़ायी थीं। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह नहीं है कि मामले को पहले किसने उठाया या श्रेय किसे मिलना चाहिये, मुद्दा यह है कि सार्वजनिक जीवन में जब आपको किसी की कोई बात भली लगती है तो उसके प्रति आभार व्यक्त करने की सदाशयता आपके अंदर होनी चाहिये, क्योंकि इससे आपकी नीयत का पता चलता है। खासतौर पर तब जबकि आप स्वयं को गांधीवादी या संत कहते हों।

दुर्भाग्य से जिन दिनों में राजीव गांव-गांव व शहर-दर-शहर घूमकर लोगों को अपनी बातें समझा रहे थे, मीडिया की मेहरबानी से बाबा रामदेव योगगुरू के रूप में स्थापित हो चुके थे और अपनी पहचान एक निहायत अलग किस्म के संत के रूप में बनाने में जुट गये थे, जो संतई के अलावा राजनीतिक समझ भी रखता है। तब ये बातें सिर्फ या तो उन्हें पता थी जिन्होंने राजीव को सुना था या उन्हें जो आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता थे। राजीव के पीछे भी शोध करने वालों की एक लंबी चौड़ी टीम थी जो चुपचाप अपना काम कर रही थी और ये सभी सुप्रसिद्ध गांधीवादी इतिहासकार धर्मपाल के शिष्य थे, जिनका जिक्र न कभी राजीव ने किया न कभी बाबा ने। राजीव व बाबा के मिलन की कथा भी यहीं से शुरू होती है।

अब आप जरा अंदाजा लगाइये कि किसी धांसू राइटर की थीम को कोई कबाड़िया चोरी कर ले और उस पर फिल्म बनाकर करोड़ों पीटने लगे तो उस बेचारे राइटर पर क्या गुजरेगी? राजीव की त्रासदी यही थी। वे गांव-गांव, गली-गली खाक छानकर व्याख्यान कर रहे थे और उन्हें डबल कालम न्यूज भी बमुश्किल नसीब होती थी, जबकि बाबा इन्हीं मुद्दों पर बहुत थोड़ी और आधी-अधूरी जानकारी के साथ धन व यश दोनों बटोरने में लग गये थे। संभवत: इसी वजह से राजीव के भीतर कुंठा घर करने लगी और वे कुछ इस तरह के आरोपों में घिरते चले गये, जिनकी अपेक्षा कम से कम किसी गांधीवादी कार्यकर्ता से नहीं की जा सकती। आरोप आर्थिक अनियमितता के थे पर बात पैसों की नहीं थी, बल्कि विश्वास भंग होने की थी। कहासुनी के बाद राजीव को उसी आंदोलन से निष्कासित कर दिया गया, जिसे खुद उन्होंने खड़ा किया था।

इस अवसर का लाभ व्यावसायिक बुद्धि के बाबा ने उठाया और राजीव को अपने पास व्याख्यान करने के लिये सहयोगी के रूप में रख लिया। आंदोलन के कार्यकर्ता बाबा के समक्ष पहुंचे व विस्तार से राजीव के बारे में चर्चा की। बाबा ने कार्यकर्ताओं से जानबूझकर कुछ इस तरह के सवाल पूछे, जिन्हें कानून का भाषा में "लीडिंग क्वेश्चन" कहा जाता है और यह जानते हुए भी कि राजीव भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं, उन्हें अपनी शरण में रखे जाने का निर्णय सुना दिया। भ्रष्टाचार के प्रति बाबा की गंभीरता का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता है। आप कह सकते हैं एक बड़े उद्देश्य के लिये उन्होंने एक छोटी-सी बात को नजरअंदाज कर दिया। यह बात हजम करने लायक हो सकती थी अगर मामला किसी राजनीतिक दल का होता। लेकिन ध्यान रहे कि यह मामला एक गांधीवादी और एक संत का है, जिनका समूचा दर्शन ही "सत्य" पर आधारित होता है और मेहरबानी करके बतायें कि राजीव व बाबा के इस किस्से में आपको सत्य के दर्शन कहां पर हो रहे हैं?


बाबा आधी-अधूरी तैयारियों के साथ किस तरह लड़ने जाते हैं इसका एक नमूना आप यहां देख सकते हैं। बड़े नोट वापस लेने की मांग अर्थक्रांति समूह पिछले 12 सालों से उठा रहा है, पर इसके साथ अन्य मांगे भी जुड़ी हुई हैं।  बाबा ने अपनी समझ से केवल एक बात पकड़ ली जो किसी गंभीर रोग से ग्रसित मरीज के लिये बिना तैयारी के बड़े आपरेशन जैसा है:

Incomplete demand by Swami Ramdeo baba is dangerous for India

The demand made by Swami Ramdeo baba, as withdrawing currency notes in form of Rs. 500 & Rs.1000 has come up 3 years back in his mind and has been taken from a proposal by Arthakranti Pratishthan. Arthakranti strongly feels, the demand proposed by Swami Ramdeo baba is incomplete.

The five point proposal put up by Arthakranti Pratishthan to demolish generation of black money has been in discussions since 12 years. Unfortunately, if only one of the five points is raised as demand to end issue of corruption and Black money from this country, then India will be in more trouble instead becoming empowered.

Arthakranti Pratishthan has taken global copyrights of five point proposal. (The idea is not to hold identity, but while implementing this proposal, United states of America should not demand any royalty as few points have already come up as Bill at United States of America.)

Any movement fighting against corruption and black money should be Welcome. Even movement started by Swami Ramdeo baba is welcome, but the fight is more than a movement/person and is about a correction in system. Swami Ramdeo baba should not have used Arthakranti proposal in such a way which is already in a form of Global copyright. Government has disagreed the demand raised by Swami Ramdeo baba and further to it even Swami ji is not speaking a word about it, which Arthakranti Pratishthan feels a concern.

A brief presentation of Arthakranti proposal was delivered by Anil Bokil (Arthakranti Volunteer) to Swami Ramdeo baba. This presentation was organized by Late Rajiv Dixit (a leader of Azadi bachao andolan) in 2008 at Pune. (Dixit has now passed away 6 months back). Immediately within few days, Satej Patil (Minister of State, Government of Maharashtra) arranged a session by Rajiv Sane(Arthakranti Volunteer, pune) presenting Arthakranti proposal in brief to Swami Ramdeo baba. Rajiv Dixit himself addressed Arthakranti proposal to Swami ji at their Haridwar Ashram. Since then all Yoga program's of Swami does not end without mentioning about withdrawing currency notes in form of Rs. 500 & Rs.1000. But Swami never mentioned a word about Arthakranti.

This demand made by Swami is 3rd point of our Arthakranti proposal. Because of this, doing transaction through banking system will be convenient. Hence Government revenue will increase by multiple times. Offcourse raising this point without mentioning, demanding or understanding other points of proposal may land the current economic system into trouble. Rather this country may face a dangerous situation, growth index may lower down.

Withdrawing High denomination currency is just a like operating a patient with a serious disease. But if we are unprepared for this operation and we still carry out it incompletely, life of patient is at stake for sure !!

अंग्रेजी वाला नोट 8 जून के "दिव्य मराठी" पर आधारित है व अर्थक्रांति समूह की वेबसाइट से लिया गया है...


"सत्य" वहां भी नहीं था जिसके "आग्रह" के लिये बाबा कथित रूप से सत्याग्रह के लिये बैठे थे। उन्होंने सरकार की इस बात का खण्डन नहीं किया है कि अनुमति सत्याग्रह के लिये नहीं, बल्कि "तप" के लिये मांगी गयी थी। बाबा कह सकते हैं कि उनकी निगाह में "तप" ही सत्याग्रह है, लेकिन ध्यान रहे कि वे कोई धार्मिक सभा नहीं कर रहे थे, आंदोलन कर रहे थे और आंदोलनों में धर्मशास्त्र की नहीं कानून की भाषा चलती है। इस व्याख्या का यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिये कि सिर्फ इससे दिल्ली पुलिस को मासूमों पर लाठियां भांजने का अधिकार मिल जाता है। बात बाबा की नीयत की हो रही है।

बाबा लड़ाई करने नहीं आये थे। व्यवस्थाओं से लड़ने का काम योद्धाओं का होता है, हथियार कुछ भी हो सकते हैं- फौलादी भी व आत्मिक भी। गांधी जी ने दूसरा हथियार चुना था व इसका अनुसरण पूरी ईमानदारी से अन्ना ने किया। बाबा के पास यह हथियार भी नहीं था, क्योंकि लड़ना उनका ध्येय नहीं था। लड़ने का ध्येय होता तो भागते नहीं, बहादुरी से गिरफ्तारी देते। यदि उस दिन बाबा कूदने-फांदने के बजाय अपने समर्थकों से शांति बनाये रखने की अपील के साथ टीवी कैमरों के आगे लड़ाई जारी रखने की हुंकार भरते हुए जेल चले जाते और वहां भी अपना अनशन जारी रखते तो वे आज पूरी दुनिया में हीरो बन सकते थे। उन्होंने इतिहास में जाने का यह अवसर इसलिये गंवाया क्योंकि शुरू से उनकी मानसकिता लड़ाई की थी ही नहीं। जिनके चरण स्पर्श बड़े-बड़े मंत्री करते हों, वह सपने में भी कैसे सोच सकता है कि एक संतरी उन पर लाठियां भांज देगा? राजसत्ता का यह दूसरा चेहरा -असली चेहरा- बाबा ने पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल कुटिल हैं।

बावजूद इसके कि संत सिले हुए वस्त्र नहीं पहनते हैं, बाबा के सलवार सूट में निकल भागने के बाद भी बात उतनी नहीं बिगड़ी थी, जितनी बाबा के आत्मप्रचार के मोह ने उनके बयानों ने बिगाड़ी। यदि बाबा बोलने के बदले अपने संत होने का लाभ उठाते हुए कुछ दिनों के लिये मौन धारण कर लेते तो भी वे इस खेल में जीत सकते थे। पर कैमरों के आगे उनकी भाषा-देह की भी व वाणी की भी -नायकोचित वीरता लिये हुए नहीं थी। नायकोचित वीरता की बात तो छोड़ ही दें, उनमें आंदोलन के एक साधारण कार्यकर्ता जितनी प्रतिरोध क्षमता भी दिखाई नहीं दी। वे उस पिटे हुए तमाशाई की तरह लग रहे थे, जो महज तमाशा देखने के लिये भीड़ में जा घुसा था और इस चक्कर में उस पर पुलिस ने लाठियां भांज दी थीं। उनके सहयोगी बालकृष्ण भी कैमरों के आगे महज रोते हुए नजर आये। क्या बाबा व उनके यह सहयोगी इसी मनोबल के बूते इस देश की व्यवस्था बदलने निकले थे?

जैसा कि मैने पहले ही कहा राजीव की तरह उन्होंने भी केवल अपने अहंकार के कारण अपने साथ सलाहकार नहीं रखे। रखे होते तो सिब्बल के हाथ में चिट्ठी देने की भद्द नहीं पिटवाते। दे भी दी थी तो लौटकर यदि वे मीडिया व अपने कार्यकर्ताओं से यह "सत्य" बयान कर देते तो सिब्बल के हाथ से बम का गोला निकल जाता। सत्याग्रह में सत्य से बड़ा हथियार दूसरा नहीं होता। बाबा योगगुरू हो सकते हैं पर उन्हें आंदोलनों की समझ नहीं है। वे आंदोलन के लिये कौन-सा रास्ता चुनना चाहते हैं, यह अभी उन्हें तय करना है। वे सत्य व अहिंसा के साथ लड़ना चाहते हैं या 11 हजार सैनिकों के साथ? चूंकि दूसरे विकल्प पर अभी वे सफाई देने में लगे हुए हैं, इसलिये जाहिर है कि उन्हें सत्य व अहिंसा का मार्ग ही चुनना पड़ेगा, पर यह मार्ग बहुत कठिन है। कैसा रहे कि वे कुछ दिनों अन्ना की शरण में जाकर इसका प्रशिक्षण ले लें?

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it   के जरिए किया जा सकता है. दिनेश चौधरी के भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित अन्य लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


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